हिंदी - हमारी मातृ-भाषा, हमारी पहचान

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए अपना योगदान दें ! ये हमारे अस्तित्व की प्रतीक और हमारी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है !

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रविवार, 28 नवंबर 2010

ब्लॉग्गिंग से कमाया धन

हिन्दी ब्लॉग्गिंग विधा ने एक वातावरण पैदा किया है जहाँ पर कई ब्लॉगर एक परिवार की तरह एक दूसरे के दुःख सुख और वैचारिक आदान प्रदान में शामिल है.  कुछ लोग ब्लॉग्गिंग से धन कमाने की अपेक्षा करते हैं तो कुछ देश सुधार की !  मुझे लगता है कि हिन्दी ब्लोगिंग से कुछ तो सार्थक हुआ है :

१. एक अमूल्य धन की कमाई जिसमें कई अनजान लोग विचारों के आदान प्रदान से एक दूसरे के नजदीक आये, घनिष्ठ मित्र बने.

२. हिन्दी का एक तरह से विकास हुआ है, हिन्दी में लेखन से इन्टरनेट पर हिन्दी में उपलब्ध सामग्री की प्रचुरता बढ़ी है

३. जिन लोगों की हिन्दी लेखन में रूचि थी उनको एक वातावरण मिला है, प्रोत्साहन मिला है, रूचि जागी है और प्रतिस्पर्धा ने कई लोगों में लिखने और पढने का जुनून पैदा किया है

मेरी इस बार की भारत यात्रा का एक पहलू ब्लॉग्गिंग मित्रों से मिलना भी था, अब तक फोन पर कई मित्रों से बात हुई और हर एक से आत्मीयता भरे सम्बन्ध ही बने हैं,  मैं पहली बार किसी ब्लॉगर से मिला था २००९ में, तब मैं मुरैना निवासी भुवनेश शर्मा से मिला था,  भुवनेश से बात करना और उनके लेखो को पढना दोनों से ही मुझे कुछ न कुछ सीखने को मिलता था और जब मिला तो और भी अच्छा लगा, कल वो फिर मिलने ग्वालियर आये और घंटो हम बात करते रहे, कई विषयों पर ! कल उन्होंने माननीय दिनेशराय द्विवेदी से भी फोन पर बात कराई, द्विवेदी जी के ब्लॉग पर मेरा तो नियमित जाना बना रहता है पर बात करके और भी ज्यादा अच्छा लगा ! 

इसी तरह प्रवीण पाण्डेय के हिन्दी लेखन का में बड़ा प्रशंशक हूँ,  एक-दो बार फोन पर अल्प समय के लिए बात हुई है !   समीर लाल से कनाडा में हुई मुलाकात ने एक और घनिष्ट मित्र दिया तो पाबला जी, बिल्लोरे जी, महफूज मियां इन सबसे बात करके भी इनको और नजदीकी से जानने का मौका मिला !  रवींद्र प्रभात,  राज भाटिया जी, जय झा  से भी फोन पर बात हुई है और शायद ये सिलसिला चलता रहेगा ! अर्चना चाव जी, और अजित गुप्ता जी से भी बात करके आशीर्वाद लिया है.  अनूप शुक्ल जी,  शिखा जी, अभिषेक झा, अजय झा और अन्य लोगों से भी चेट पर बात होती रहती है.

