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मंगलवार, 2 नवंबर 2010

बदलता मौसम

 

अचानक से दो दिन से २०-३० मील प्रति घंटे के हिसाब से ठंडी तेज हवाओं ने परेशान कर रखा है ! रात में ऐसा लगता है कि जैसे ये आँधी कहीं खिडकी और छत को उड़ा ही न ले जाए !   गमले भी घर से दूर पीछे बैकयार्ड में दूर दूर उड़े मिले !  भारत में गर्मी के मौसम में जैसे लू परेशान करती है वैसे ही शिकागो में सर्दी के मौसम में ये तेज हवाएं !  इसलये ही शिकागो को विंडी शहर के नाम से भी जाना जाता है ! 

ये मौसम भी अजब से रंग दिखाए

देखो कब गर्म से ये सर्द हो जाए

शिकागो की तूफानी सर्दियाँ 

घर को उड़ाते हवाओं के रेले

चेहरे को भुनाते सर्दी के थपेले

ठंडी हवायें बनकर सर्दबाण

चुभकर शरीर को कर दे मृतप्राय

कौन कहता है कि ये शहर बन जाएगा सहरा

ये तो गतिमान है कर्म का जज्बा लिए

थमता नहीं ये आँधियों के वेग से

आग आगे अग्रसर होते रहने की

शायद कर देती है कडकती सर्दी को भी पस्त !

 

गजब की बात है कि चाहे मौसम कितना भी खराब हो, पर लोगों का काम करने का जज्बा कम नहीं होता,  अभिलाशायें, सपने बस अनवरत लगाए ही रखते हैं !

रविवार, 31 अक्टूबर 2010

हेलोवीन की डरावनी और रंगीन शाम मुबारक हो (कुछ चित्रों के साथ)

 

हर जगह लोग अजीब अजीब तरह के भेष बनाकर घूम रहे हैं, कुछ मस्ती में तो कुछ बच्चों के मन की संतुष्टि में !  इस बहाने बच्चों का रोमांच और बड़ों का बचपन सतरंगी छटा लिए अपने पूरे सबाब पर रहता है ! हेलोवीन के दिन ऐसा लगता है कि लोग डर को भी कितने रंगीन तरीके से और उत्साह से मनाते हैं. 

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ऑफिस में भी बड़े इंतजाम किये गये थे,  पिज्जा के साथ साथ तरह तरह की मिठाईयों की व्यवस्था की गयी थी, जिन पर डरावने चित्र बने हुए थे या फिर उनकी आकृति मकड़ी, हड्डी या फिर अन्य डरावनी जैसी थी, ऑफिस को मकड़ी के जालों और अन्य चीजों से एक डरावना रूप देने का प्रयास किया गया था, बाद में शायद कुछ सबसे बढ़िया ड्रेस पहनकर आने वाले के लिए कुछ इनाम के इंतजाम की व्यवस्था भी थी !  कोई भूत तो कोई परी बनकर आया हुआ था, तो हम जैसे भी कई लोग थे जो रोज की तरह जींश और कमीज को अपमानित करने के कतई मूड में नहीं थे.

हेलोवीन (Halloween) पर बच्चे  बड़े तरह तरह के वेशभूषा पहनते हैं, कोई डरावना तो कोई लुभावना बनने की कोशिश करता है, बच्चे ट्रिक या ट्रीट बोलते हैं और जिसके दरवाजे पर भी जाओ उससे ऐसा बोलने पर कैंडी या खिलौने मिलते हैं, लोग रात रात में डरावने किस्म की लाइट या रौशनी भी अपने अपने घर या दुकानों के सामने लगाते हैं ! अभी रात को बच्चों के साथ पुरे मोहल्ले में एक बास्केट लेकर घूमने जाना पड़ेगा और घर लौटने तक अनिगिनत कैंडी इत्यादि का जंक इन बच्चों के बास्केट में होगा. पर इसके चलते बच्चों और बड़ों का उत्साह देखते ही बनता है, चलो लोग इस बहाने से अपने व्यस्त जीवन से कुछ पल निकालकर कुछ मस्ती के मूड में तो आते हैं !! आपको भी एक टोकरी में तरह तरह की चोकलेट इत्यादि भर कर दरवाजे पर रखनी पड़ती है जिससे आने वाले बच्चे खाली हाथ ना लौटें !

