कल ग्रॉसरी करने जाना था तो सोचा कि पास में ही साईं बाबा का मंदिर है, तो वहाँ भी घूम आयेंगे | वहाँ जाकर पता चला कि गुरु पूर्णिमा मनाई जा रही है और उसके उपलक्ष्य में एक रथ यात्रा भी निकाली जा रही है | निकुंज भी बहुत खुश हुआ ये सब चहल पहल वहाँ देखकर !
पहले मन्त्रोच्चार हुआ और उसके बाद गीत बाजों के साथ रथ यात्रा प्रारंभ करी गयी, कुछ १०० के आसपास लोग रहे होंगे ! निकुंज ने भी रथ को खींच रहे रस्से को हाथ लगाया उत्सुकतावश | सब कुछ जैसे फोटोग्राफी के लिए ही हो रहा था, पंडित जी ने भी बढ़िया कपडे पहन रखे थे और साईं बाबा को भी बढ़िया पौशाक पहनाई गयी थी ! इन सब के बीच मन्त्रों की ध्वनि और गाये जा रहे भजनों ने उन्माद और आनंद जरूर पैदा किया - मेरे मन में कम से कम !!
कुछ फोटो लिए उसी समय:
विडियो :
जय गुरुदेव ! गुरु वही जो पथप्रदर्शक हो, अहम से दूर हो !!
शुक्रवार को जब टोरंटो एअरपोर्ट पर इम्मिग्रेसन कि कतार में खड़ा था, पीछे एक अंग्रेज परिवार मुझसे बात करना चाह रहा था (देसी शक्ल देखकर शायद), पंक्ति बहुत लंबी थी इसलिए बहुत देर तक बातें होती रहीं | ये महाशय बोल रहे थे कि २ महीने से घर से निकले हुए है और घूमे जा रहे हैं तबसे, फिर बोलने लगे कि अम्मा को जानते हो क्या – माँ अम्रतानन्दमयी के बारे में पूछ रहे थे !! …बात बात चलते चलते गुरु की महिमा, श्रीमद्भागवद्गीता के बारे में होने लगी | महाशय ने आश्रम में चल रहे कार्यक्रमों आदि के बारे में बताना शुरू कर दिया, सारी रात जागे हुए थे, कह रहे थे कि माँ हर भक्त से गले मिलती हैं, बात करती हैं, सलाह देती हैं, फिर भजन कीर्तन आदि होता है, उनकी पत्नी जो ५० के ऊपर उम्र कि होंगी बहुत अच्छे हिंदी में भजन गाती हैं | श्रद्धा और विश्वास ने उनको कितना समर्पित कर रखा था !! भारतीय संस्कृति में सच में सराबोर लग रहे थे दोनों पति – पत्नी !! और बस अपने गुरु का बखान किये जा रहे थे…२ महीनों से अम्मा के शिविर में ही थे ये लोग !!
बातें एअरपोर्ट के अंदर आकर फ्लाईट में चढने तक होती रहीं | भारत के लिए बहुत सम्मान झलक रहा था उन दोनों की आँखों में !! गुरु के लिए ऐसा ही अंध समर्पण चाहिए होता है, मैंने कहा कि मुझे कभी कभी भारत के गुरुओं के आलिशान व्यक्तित्व से शक के भाव उत्पन्न होते हैं अतः में पूर्ण समर्पित नहीं हो पाता, पर उनके मन को मेरे इस शक ने कतई विचलित नहीं किया …शायद गुरु पूर्णिमा मना कर लौट रहे होंगे वो लोग ……….
भक्ति के लिए श्रद्धा और श्रद्धा के लिए तर्कहीन होना जरूरी है क्या ?