इसी सिलसिले को आगे बढ़ाया इस शुक्रवार को ललित जी और खुशदीप जी ने,  एक संकट मोचक की तरह निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर एक आत्मीय मुलाकात ने मुझे दो और मित्र दिए.  दिल्ली महानगर में वर्किंग डे के दिन सुबह ८ बजे स्टेशन कौन आ सकता है, पर हमारे देश भावना प्रधान है जहाँ आलस या फिर और विकार भावों के सामने हावी नहीं रह पाते !   मेरे पास कुल मिलाकर छोटे से लेकर बड़े तक १० बैग थे और दो बच्चे :)  …कुली सामान को स्टेशन के बाहर से प्लेटफोर्म पर रखकर जा चुका था और जब गाडी आकर लग गयी तो फिर जद्दोजहद थी की कैसे सामान को अंदर रखा जाय, किसी एक को बाहर रखवाली भी करनी थी, पर समय बहुत था – लगभग ३५ मिनट तो सोचा कि धीरे धीरे खुद ही चढाते हैं पर तभी दो संकटमोचक मित्र उस समय आते हैं और सब काम एक मिनट में हो जाता है, बच्चे भी खुश हो गए और फिर बातों का सिलसिला ऐसा चला कि लगभग २५ घंटे की थकान कब दूर हो गयी - पता ही नहीं चला - बातों में ऐसे मग्न हुए कि ट्रेन जब चलने लगी तब मैं भागते भागते चढा !

कौन कहता है कि ब्लॉग्गिंग से कमाई नहीं होती :)

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रविवार, 10 अक्टूबर 2010

वर्धा और बिरयानी घर

न्यूयार्क के फायनेन्शियल केंद्र के बीचों बीच लगे खाने के ठेलों के बारे में पहले भी लिख चुका हूँ, इस गुरुवार को एक दोस्त जब फिर से इधर खींच ले गया तो अचानक से निगाह पडी एक ठेले पर - जिस पर हिंदी में उसका नाम लिखा था, हिंदी प्रेमी को तो उससे प्रभावित होना ही था !  उसी से शाकाहारी बिरयानी ली गयी चटपटे मसालों के साथ ! इन ठेले वालों पर आर्थिक मंदी का असर न्यूयार्क में कभी भी नहीं दिखा,  लंच के समय पर फलाफल इत्यादि के लिए लगी लाईनें कभी कम नहीं देखी - जब भी उधर जाना हुआ ! क्यों होंगी  - सस्ता - मसालेदार और चटपटा कौन नहीं खाना चाहता - चाहे लोग कितना भी स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हों, एक न एक दिन तो न्यूट्रिसनविहीन सबको चलता है !

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चटपटे से ध्यान आया कि ब्लॉग्गिंग में भी अपने ब्लॉग को हिट करने को लेकर ऐसे चटपटे मसाले परोसने वाले ब्लॉग खूब चलते हैं, और चलेंगे भी, वैसे भी ब्लॉग्गिंग तो मन की अभिव्यक्ति का एक लाइव माध्यम जो है,  लोग जो मन में आया लिख सकते हैं, कुछ शौक के लिए तो कुछ कमाई के लिए  ! 

वर्धा में भी हिंदी ब्लोग्गिंग के ऊपर एक कार्यशाला चल रही है जिसमें ब्लोग्गिंग के मापदंड तैयार करने के बात हो रही है,  कुछ लोगों ने थोडा बहुत गंभीर लिख दिया तो लोग उससे देश सुधार की उम्मीद लगा बैठे, क्या ये संभव है  ? क्या ब्लोग्गिंग पर आचार संहिता लगाना व्यवहारिक है ?  या ये सब करना एक मजाक है - मेरे हिसाब से से ये समय और पैसे की बर्बादी है !  ब्लोग्गिंग एक ऐसी विधा है जिसे लोग अपने मन की बात खुले में जब चाहे तब एक सार्वजनिक मंच पर बिना किसी प्रतिबन्ध और दबाब के बयाँ करने के लिए उपयोग में लाते हैं !  इससे देश सुधार कैसे हो ?  देश के सुधार के लिए पहले जो हम सबको करना होगा - वो है अपने वोट का सही उपयोग - एक प्रजातंत्र में साफ सुथरे प्रतिनिधि भेजना सबसे अहम कर्तब्य होता है, क्या वह हम सब तथाकथित बुद्धिजीवी लोग करते हैं या कर रहे हैं?  तो क्या फिर ये कार्यशाला इस बात पर केंद्रित नहीं होना चाहिए कि कैसे हिंदी ब्लोग्गिग को  हिंदी लिखने वालों के लिए सुलभ और उपयुक्त बनाए जाए, और कैसे  इसके बढावे के लिए प्रायोजक ढूंढें जाए जो अपने ads से और लिखने वालो को एक लोभ से ही सही - पर प्रेरित जरूर करे !    ब्लॉग्गिंग के भी क्या मापदंड बनाने ! हम हिन्दुस्तानी लोग बहुत भावुक होते हैं और इस लिए हर चीज में संघठन और समूह पहले बनाने लगते हैं !  ब्लोग्गिंग में भी यही कुछ कभी कभी होता रहता है, लिखने से ज्यादा लोग अपने आप को एक ग्रुप विशेष का मुखिया बनाने की मुहिम में जुड जाते हैं !  और कुछ लोग अपने आप को ब्लॉग्गिंग का प्रतिनिधि और शुभचिंतक समझ हर इन समारोहों में शिकरत की उम्मीद पाल बैठते हैं और फिर परेशान भी होते हैं जब अपेक्षाएं खरी नहीं उतरती !!