आज यहाँ शहर की दुकानों पर भी कैंडी वितरण और हेलोवीन के मेला का हुजूम था, निकुंज ने खुद को स्पाईडर मेन और पॉवर रेंजर से प्रमोट कर NASCAR रेसर का ड्रेस पहना हुआ था.  चलो अभी तो दुकानों से इनको लौटाकर लाये हैं और अब बारी है मोहल्ले में घर घर जाने की !  मैंने तो नेता जैसे भेष धरा था क्यूंकि हमारे भारत सहित पूरे विश्व में इससे बड़ी डरावनी और लुभावनी चीज कोई नहीं :-) …नेता जो सब हड़प लेता !!

चलो कुछ फोटो देख लेते हैं: 

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रंगबिरंगी पोशाकें -

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कुत्ता भी पीछे क्यूँ रहे - dog

मशहूर होलीवुड एक्ट्रेस हैडी क्लम काली माँ के भेष में -

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भारत भी पहुँच रहा है ये साजो सजावट धीरे धीरे, अर्जुन रामपाल को देखिये -

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चलो अब यहाँ रात की तैयारी है !!

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

जीवन के रास्ते कभी कठिन तो कभी सरल …

 

कभी कभी कुछ लोगों से मिलता हूँ तो लगता है कि मैंने क्या मेहनत करी और क्या तिकडम !  लोग कितनी काम्प्लेक्स जीवन जी रहे होते हैं, शायद चिली की खदान में ६९ दिन फँसे लोगों से भी ज्यादा !

कुछ हफ्ते पहले एक टैक्सी ड्राईवर से भेंट हुई ! हम २-३ लोग थे तो मुझे उसके बगल की सीट पर बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ,  पहला सवाल उनका - क्या आप लोग बांग्लादेश, पाकिस्तान या भारत से हैं ?  हाँ, सम्मान के साथ तनकर हमने भी बोला कि भारत से हैं ! उधर से ड्राईवर का जबाब आया और मैं भी बंगलौर से ! 

मैंने प्रश्नचित्र मुद्रा में उसकी तरफ देखा क्यूंकि महाशय की शक्ल किसी भी भारतीय कोने से मिल नहीं रही थी, फिर बोले के मैं तिब्बत से हूँ पर जन्मा और पला भारत में ही हूँ !  फिर महाशय अपने आप ही तिब्बत और भारत के रिश्तों और लोगों की हालत के बारे में मेरा ज्ञानवर्धन करते रहे !

खुद ही बताने लगा कि बड़ी बुरी हालत है, तिब्बत के लोगों को भारत में पासपोर्ट मिल नहीं पाता और तिब्बत में तो सरकार के बुरे हाल हैं ही, अगर तिब्बत जाना पड़े तो कहीं पहाड़ों के रास्ते अवैध रूप से पैदल चलकर आना और जाना होता है ! कई बार इस प्रोसेस में जेल की हवा भी खानी पड़ती है, वो खुद भी ऐसा करके तिब्बत में जिल जा चुका था  ! 

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अमेरिका कैसे पहुंचे ?

बोले कि बड़ी संघर्ष गाथा है, पहले नेपाल के पासपोर्ट का इंतजाम किया कुछ ले देकर - १-२ लाख रुपये में नेपाल का पासपोर्ट बन जाता है !  इस तरह से डर - छिपकर आना पड़ा !  अब भाईसाहब पेपर पर नेपाल के नागरिक हैं,  और जल्दी ही अमेरिका के नागरिक भी बन जायेंगे, क्यूंकि इस तरह से १० के लगभग साल यहाँ बिता दिए हैं !   क्या बीबी और माँ पिता को ऐसी अवस्था में बुलाना और कैसे बुलाना ! बड़ा ही चकरघन्नी और आफत वाला काम था - पर क्या करें लोग मंजिल तय करते करते कब बड़ी बड़ी खाईयां पार कर जाते हैं - पता ही नहीं चलता - सब इस पेट के लिए !

