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बुधवार, 28 जुलाई 2010

सारी दुनिया गोल है

 

ब्लूमबर्ग बिसिनेस वीक पत्रिका में Advertising के बारे में एक लेख पढ़ रहा था, कुछ इस तरह से लिखा था -

“companies are taking cues from African Americans, Hispanics, and Asians to develop menus and advertising in the hopes of encouraging middle-class Caucasians to buy smoothies and snack wraps as avidly as they consume hip-hop and rock ‘n’ roll.”

संयोग से ये भी प्रवीण पाण्डेय जी द्वारा उल्लेखित मध्यमवर्ग को ड्राईवर मान रहे हैं !!   शायद जो भीड़ है वही बीच का है , बाकी ऊपर और नीचे :)

हमें तो देश का कुछ भी इधर दिख जाए तो उल्लास सा मन में होता है| कुछ दिन बाद घर पर देखा कि मैकडोनाल्ड से घर पर एक कूपन आया है - ये देखिये फोटो हिंदी में लिखे कुछ वाक्यों के साथ ….

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शिकागो और आसपास के सबर्ब में ये मैकडोनाल्ड कि तरफ से घर घर बांटे जा रहे हैं !

देखो दुनिया कितनी गोल है - पश्चिम में हमारी वाणी कि गूँज और हमारे यहाँ पश्चिम की नक़ल जोरों पर !!  यहाँ के कई दुकानों पर समोसे बिकने लगे हैं और योग तो हर कोई करने का दीवाना लगता हैं ,  मिठाई और भारतीय खाना यहाँ के लोगो को बहुत पसंद आते हैं !!

वसुधैवकुटुम्बम और भूमंडलीकरण दो शब्द क्या कभी एक सूत्र में बाँधे जा सकते हैं ?

भूमंडलीकरण  के ऊपर के ऊपर बहसनुमा एक लेख पढ़ रहा था यहाँ पर - “भूमंडलीकरण की चुनौतियाँ : संचार माध्यम और हिंदी का संदर्भ”

बाकी टोरंटो कि बहुत सी यादें सहेजी हुई है, कुछ टिप्स -

  • कामा रेस्तरां में खाना खाने मत जाना, बहुत बेकार बनाता है
  • अरोमा बहुत बेहतरीन भारतीय खाना परोसता है
  • तंदूरी फ्लेम का तो कोई जबाब नहीं - बहुत ही उम्दा और अपने आप में अद्वितीय किस्म का बफ्फे देते हैं ये !
  • और समीर जी के घर के खाने के सामने ऊपर वाले दोनों (अरोमा और तंदूरी फ्लेम) भी नहीं टिकते,  साथ में कविता भी झेलनी पड़ेंगी पर ! बैसेमेंट में ले जाकर गन लगा देंगे सर पर कि सुना अपनी और सुन मेरी भी :-) 
  • टिम होर्टन्स पर सुबह की कॉफी और बैगल मस्त होता हैं
  • फ्लाईट सिटी एअरपोर्ट से पोर्टर की लो - २० मिनट पहले एअरपोर्ट पहुंचो बस !!  वरना दूसरे एअरपोर्ट पर कम से कम १.३० घंटे पहले पहुँचो !!
  • हिल्टन गार्डन इन् होटल में रुको :)
  • किंग स्ट्रीट पर निकल जाओ ..बहुत से बार और रेस्तरां आपका इंतजार कर रहे होंगे
  • लोग भी अच्छे लगे
  • हिंदी में रेडियो भी आता है और टैक्सी वाला तो हमेशा ही देसी होता है
  • टोरंटो में तो जैसे मेरा देश बसता है , वैसे शिकागो और न्यूयोर्क भी कम नहीं इस मामले में :) 

कुल मिलाकर ८-१० सफ्ताह का ट्रेवल भले ही साप्ताहिक था पर ज्यादा परेशान न किया इसने … बढ़िया यादें मानस पटल पर अंकित हो गयीं हैं !!  काम बहुत था पर अंत भला तो सब भला !

जल्दी ही फिर मिलेंगे टोरंटो - बहुत लोग इंतजार में है वहाँ शायद !!!