हिंदी ब्लॉग्गिंग हो या किसी और भाषा की ब्लॉग्गिंग, उसे नेतृत्व की कोई जरूरत नहीं और ना ही कुछ लोग किसी स्वतंत्र ब्लॉग्गिंग का प्रतिनिधित्व या विरोध कर सकते हैं, ये तो स्वतंत्र छाप है आपके व्यक्तित्व की, यहाँ भी एक विशेष परिभाषा में आप बंधकर कैसे रह सकते हैं ?  कुछ लोग फोटो छपने से खुश तो कुछ सिर्फ बुलावा आने पर खुश, और कुछ ऐसे भी हैं जो न बुलाये जाने पर दुखी भी है और कुछ पारदर्शिता के नाम पर सरकारी खजाने को लुटाए जाने पर दुखी हैं तो कुछ इसके संयोजक बन वाहवाही लूटने में खुश ! वही सब जो नेता करते हैं, – गुटबाजी - वही हम करने लगे तो फिर ये ब्लॉग्गिंग निरपक्ष नहीं, ये फिर ब्लोग्गिंग नहीं , दर्पण नहीं आपने व्यक्तित्व का - बल्कि एक दिखावा है  !

लोगों के पास इतना समय कहाँ से आता है व्यर्थ की गुटबाजी में संलग्न रहने का, मैं तो लिखता हूँ जो मन में आता है इसे उकरने को !  इन मठों का सदस्य बनने की दरकार नहीं है मेरी !

वैसे बिरयानी घर का ठेला लगाने वाला बांग्लादेश का रहने वाला है, पर बिरयानी बड़ी मजेदार बनायी उसने बिलकुल देशी - चटपटी ! 

देश सुधार तब कर पायेंगे जब खुद को एक आदर्श बना कर जी पाओगे !

फिर भी --- आयोजको को बधाई ! और दुखियारों को सलाह - एक और आयोजन कर लो :-))

मंगलवार, 22 जून 2010

एक पग और बढ़ा…

 

imagesबहुत दिन से जद्दोजहद चल रही थी की कैसे हिंदी लेखन के लिए एक ओफलाइन टूल को लैपटॉप पर डाला जाए. अभी तक करीब कुल मिलाकर लगभग १०० से ऊपर पोस्ट हो गयी होंगी मेरे तीनों ब्लोग्स पर, सारी ब्लोग्गेर्स के टाइपिंग एडिटर को उपयोग में लाकर ही लिखी गयीं थी.  बहुत टाइम कोन्सुमिंग टास्क था.  कई बार लिखते लिखते बाद में एडिट करना पड़े तो बहुत मुश्किल होती थी, ओनलाइन होकर ही लिख पाता थे, ऐसी कई परेशानियाँ आती थी.   पर हिंदी में लिखने की चाह थी तो बस लिखता गया, पर हाँ उतना नहीं भावों को बिखेर पाया जितना चाहता था. 

