नौकरी ऐसी है की प्रोजेक्ट के अनुसार कभी अंतर्राजीय तो कभी अंतर्राष्ट्रीय यात्रा करनी पड़ती है. शिकागो से बोस्टन, न्यू योर्क या फिर ह्यूस्टन जाना पड़े तो कोई बात नहीं होती क्यूंकि किसी वीसा की जरूरत नहीं पड़ती. पर किसी और देश को जाना पड़े तो बहुत पापड़ बेलने पड़ते है हम इंडियन पासपोर्ट धारको को.
हमारे अमेरिकेन भाई लोंगों के पास तो बस पासपोर्ट होना चाहिए और वो कहीं भी कभी भी उड़ने को तैयार. पर ऐसा हम इंडियन पासपोर्ट वाले नहीं कर सकते. और ये दर्द समय समय पर सोचने पर मजबूर करता है कि क्यों नहीं सबके लिए एक जैसा क़ानून ?
अब में ऐसा अपने लन्दन, जर्मनी या फिर कनाडा में बैठे लोंगों को कैसे समझाऊं ? उनकी अपेक्षा है कि मैं १-२ दिन में फ्लाई करके प्रोजेक्ट ज्वाइन कर लूं. बाकी लोग जो अमेरिकेन , कनाडा या फिर लन्दन के पासपोर्ट वाले है उनकी ही श्रेणी में शामिल करके अपेक्षा बढ़ जाती है. पर ये नादान लोग इम्मिग्रेसन के बारे में कुछ नहीं जानते और फिर उनको सारी ABC पढ़ानी पड़ती है.
वीजा का टाइम भी २ सप्ताह से लेकर ६ सप्ताह का रहता है, अब इतना इंतजार कौन करे ? आजकल जब से चरम पंथ उत्कर्ष पर है, वीजा लेना और भी मुश्किल हो गया है.
इन सबके ऊपर से पेपर वर्क भी इतना कि सारा दिन लग जाए भरने में और उसके बाद अटोर्नी के सवाल पर सवाल. जब तक वीजा ना आये तब तक आप इस चक्रव्यूह में घूमते ही रहो. हर जगह के अलग टाइप के फोटो. हर जगह के वीजा के लिए पिछले वर्षो के सारे यात्रा का लेखा जोखा अलग से दो. सारे प्रमाण पत्रों की कॉपी कि जरूरत और तमाम प्रश्नों कि झड़ी.
जब अमेरिका से बाहर निकालो तो फिर वापस आते समय अमेरिका के वीजा का वैध स्टंप भी जरूरी है आपके पासपोर्ट पर अगर वो नहीं है तो एक और माथा पच्ची ...जीवन को बिना बात के बेतुके संघर्षो में ढालना पड़ता है.
बात हरे पत्ते के मोह तक होती तो कोई बात नहीं, पर वर्ल्ड ट्रेवल तो कही से भी करना पड़े , हम भारतीयों के लिए टेडी खीर ही है. पश्चिम में रहने वाला कही भी आने और जाने के लिए आजाद और हम पर इतनी पाबंदियाँ ...कहाँ तक जायज है ये ? कुछ तो पारदर्शिता और समानता आनी चाहिए इस भूमंडलीकरण के युग में ...
ये दर्द हर हिन्दुस्तानी या एशियन को है और कोई दवा मुझे आती नहीं दिखती !!