कुछ भाव एक कविता के रूप में उकेरने के कोशिश :

ये जीवन भी धूप छाँव का रेला रे

कभी कठिन तो कभी सरल सा लागे ये

अग्नि क्रोध की कभी उठे

तो कभी समुन्दर उत्सव के

कभी मोह की पाँश का झंझट

कभी अर्थ संचय का चिंतन

कभी बिछडने का गम घेरे

कभी मिलन की आश सँवारे

दम्भ घोर अन्धकार घुमाये

गर्व अनुभूति आनन्दोत्सव ले आये

कभी अतृप्ति अकेलेपन की

कभी विक्षोह परम मित्रों का

इन्द्रधनुष तो बस सतरंगी

जीवन के मेले बहुरंगी

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

क्या सिर्फ अरुंधती रॉय ही देशद्रोही हैं ?

 

अरुंधती रॉय ने जो कश्मीर में या देश के अन्य हिस्सों में जाकर बयान दिए हैं, अवश्य ही वे देश के स्वाभिमान के लिए, देश की एकता के लिए और संप्रुभता के लिए उचित नहीं हैं, कभी कभी उनके विचारों से अपरिपक्वता और प्रचार पाने की मंशा झलकती है ! ये मीडिया में आकर अपने बयानों से देशद्रोह कर रही हैं, और इनको गिरफ्तार करने का बीड़ा विपक्ष भाजपा ने सशक्त रूप से उठाया है जिस पर एक और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार तो दूसरी तरफ इस मौलिक अधिकार की मर्यादा के पहलुओं के बैनर तले एक बहस चल रही है !

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अब अगर दूसरे पहलुओं पर नजर दौडाएं तो मुझे नेट खंगालने की जरूरत नहीं हैं देखिये इस देश में कैसे देश के स्वाभिमान, देश की एकता और संप्रुभता का मजाक नेता और लाल फीताशाही उडाती है पर बस सुगबुगाहट होकर रह जाती है - कभी कुछ नहीं होता -

१. राजीव गाँधी बोफोर्स और स्विस बैंक खातों में काला धन जमा करने के बाद भी पोस्टर बॉय बने घूमते हैं - यहाँ तक कि उन्हें देश के लिए बलिदान होने वाला एक शहीद बोला जाता है

२. कलमाडी देश के स्वाभिमान और गर्व को तार तार कर हजारों करोड रुपये डकार जाते हैं

३. दिग्विजय सिंह १० साल के शासन में मध्यप्रदेश को कर्ज के कुएं में धकेल जाते हैं और आज कांग्रेस में वरिष्ट का दर्जा पाये हुए हैं

४. भाजपा, कांग्रेस, भ्रष्ट मधु कोड़ा और शिबू सोरेन को आगे बढाती है क्या ये देश के खजाने को बर्बाद कर देशद्रोह नहीं कर रहे ?

५. कर्नाटक में बेल्लारी खदान के मालिकों को भाजपा शरण दिए हुए हैं और प्रखर वक्ता सुषमा स्वराज भी उनके पक्षधर हैं

६. मायावती, मुलायम और लालू दलितों के नाम पर देश को बर्बाद करने पर तुले हैं

७. शिवराज सिंह ग्रहमंत्री रहते हुए हर मोर्चे पर असफल रहे - क्या उनका पोस्ट मोरटेम हुआ ?

८. मध्यप्रदेश, बिहार , राजस्थान , उत्तरप्रदेश के राजनीतिक लीडर इन उत्तर भारतीय राज्यों को तमाम संसाधनों के होते हुए भी दक्षिण की तरह, चंद्रबाबू नायडू की तरह विकसित नहीं बना सके - क्या ये जेल नहीं जाने चाहिए ?