आज सुकून सा अनुभव कर रहा हूँ जब गूगल का हिंदी और अंग्रेजी में स्विच करने वाला टूल भी इंस्टाल हो गया और ब्लॉग से डिरेक्ट कनेक्शन के लिए विंडो लाइव भी इंस्टाल कर लिया है. अब जब चाहे लिख कर रख सकता हूँ . थोड़ी सुविधा और सुगमता रहेगी. 

IME (गूगल का हिंदी और अंग्रेजी में स्विच करने वाला टूल )

  • पहले बार बार एक जगह हिंदी में टाइप करके कॉपी पेस्ट करना पडता था, कमेन्ट देने इत्यादी के लिए
  • किसी भी विंडो पर अब अल्त+शिफ्ट दबा कर कीबोर्ड अपने आप हिंदी में लिखने के लिए परिवर्तित हो जाता है.
  • सोफ्ट कीबोर्ड भी ओंन कर सकते हैं अगर टाइप करने में समस्या है

विंडो लाइव

  • सीधे सीधे एडिटर से ही ब्लॉग पर पोस्ट करने की सुविधा देता है
  • एडिट करके एक से अधिक बार भी पोस्ट करेंगे तो ये पोस्ट को डुप्लीकेट नहीं करेगा
  • लिखकर छोड़ दो और पब्लिश का टाइम सेट कर दो, अपने आप उस टाइम पर पब्लिश हो जाएगा आपका चिटठा
  • एडिटर भी बहुत सरल है और कई फीचर देता है,  फ्लेक्सिबल है
  • एक से अधिक ब्लॉग जोड़ सकते है, और जब लिख रहे हों, या पब्लिश कर रहे हों तो सम्बंधित ब्लॉग को सेलेक्ट कर लो
  • आपके ब्लॉग के फॉर्मेट, फॉण्ट इत्यादी को इम्पोर्ट कर लेता है ये, तो ऐसा लगेगा कि आप ब्लॉग पर ही लिख रहे हों

चलो इतने दिन के आलस के बाद कल की सक्रियता ने कुछ कमाल दिखाया.  खैर और भी उपयोगी टूल होंगे मार्केट में, पर अभी तो यही काफी सुविधाजनक लग रहा है.  धीरे धीरे एवोल्व होगा, शायद जीवन का यहीं नियम है की सीढियाँ चढते जाओ, कोई जल्दी चढता है तो कोई मेरी तरह धीरे धीरे. 

एक प्रश्न -  हिंदी के पूर्ण विराम के लिए यूनिकोड क्या होगा अभी तो डॉट से काम चलाना पड़ रहा है  ?

176025780_755491 खैर टोरोंटो में G20 Summit की वजह से इस हफ्ते घर से ही काम करने का मौका भी एक सुकून ही दे रहा है.  टोरंटो को कनाडा की सरकार ने कुछ हफ्तों पहले से ही छावनी में तब्दील कर दिया है,  बैरिकेट्स लगा दिए गए थे सडकों पर,  कुछ सडकें यातायात के लिए बंद कर दी गयीं थी, पुलिस वाले भी बहुत दिखते थे चारों G20_fence_716343gm-aतरफ.  सुना है इस हफ्ते तो ऑफिस में किसी को आने ही नहीं दे रहे सुरक्षा कारणों से.  मेरे ऑफिस के लोग जो लोकल हैं, उनको घर से ही काम करने के लिए बोला गया है. कदाचित ये हालत न होतीं अगर G20 अपने उद्देश्यों पर खरा उतरा होता.  सबकी आपनी अपनी समस्याएं हैं, अपने अपने राग हैं, बस सरकारों के विशाल दल इन समारोहों में औपचारिकता पूरी करने चले आते है.  सुना है कि कनाडा की सरकार ने १ बिलियन डॉलर इस समारोह के आयोजन पर  खर्च कर दिया है.  ये उसी तरह है जैसे मुकेश अम्बानी IPL में खर्च करते हैं, अर्थात मार्केटिंग के लिए. कनाडा  जैसे अमेरिका का छोटा भाई टाइप देश के लिए ये एक अच्छा मौका है अपने आप को मार्केट करने का.  खैर हमें तो फायदा ही मिला इस सबसे, एक वीक का ट्रेवल बच गया.