मंगलवार, 22 जून 2010

एक पग और बढ़ा…

 

imagesबहुत दिन से जद्दोजहद चल रही थी की कैसे हिंदी लेखन के लिए एक ओफलाइन टूल को लैपटॉप पर डाला जाए. अभी तक करीब कुल मिलाकर लगभग १०० से ऊपर पोस्ट हो गयी होंगी मेरे तीनों ब्लोग्स पर, सारी ब्लोग्गेर्स के टाइपिंग एडिटर को उपयोग में लाकर ही लिखी गयीं थी.  बहुत टाइम कोन्सुमिंग टास्क था.  कई बार लिखते लिखते बाद में एडिट करना पड़े तो बहुत मुश्किल होती थी, ओनलाइन होकर ही लिख पाता थे, ऐसी कई परेशानियाँ आती थी.   पर हिंदी में लिखने की चाह थी तो बस लिखता गया, पर हाँ उतना नहीं भावों को बिखेर पाया जितना चाहता था. 

आज सुकून सा अनुभव कर रहा हूँ जब गूगल का हिंदी और अंग्रेजी में स्विच करने वाला टूल भी इंस्टाल हो गया और ब्लॉग से डिरेक्ट कनेक्शन के लिए विंडो लाइव भी इंस्टाल कर लिया है. अब जब चाहे लिख कर रख सकता हूँ . थोड़ी सुविधा और सुगमता रहेगी. 

IME (गूगल का हिंदी और अंग्रेजी में स्विच करने वाला टूल )

  • पहले बार बार एक जगह हिंदी में टाइप करके कॉपी पेस्ट करना पडता था, कमेन्ट देने इत्यादी के लिए
  • किसी भी विंडो पर अब अल्त+शिफ्ट दबा कर कीबोर्ड अपने आप हिंदी में लिखने के लिए परिवर्तित हो जाता है.
  • सोफ्ट कीबोर्ड भी ओंन कर सकते हैं अगर टाइप करने में समस्या है

विंडो लाइव

  • सीधे सीधे एडिटर से ही ब्लॉग पर पोस्ट करने की सुविधा देता है
  • एडिट करके एक से अधिक बार भी पोस्ट करेंगे तो ये पोस्ट को डुप्लीकेट नहीं करेगा
  • लिखकर छोड़ दो और पब्लिश का टाइम सेट कर दो, अपने आप उस टाइम पर पब्लिश हो जाएगा आपका चिटठा
  • एडिटर भी बहुत सरल है और कई फीचर देता है,  फ्लेक्सिबल है
  • एक से अधिक ब्लॉग जोड़ सकते है, और जब लिख रहे हों, या पब्लिश कर रहे हों तो सम्बंधित ब्लॉग को सेलेक्ट कर लो
  • आपके ब्लॉग के फॉर्मेट, फॉण्ट इत्यादी को इम्पोर्ट कर लेता है ये, तो ऐसा लगेगा कि आप ब्लॉग पर ही लिख रहे हों

चलो इतने दिन के आलस के बाद कल की सक्रियता ने कुछ कमाल दिखाया.  खैर और भी उपयोगी टूल होंगे मार्केट में, पर अभी तो यही काफी सुविधाजनक लग रहा है.  धीरे धीरे एवोल्व होगा, शायद जीवन का यहीं नियम है की सीढियाँ चढते जाओ, कोई जल्दी चढता है तो कोई मेरी तरह धीरे धीरे. 

एक प्रश्न -  हिंदी के पूर्ण विराम के लिए यूनिकोड क्या होगा अभी तो डॉट से काम चलाना पड़ रहा है  ?

176025780_755491 खैर टोरोंटो में G20 Summit की वजह से इस हफ्ते घर से ही काम करने का मौका भी एक सुकून ही दे रहा है.  टोरंटो को कनाडा की सरकार ने कुछ हफ्तों पहले से ही छावनी में तब्दील कर दिया है,  बैरिकेट्स लगा दिए गए थे सडकों पर,  कुछ सडकें यातायात के लिए बंद कर दी गयीं थी, पुलिस वाले भी बहुत दिखते थे चारों G20_fence_716343gm-aतरफ.  सुना है इस हफ्ते तो ऑफिस में किसी को आने ही नहीं दे रहे सुरक्षा कारणों से.  मेरे ऑफिस के लोग जो लोकल हैं, उनको घर से ही काम करने के लिए बोला गया है. कदाचित ये हालत न होतीं अगर G20 अपने उद्देश्यों पर खरा उतरा होता.  सबकी आपनी अपनी समस्याएं हैं, अपने अपने राग हैं, बस सरकारों के विशाल दल इन समारोहों में औपचारिकता पूरी करने चले आते है.  सुना है कि कनाडा की सरकार ने १ बिलियन डॉलर इस समारोह के आयोजन पर  खर्च कर दिया है.  ये उसी तरह है जैसे मुकेश अम्बानी IPL में खर्च करते हैं, अर्थात मार्केटिंग के लिए. कनाडा  जैसे अमेरिका का छोटा भाई टाइप देश के लिए ये एक अच्छा मौका है अपने आप को मार्केट करने का.  खैर हमें तो फायदा ही मिला इस सबसे, एक वीक का ट्रेवल बच गया.