९. करूणानिधि और उनका परिवार, मुलायम से लेकर पासवान तक कैसे मध्यमवर्ग परिवार से अरबपति बने

१०. १९८४ के दंगो में सिख समुदाय को आर्थिक, भावनात्मक, और शारीरिक चोट, नुकसान के जिम्मेदार क्या देशद्रोही नहीं हैं ?

ऐसे हजारों बिंदु गिनाए जा सकते हैं जिन पर गौर करने पर अरुंधती रॉय के साथ साथ और भी बहुत लोग भी सजा के हकदार हैं !!

अरुंधती रॉय को जरूर ही गैरजिम्मेदाराना बयानों की सजा मिलनी चाहिए जिससे स्वतन्त्रता की अभिव्यक्ति का दुरूपयोग ना हो और देश की अखंडता पर कोई प्रश्नचिन्ह ना लग पाये !!  गिलानी महाशय के साथ कुर्सी पर बैठने से पहले काश रॉय मैडम ने ये लेख पड़ा होता - अखंड भारत!

आपकी क्या राय है इस बारे में ?? इस विषय पर सार्थक बहस और एक निर्णय की जरूरत अनिवार्य सी लगती है  !

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

एक उद्घाटन ऐसा भी !

 

बहुत दिन पहले फेसबुक पर यहाँ जिस शहर में मैं रहता हूँ उसके पेज पर एक विडियो चमका था, जिसमें  यहाँ के मेयर को एक ब्रिज के उद्घाटन करते समय फीता खुद न काटकर कुछ बच्चों से ये काम करा उनका उत्साहवर्धन करते दिखाया गया था -

पता नहीं आप देख पाएंगे ये विडियो या नहीं, पर कोशिश करिये -

http://www.facebook.com/video/video.php?v=1197273388967

सूचना तकनीक का प्रयोग है कि हम एक जगह की अच्छी बातें दूसरी जगह प्रसारित कर सकते हैं, बाँट सकते हैं - शायद कोई नेता देख रहा हो और कुछ सीख ले इससे !  बहुत पैसा बच सकता है जो आधारशिला रखने से लेकर ढाँचे के समपर्ण तक रैलियों और भीड़ पर बहाया जाता है !

उद्घाटन इत्यादि में पैसा पानी की तरह बहा कर जनता के सामने खुद को विकास का मसीहा साबित करने का प्रजातंत्र में आदत या कहना चाहिए नशा सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि विश्व में हर जगह है - जहाँ भी जनता को जनता के पैसे द्वारा बेबकूफ बनाने का तंत्र यानी प्रजातंत्र है, वहाँ ऐसा अक्सर देखने को मिलेगा, चाहे वो अमेरिका हो या भारत !

देखिये एक समाचार दक्षिण भारत का (विवरण http://www.outlookindia.com/article.aspx?264550 से लिया गया है )  -
Talking of scamming, the Chennai Corporation spent more than Rs 24 lakh on the inauguration of two flyovers(at Cenotaph Road and Alandur Road) and a subway (on Jones Road, Saidapet) by chief minister M Karunanidhi on December 11, 2009. According to a reply to an RTI filed by V Madhav of Porur, Rs 16.45 lakh was spent on the inauguration of the Cenotaph Road flyover while Rs 7.87 lakh was spent for the Alandur Road flyover and the Jones Road subway although no stage was put up and the CM inaugurated it sitting in his car. “The total amount spent for the functions is almost equal to the ward development fund of a councillor, which is Rs 25 lakh a year. At a time when the government is short of funds for welfare schemes, there should not be any wasteful expenditure,’’ Madhav said.