images हमारा भारत भी तो एक आयोजन में व्यस्त है, चलो उधर तो मार्केटिंग के सहारे नेताओं की जेबें हरी हो रही होंगी और मजदूर बेचारा डैड लाइन के भय में अपना डबल पसीना बहा रहा होगा.  फिर भी कुछ तो कदम आगे बढ़ ही रहे हैं. यानी हम एवोल्व हो रहे हैं, यही जरूरी है. आप भी अपना योगदान दे सकते हैं. देखिये ये विडियो…

आजकल मौसम ने भी हम पर मेहरबानी कर रखी है, रोज बारिश हो जाती है तो गर्मी उतना कष्ट नहीं दे रही. पहले गर्मी के लिए तड़प, और जब गर्मी आ गयीं तो हलकी हलकी बूंदों के लिए मन तरसता है, मन की संतुष्टि अंतहीन है !!

ages कुछ कहना था ब्लोग्वानी और चिट्ठाजगत के बारे में चल रही सार्थक या असार्थक बहस के बारे में. मेरे हिसाब से पक्ष, निरपेक्ष या गुटनिरपेक्षपन की ये लड़ाई जो कभी कभी गैंगवार का रूप ले लेती है , शीर्ष पर आने या त्वरित पापुलर होने के चक्कर में हो रही है.   तो अगर इतनी लड़ाई है इस छोटे से हिंदी ब्लॉग्गिंग में शीर्ष के लिए १४ हजार वें लेखक से लेकर पहले तक, तो फिर सक्रियता का गणित भी सही होना चाहिए.  मैंने अपने एक अन्य ब्लॉग में अपने इस वाले ब्लॉग का लिंक दिया १-२ बार (रेफेरेंस के लिए) तो मेरी सक्रियता में गजब का उछाल आ गया, अरे ये तो फर्जी काम हुआ मेरी ओर से, इसी लोजिक या लालसा ने कुकुरमुत्ते के पेड़ की तरह अनगिनत चिट्ठे चर्चे खोल दिए , जिनका उद्देश्य इस गणित के इर्द गिर्द ही था. सब सक्रियता के पीछे पड़े हैं, कंटेंट पीछे छूट रहा है :) 

बात अगर ब्लोगवाणी या चिट्ठाजगत के महत्व की है तो ये अपने हिसाब से बहुत कुछ योगदान कर रहे हैं, हिंदी के सारे ब्लॉग को एक जगह लाने में और लोगों को ब्लोगों पर लाने में.  जो लोग इन दोनों के बिना काम नहीं कर सकते, वो बस नदी में कूद कहीं भी गोता लगाना चाहते हैं.  उनके लिए कंटेंट महत्वपूर्ण ना होकर हर चिट्ठे पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना ज्यादा मायने रखता है.  एक - दो लोग ऐसा करें तो उनके कुछ कारण हो सकते है जैसे - उत्साहवर्धन करना इत्यादी. पर सब करें सब ब्लोगों को नापने का काम तो ये भेडचाल है. और लग रहा है कि आप टाइम को खराब कर रहे हैं, कुछ तो खुद की चोइस होनी चाहिए,  अगर है तो गूगल रीडर में या अनुसरणकर्ता बन कर उनकी लिस्ट बना लें, फिर क्या फर्क पडता है किसी के होने या ना होने का :)