images हमारा भारत भी तो एक आयोजन में व्यस्त है, चलो उधर तो मार्केटिंग के सहारे नेताओं की जेबें हरी हो रही होंगी और मजदूर बेचारा डैड लाइन के भय में अपना डबल पसीना बहा रहा होगा.  फिर भी कुछ तो कदम आगे बढ़ ही रहे हैं. यानी हम एवोल्व हो रहे हैं, यही जरूरी है. आप भी अपना योगदान दे सकते हैं. देखिये ये विडियो…

आजकल मौसम ने भी हम पर मेहरबानी कर रखी है, रोज बारिश हो जाती है तो गर्मी उतना कष्ट नहीं दे रही. पहले गर्मी के लिए तड़प, और जब गर्मी आ गयीं तो हलकी हलकी बूंदों के लिए मन तरसता है, मन की संतुष्टि अंतहीन है !!

ages कुछ कहना था ब्लोग्वानी और चिट्ठाजगत के बारे में चल रही सार्थक या असार्थक बहस के बारे में. मेरे हिसाब से पक्ष, निरपेक्ष या गुटनिरपेक्षपन की ये लड़ाई जो कभी कभी गैंगवार का रूप ले लेती है , शीर्ष पर आने या त्वरित पापुलर होने के चक्कर में हो रही है.   तो अगर इतनी लड़ाई है इस छोटे से हिंदी ब्लॉग्गिंग में शीर्ष के लिए १४ हजार वें लेखक से लेकर पहले तक, तो फिर सक्रियता का गणित भी सही होना चाहिए.  मैंने अपने एक अन्य ब्लॉग में अपने इस वाले ब्लॉग का लिंक दिया १-२ बार (रेफेरेंस के लिए) तो मेरी सक्रियता में गजब का उछाल आ गया, अरे ये तो फर्जी काम हुआ मेरी ओर से, इसी लोजिक या लालसा ने कुकुरमुत्ते के पेड़ की तरह अनगिनत चिट्ठे चर्चे खोल दिए , जिनका उद्देश्य इस गणित के इर्द गिर्द ही था. सब सक्रियता के पीछे पड़े हैं, कंटेंट पीछे छूट रहा है :) 

बात अगर ब्लोगवाणी या चिट्ठाजगत के महत्व की है तो ये अपने हिसाब से बहुत कुछ योगदान कर रहे हैं, हिंदी के सारे ब्लॉग को एक जगह लाने में और लोगों को ब्लोगों पर लाने में.  जो लोग इन दोनों के बिना काम नहीं कर सकते, वो बस नदी में कूद कहीं भी गोता लगाना चाहते हैं.  उनके लिए कंटेंट महत्वपूर्ण ना होकर हर चिट्ठे पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना ज्यादा मायने रखता है.  एक - दो लोग ऐसा करें तो उनके कुछ कारण हो सकते है जैसे - उत्साहवर्धन करना इत्यादी. पर सब करें सब ब्लोगों को नापने का काम तो ये भेडचाल है. और लग रहा है कि आप टाइम को खराब कर रहे हैं, कुछ तो खुद की चोइस होनी चाहिए,  अगर है तो गूगल रीडर में या अनुसरणकर्ता बन कर उनकी लिस्ट बना लें, फिर क्या फर्क पडता है किसी के होने या ना होने का :)

मेरे हिसाब से अगर ये Aggregators अपना फोर्मुला , लोजिक सही कर लें तो बहुत हद तक तलवारें नियंत्रण में लायी जा सकती है ओर फिर ऊर्जा बढ़िया लिखने में लगायी जा सकती है.  मैं भी क्या लेकर बैठ गया ….जिनके पास बिषय नहीं उनके लिए तो ये सब विवाद रामवाण हैं .    एक मामूली सा लोजिक सक्रियता आंकड़ा सही करने का …हिट्स के आधार पर …

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रही बात नापसंदी की तो कबीर दास पता नहीं क्यों बोल गए थे की “निंदक नियरे राखिये आँगन कुटी छबाय…..” क्या कोई पालन करता है इसका ? आजकल तो NGO भी अपनी निंदा नहीं सुनना चाहते !!