So, what was 24 lakhs spent on? Rs 8.3 lakh on lighting, mikes and ACs at the Cenotaph Road flyover inauguration, Rs 2.5 lakh on the stage arrangements and toilet facility for Karunanidhi, Rs 1.15 lakh was spent for chairs for VIP, VVIPs and members of the public, the fabricated tent and synthetic mat. In addition, booklets supplied to VIPs, VVIPs and the public on the two flyovers cost Rs 4.3 lakh, while Rs 3.53 lakh was spent on lighting arrangements on the Alandur Road flyover, the Jones Road subway and the approach roads. All this expenditure does not include the money spent on the CM’s security and newspaper advertisements. But Subramaniam’s defence? Spending Rs 25 lakh for a function in which the CM participates “cannot be considered unusual or unnecessary.”

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क्या अगली बार आप भी इस चक्कर में खुद के टैक्स का पैसा फूकेंगे या फिर नेपरविल के मेयर से कुछ सीखेंगे  ?

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

वो मेरे प्रेरणा श्रोत और जर्मनी के एकीकरण की २० वीं वर्षगाँठ

 

मैं मेट्रो ट्रेन के स्टेशन पर अपने प्रोग्रामिंग वाली चिंतन मुद्रा में खडा था और तभी एक छड़ी ने हलके से मेरे पैर को छुआ,  और जैसे मेरे दार्शनिक भावों को एक तरंग सी दे दी.  छड़ी वाला इंसान उस भीडभाड वाले छोटे से प्लेटफोर्म पर सर्राटे से आगे बढता जा रहा था, आँखों पर काला चश्मा और हाथों से बस छड़ी को एक दिशा देते हुए स्वाभिमानवस वो आगे बढा जा रहा था, किसी की कोई सहायता की उसे दरकार नहीं थी, आवश्यकता ने उसे एक मन्त्र दे दिया था कि बस बिना रुके चलते ही जाना है , अगर किसी की तरफ देखेगा तो आगे उस वेग से बढ़ने का प्रश्न ही नहीं है !

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ऐसी कितनी ही छोटी छोटी बातें हैं जो आपको एक मंद हवा के झोंके से आनन्दित सा कर देतीं हैं , और इस आनंद के पीछे कितनी पीड़ा को छुपाये ये पुलकित प्रतीक !

गाँव में एक हष्टपुष्ट मेरे साथ का लडका,  मेरे से भी अधिक फुर्तीला,  बस शायद कुछ अभावों की वजह से पढ़ ना सका और गाँव में ही रह गया ! लोग कभी उसे उसके नाम से नहीं बुलाते बल्कि लंगड़ा कहकर बुलाते हैं, इसी नाम से मशहूर है पर जिस वेग से पाँवई लेकर एक पैर से दौडता है  उससे लगता है कि उसमें आसमा को छूने की चाहत और क्षमता दोनों ही है ! गाँव में उसकी दूकान है और खुद का छोटा सा व्यवसाय - कोई क्या बराबरी करेगा उसकी - लंगड़ा कहने वाले खुद ही उसके पुरुषार्थ से लज्जित हो जायें अब !

पिछले महीने ३ अक्टूबर को पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी को एकीकृत हुए २० साल हो गये ! (शायद दीवाल ९ नवम्बर १९८९ की रात को गिराई गयी ) दोनों देशों ने एक होकर संगठित होकर केवल दूसरों के आधिपत्य से ही उस दिन मुक्ति नहीं पायी बल्कि विश्व में एक प्रगति के सोपानों का कीर्तिमान भी कायम किया, एक होने के बाद जर्मनी विश्व के ऐसे देशों में शामिल हो गया जो विश्व की आर्थिक महाशक्ति कहे जाते हैं, १७ साल से बेरोजगारी की दर विश्व में सबसे कम रखकर इन्होने कर्मशीलता के साथ योजनबद्ध और एक कर्मण्य प्रशाशनिक व्यवस्था होने का प्रतीक भी विश्व को दिया !  पूर्वी जर्मनी उतनी संपन्न नहीं थी जितनी पश्चमी और इसलिए केवल १७ प्रतिशत पूर्वी जर्मनी की कम्पनियाँ ही प्रतिस्पर्धा में टिक पायी, पर बाद में सरकार की प्रतिबद्धशीलता की दाद देनी होगी कि अब पूर्व और पश्चिम में भेद कर पाना संभव ही नहीं !   ब्लूमबर्ग पत्रिका ने इस पर एक विशेष आलेख प्रकाशित किया है जिसने मेरी पिछले वर्ष की जर्मन यात्रा की यादें ताजा कर दीं !  मैं उन दिनों  ड्यूसलडोर्फ़ में था,  कुछ चीजें जो मैंने अनुभव कीं और पत्रिका ने भी इंगित करीं हैं  -