मेरे हिसाब से अगर ये Aggregators अपना फोर्मुला , लोजिक सही कर लें तो बहुत हद तक तलवारें नियंत्रण में लायी जा सकती है ओर फिर ऊर्जा बढ़िया लिखने में लगायी जा सकती है.  मैं भी क्या लेकर बैठ गया ….जिनके पास बिषय नहीं उनके लिए तो ये सब विवाद रामवाण हैं .    एक मामूली सा लोजिक सक्रियता आंकड़ा सही करने का …हिट्स के आधार पर …

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रही बात नापसंदी की तो कबीर दास पता नहीं क्यों बोल गए थे की “निंदक नियरे राखिये आँगन कुटी छबाय…..” क्या कोई पालन करता है इसका ? आजकल तो NGO भी अपनी निंदा नहीं सुनना चाहते !!

 

बहुत पहले ‘भारत की बीमारी’ नाम से एक कविता लिखी थी …भोपाल और अन्य बहुत सारी समस्याओं को देखकर फिर से कविता के शब्द दिमाग में चमक रहे थे…पूरी कविता लिंक पर क्लिक करके पढ़ी जा सकती है ..कुछ पंक्तियाँ इधर …

बेरोजगार चुप है मगर ‌‍‍‍मृत है भत्ते की आड़ में

कैसे मैं कह सकता हूँ आज मेरा भारत महान है

जहाँ पर सिर्फ राजनीतिक गुंडो का राज है

मायावती के लिए सुरक्षा एसरायल से आती है

पर यू पी के गरीब की लड़की विद्यालय कई कि. मी. चलकर जाती है t1larg

सोनिया वायु मार्ग से गाँवों का भ्रमण करती हैं

उन्ही गाँवों में एक किसान 100 रुपये के लिए आत्महत्या कर लेता है

गाँवों के विकास से ही भारत सजता है

नही तो ये बीमार सा और नंगा सा लगता है

शुक्रवार, 11 जून 2010

ब्लॉग्गिंग : सर्वश्रेष्ट ब्लॉगर और सर्वाधिक पाठकों की कस्स्मकस का गणित वारेन बफेट के पन्नों से

कल जब फ्लाईट में बैठा हजारों फीट की ऊंचाई पर उड़ रहा था, तभी एक पुस्तक  मैं मान्यनीय वारेन बफेट के बारे में पड़ रहा था. कुछ ही पन्ने पढ़े थे, पर जो निष्कर्ष निकल रहे थे उन पन्नों से वो बहुत हद तक जिंदगी और ब्लॉग्गिंग की दुनिया में चल रहे उहापोह से काफी हद तक मेल खा रहे थे ...

जैसे कौन है सर्वश्रेष्ट ब्लॉगर :
वारेन बफेट अमेरिका के जाने माने अरबपति है जिन्होंने अपना पैसा स्टोक्स में इन्वेस्टमेंट के जरये कमाया. बहुत ही सरल और साफ जीवन जीने वाले इंसान हैं और अंको के महारथी हैं.  महारथी बनने से पहले उन्होंने कुछ अपने पिता से सीखा और बहुत कुछ अपने गुरु बेंजामिन ग्राहम से सीखा. दोनों ने मिलकर साथ साथ एक कंपनी भी चलाई, पर अंत में वारेन साहब लम्बी रेस के घोड़े निकले और अभी तक दौड़ में हर किसी से आगे है.  तो ब्लॉग्गिंग में आप बहुत दिनों से हैं,  या पहले ब्लॉगर हैं, उससे आपकी सर्वश्रेष्ठता साबित नहीं होती,  हो सकता है की आपसे ही कुछ सीखकर मैं और भी अच्छा लिखने लगूं.  ब्लॉग्गिंग में अच्छा होने के लिए आपको जमकर पढ़ना पड़ेगा और थोडा रचनात्मक भी होना पड़ेगा.  अच्छा और आकर्षक कंटेंट ही आपको आगे ले जाएगा.   तो इधर सीनियर / जूनियर  और पहले मैं और आप का झगडा बंद करके अपनी मौलिकता पर ध्यान दिया जाए तो सही रहेगा.  वैसे भी ब्लॉग तो आपकी डायरी है, आपके स्वभाव या जानकारी का दर्पण है इसलिए इसमें तुलना कैसी ...हर किसी का अपना तरीका और हर किसी का अपना अद्वितीय भाव होता है जो आपको इधर दिखेगा.  तो लिखो जो मन कहे...!!  पर भावों पर अनुशाशन रख कर !!