 

बहुत पहले ‘भारत की बीमारी’ नाम से एक कविता लिखी थी …भोपाल और अन्य बहुत सारी समस्याओं को देखकर फिर से कविता के शब्द दिमाग में चमक रहे थे…पूरी कविता लिंक पर क्लिक करके पढ़ी जा सकती है ..कुछ पंक्तियाँ इधर …

बेरोजगार चुप है मगर ‌‍‍‍मृत है भत्ते की आड़ में

कैसे मैं कह सकता हूँ आज मेरा भारत महान है

जहाँ पर सिर्फ राजनीतिक गुंडो का राज है

मायावती के लिए सुरक्षा एसरायल से आती है

पर यू पी के गरीब की लड़की विद्यालय कई कि. मी. चलकर जाती है t1larg

सोनिया वायु मार्ग से गाँवों का भ्रमण करती हैं

उन्ही गाँवों में एक किसान 100 रुपये के लिए आत्महत्या कर लेता है

गाँवों के विकास से ही भारत सजता है

नही तो ये बीमार सा और नंगा सा लगता है

गुरुवार, 10 जून 2010

एक आत्मीय ब्लॉगर मिलन...कनाडा में समीर लाल के साथ एजेक्स शहर में ...

कनाडा की हर यात्रा अपने आप में एक अद्वितीय यादों की महक छोड़ रही है.  पिछली कई पोस्ट मोंट्रियल की यात्रा पर केन्द्रित थी और फिर वापस शिकागो चला गया था...पिछले सप्ताह व्यस्त कार्यक्रम की वजह से लाल परिवार से मुलाक़ात नहीं हो पायी थी.  आज टोरंटो एअरपोर्ट पर बैठा में मंगलवार की यादों के मोतियों को ब्लॉग के धागे में पिरोने बैठा हूँ.

सोमवार को एक हमने एक अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर मीट का प्लान बनाया. मैं मंगलवार को भारत का नागरिक अमेरिका से  कनाडा के एजेक्स शहर में रह रहे समीर लाल और उनकी फॅमिली को मिलने पहुंचा.   वैसे काम के सिलसिले में इधर आना हर सफ्ताह हो रहा है,  सोमवार को आकर गुरुवार को घर.  मेरी बहुत दिनों से उत्कंठा थी की समीर जी से मिला जाए.  मंगलवार को सुबह समीर जी ने पूरा स्टेप बाई स्टेप ईमेल भेज दिया, कैसे टोरंटो से उनके घर का रास्ता तय करना है, बस जैसे वो हाले दिल कविता में कहते जाते है, मैं वो स्टेप पढ़ते पढ़ते पूरा राश्ता बिना किसी परेशानी के तय कर गया.

६:१८ शाम की ट्रेन ऑफिस से १० मिनट पैदल चलने पर मिल गयी थी और एजेक्स ट्रेन स्टेशन पर प्रभु स्वयं कार लेकर पार्किंग लौट में खड़े थे.  गले मिले तो बड़ा ही आत्मीय सुख मिला.  जैसे की बिछड़े भाई मिल रहे हों.  जैसे ही घर पहुंचा साधना जी ने भी गर्मजोशी और आत्मीयता से स्वागत किया.   हलकी फुल्की बातें,  ब्लॉग की शुर्खियाँ और आसपास के बारे में बात करते रहे.  लाल परिवार के बारे में जाना,  और अपने को भी परिवार में ही शामिल पाया.  गपशप चलती रही, बीच बीच में साधना जी के बनाए समौसे और भारतीय नमकीन के चटखारे चलते रहे.  मौका मिलते ही रास्ते में लिखी एक कविता सुनायी मैंने ...