  • अगर आपका जन्मदिन है तो ये आपकी जिम्मेदारी है कि आप ड्रिंक और खाना खुद उपलब्ध कराएं 
  • हमेशा समय के पाबन्द रहें
  • सिगरेट को कभी भी कैंडल से नहीं सुलगाएँ, (A common superstition says doing so kills a sailor)
  • अमेरिका और भारत से फ्री के बाथरूम की आदत पड़ हो गयी तो यहाँ उसको विराम दें , बाथरूम से बाहर आकर टिप जरूर दें
  • मैं तो एक बार लेडिस बाथरूम  में घुस गया क्यूंकि पुरुषों के बाथरूम पर herr और औरतों के बाथरूम पर कुछ और लिखा रहता है तो मुझे लगा कि her  का मतलब वो महिलाओं का बाथरूम होगा :)
  • herr का मतलब शायद mr.  या श्री होता हैं जो किसी भी पुरुष के नाम के संबोधन के पहले सम्मानसूचक शब्द के रूप में लगाया जाता है
  • बीयर तो पानी की तरह है इस देश में :-)
  • खाना खाते समय हाथ टेबल पर रखेंगे तो अच्छा माना जाता है
  • खाना अगर पूरी तरह पेट भर कर खा लिया है और नहीं लेना है तो अपने खाने के चाक़ू और फोर्क को और चम्मच को समानांतर अवस्था में रखे , अगर क्रोस्सिंग में रखोगे तो इसका मतलब आपको और खाना खाना है
  • किसी के घर जाओ तो समय से ही पहुँचो और एक छोटी से गिफ्ट जरूर ले जायें 
  • एक सायिकल जरूर लें लें, सायकिल तो जैसे होलैंड और जर्मनी के रोजमर्रा के जीवन का एक हिस्सा हैं, सूट पहने लोग सायकिल पर ऑफिस जाते मिलेंगे सुबह, कुछ ५० यूरो से लेकर हजारों यूरो तक की सायकिल उपलब्ध हैं
  • एक शहर की बीयर को दूसरे शहर में न मांगे, बीयर के ऊपर बहुत लड़ाईयां रहती हैं,  ड्यूसलडोर्फ़ शहर में आल्ट बीयर चलती थी और कालोन शहर में कोल्च , पर ड्यूसलडोर्फ़  में १-२ रेस्तरां ही कोल्च परोसते थे और यही हाल कालोन में था आल्ट के बारे में. दोनों शहरों में दूरी थी ३० किलोमीटर, जर्मन दोस्त ने ड्यूसलडोर्फ़  के रेस्तराओं में हम लोगों को कोल्च न माँगने के लिए आगाह किया हुआ था  …हामरे गाँव के कुए से पानी न पी लेना सरदार !!

यूरोप तो जैसे स्वर्ग हो और  जर्मनी उस स्वर्ग का द्वार व मुखिया !  कुछ उन दिनों के फोटो -

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आपके अनुभव आपके प्रेरणाश्रोत और जर्मनी के बारे में कैसे हैं ?  जर्मनी के एकीकरण की  २० वीं वर्षगांठ पर आपके क्या विचार हैं ? 