बड़ा था उत्साह हमें आपसे मिलने का
जानने का, बतियाने का
मंद मंद मुस्काने का

धुंध धुंआधार से निकली
उडती तश्तरी में उड़ने का
रूबरू होने का एजेक्स घूमने का

और क्या लिखूं
हिंदी के लिक्खाड़ के सामने
चला आया गुर भी सीखने ब्लॉग का

नीचे बेसमेंट  में बैठे रहे,  हिंदी ब्लॉग के विकास के बारे में चर्चा चलती रही. समीर जी का पुस्तकालय देखा,  हिंदी के लिक्खाड़ ऐसे ही नहीं बन गए,  बहुत पढ़ते है.  में तो खैर जब तक रुका ...कुछ न कुछ सीखता ही रहा.  समीर जी की कुछ खूबशूरत रचनाएँ सुनी, जिनमें जमीनी हकीक़त और देश की सौंधी सौंधी खुशबू महक रही थी.  हम दोनों में ही देश की मिटटी की याद हर वक़्त, हर बात में झलक रही थी.  दोनों में क्या तीनों देश की याद और पुराने दिनों के सुनहरे दिनों को याद करते रहे. 

इसी बीच समीर जी अपने हस्ताक्षर सहित , मुझे अपनी कृति 'बिखरे मोती' भेंट की. समीर जी के काव्य संग्रह 'बिखरे मोती' से एक कविता की कुछ पंक्तियाँ इधर लिख रहा हूँ ...जिनमें देश जाते समय का और फिर जब लौटे है ..तब का दर्द झलक रहा है ....

समय कैसे पंख लगा कर उड़ गया
कल ही तो मैं घर आया
कल लौट के वापस जाऊंगा
कुछ यार मिले, कुछ बातों की
यादों की बरसातों की
उन गलियों को फिर से घूमा
जिसने मेरा बचपन चूमा ......
...................................
('बिखरे मोती'  से ....)

कुछ देर फिर हमने बात की अन्य हिंदी  ब्लोग्गेर्स और उनके योगदान के बारे में.  समीर जी अपने से पहले वाले ब्लोग्गेर्स का जिक्र और उनकी महत्ता को जरूर बताते हैं.  फिर उत्तरी अमेरिका में और कैसे हिंदी का प्रचार प्रसार किया जाए, के बारे में चर्चा चलती रही.  मैंने शिकागो में कवि सम्मलेन का प्रस्ताव रखा तो समीर जी ने पूरे सहयोग और अपने पुराने अनुभव के हिसाब से मार्गदर्शित किया.  कुछ फोटो भी खींचे गए इस बीच ...


डिनर का समय हो चला था,  सबने काव्य पाठ भी किया...विडियो या ऑडियो समीर जी पोस्ट करेंगे.  साधना जी ने एक बहुत ही बढ़िया रचना पड़ी.  उनके स्वर ने समीर जी की उस रचना में चार चाँद लगा दिए.  


चलो अब बारी थी छप्पन भोग से भी जो अच्छा खाना होता है उसकी.  साधना जी ने बहुत सारे पकवान तैयार किये थे.   फोटो में देखोगे तो खुद को रोक नहीं पाओगे  .....बहुत खाना खाया, जी भर के खाया !!


यहाँ इंगित करना चाहूँगा की समीर जी भी बहुत पहुंचे हुए रसोईये हैं.  सीक्रेट का भंडाफोड़ कर ही देता हूँ ... चिक्केन के अलावा जलोपीनो मिर्ची का एक व्यंजन ऐसा बनाया था की जीभ रो रही थी फिर भी खाए बिना मन मान ही नहीं रहा था.  जबरदस्त, मस्त मस्त, स्वादिष्ट !!  रात से ज्यादा असर सुबह दिखा -:)

ये रहे रसोई के रसूखदार प्याज काटते हुए :)....

आइसक्रीम, और मीठे मीठे आम खाने के बाद और थोड़ी देर बैठे ...फिर ट्रेन का टाइम हो चला था और इधर मेरी फ्लाईट उड़ने वाली है, इसलिए लिखना बंद करना पडेगा .....समीर जी की चिड़ियों से मिलने के बाद, ढेर सारी यादें समेट कर, ज्ञान लेकर, आत्मीय प्यार पाकर और एक बड़ा भाई पाकर हम लगभग अर्धरात्रि के समय स्टेशन की ओर चल दिए .....



और भी बहुत कुछ है लिखने को ....कुछ बाद में लिखूंगा समय की कमी है अभी ओर कुछ समीर जी की पोस्ट में आएगा ....इन्तजार करते रहिये ....

- राम फ्रॉम बिली बिशप एअरपोर्ट टोरंटो