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

गांधी और मेरे पिता

आज जब प्रवीण पाण्डेय जी के ब्लॉग पर वर्धा में गाँधी आश्रम के बारे में पढ़ रहा था तो सहसा ही कुछ भाव मन में जागे अपने गाँधी के बारे में !  मैंने जो कमेन्ट पाण्डेय जी के ब्लॉग पर छोड़ी है , सोचा उसको एक ब्लॉग पोस्ट के रूप में सहेज कर रख लूं -  शायद पिताजी पढेंगे तो एक अहसास हो कि बाहर वालो के साथ घर में भी उनके महान कार्य को हम हर पल अपना अमूल्य धन मानकर गौरब अनुभव करते हैं -

बचपन में गांधी जी की कई पुस्तकें पापाजी  ने मुझे  पढवाई और अभी भी यदा कदा कुछ पढ़ लेता हूँ , हर बार आदर्श , सत्य , सदाचार, संयम,  निष्ठा और त्याग के भाव जैसे चारों और से गदगद सा कर देते हैं , फिर घर में भी एक स्वरुप गाँधी का देखता हूँ,  मेरे पिता,  जो हर बार अपनी पोस्टिंग ऐसे गाँव में कराते हैं जहाँ कोई और जाना नहीं चाहता और फिर खुद रोज कर्तव्यनिष्ठ होकर अपनी ड्यूटी पर जाते हैं , चिकित्सा विभाग में उनके साथ के लोग गरीबों के लिए आ रहीं दवाईयों को बेच और अपनी खुद की क्लिनिक खोल हजारो कमा कर शहरों में  जब मदमस्त पर ग्लानिरत होकर जी रहे हों तब ये अपनी तनख्वाह भी आदिवासियों में बाँट आते हैं , लड़कियों की शादी कराने से लेकर उनके साथ हर परिस्थिति में जैसे साथ रहने का उन्होंने उन गाँव वालों को वचन दे दिया हो,  सुब्बाराव , विनोवा भावे , स्वेट मार्डेन,  श्रीराम शर्मा आचार्य से प्रभावित वो अपनी दैनिक गतिविधियों से हमारे क्षेत्र में एक निर्विवाद छवि के रूप में जाने जाते हैं और मुझे हर वक्त यही अहसास होता है कि मैं अपनी क्षमता से नहीं बल्कि उन सैकड़ों गरीबों के आशीर्वाद की वजह से ही कुछ कर पाने में समर्थ हूँ,  कभी कभी हम भी पिता का पूरा समय और प्यार ना पाने से खीज पड़ते थे पर आज उनके त्याग का अहसास हर पल मुझे एक स्फूर्ति और सत्य पर चलने की प्रेरणा देता है !  बचपन में सिखाये गए डायरी लेखन से लेकर , सादगी के पाठ, मेहनत की कमाई तक हर चीज मुझे मेरे असल गांधी से मिलती रही है !   पर कभी कभी दुःख होता है कि ऐसे लोग जिन्दा रहते कभी मानव द्वारा बनायीं गयी सुविधाओं का उपयोग अपनी कर्तव्यनिष्ठता के सामने कर ही नहीं पाते, पर फिर सुकून मिलता है कि जब वो बुलाएं - कई लोग आ खड़े होते हैं !    जब वो मेहतर, चमार या कोरी   के घर  उनके साथ बैठकर खाना खाते हैं तो लोग पागल तक की संज्ञा दे देते हैं पर उस गरीब को जो संबल , स्वाभिमान और ऊर्जा उस साथ से मिलती है  वो अपने आप में एक प्रेरणा  और यादगार बन जाती है !  उनके लिए सब इंसान जाती भेद से दूर होकर एक समान हैं !   और इसलिए घर में गीता, रामायण के साथ कुरआन को भी जगह मिलती है !
 
कितने ऐसे गाँधी है आज भी,  उसके लिए वर्धा या साबरमती भी शायद न जाना पड़े पर ऐसे धार्मिक स्थलों से प्रतीकात्मक प्रेरणा की स्फूर्ति तो शरीर में आती ही है ! 
 
आभार आपका !