कैसे अधिक से अधिक पाठक आयें....
जब वारेन बफेट साहब  कंपनी खरीद और बेच रहे थे उस समय कई बार ऐसा टाइम आया जब उनको इन्स्योरेन्स बिज़नस के लिए काफी चुनौती मिल रही थी और सस्ते प्रीमियम वाली कंपनियों से.  पर उन्होंने ध्यान गढ़ाये रखा अपने अच्छे कस्टमर बेस पर और कुछ सालों बाद वो सस्ती कंपनी बंद हो गयीं और वारेन साहब अब तक हैं . 
मेरा मानना है की आप अपने चुनिन्दा पाठको से यात्रा जारी रखें, ऐसा होने से आपको सुधरने का टाइम भी मिलता रहेगा. कम लोग पाठक होंगे तो ज्यादा रूबरू होकर दिल से लोग कमेन्ट करेंगे और ऐसे लोगों के हिसाब से आप जो सोचते है वो मौलिक लिख भी पायेंगे. और धीरे धीरे आपके कंटेंट के सहारे आप इस बौद्धिक समूह का दायरा धीरे धीरे बढ़ाते जायेंगे.  कुल मिलकर ब्लॉग को अपना दर्पण मानें तो संतुष्टि और सफलता दोनों आपके पास होंगे.  बहुत तर्क वितर्क इस विषय पर किये जा सकते हैं इसलिए इस गणित को यहीं बंद करता हूँ.

फ्लाईट तो भौतिक उड़ान भर रही थी, इधर मन तो हर वक़्त ही उड़ता रहता है और हमें बुरे भले , स्वर्ग नरक, धूप छाँव की सैर एक पल में करा देता है.  कुछ भाव कविता संग्रह पर उड़ेले हैं -

मन रे,
ओ भँवरे
तू घूमे फिरे
सोचे विचारे
क्या क्या करे ...


ओ भँवरे
मस्ताने
क्या तेरे कहने
कैसे कहूं तुझे रुकने
कैसे रोकूँ तुझे बहने


ओ भँवरे
तेरी कभी ऊँची और कभी ओछी उड़ान
बिना किसी थकान
नापे ये सारा जहाँन


मन रे
ओ भँवरे ....


एक महिला हमारे बगल की सीट पर बैठी बैठी बार बार अपनी तनिक सी स्कर्ट को नीचे ऊपर खींचे जा रहीं थी,  खुद भी कितना असहज महसूस कर रहीं होंगी ऐसे कपड़ों में, फिर भी पहनना है बस.  एक हाथ में किताब, और दूसरे में बीयर का ग्लास,  और फिर ऊपर से कपड़ों की असहजता ....कितना परिश्रम बिना बात के !!  महिलाओं का अपमान या फिर छोटे कपड़ों पर सेंसर करने की मेरी कोई मंसा नहीं है पर शायद मुझे लगता है की हम वो पहनते  हैं जिसमें हम आकर्षक लगें और पहनने में सहज हो, ढीलाढाला न हो इत्यादि इत्यादि ....शायद वो सुश्री भी उस कपडे को फिर न पहनें ...! छोटे कपडे किसको अच्छे नहीं लगते पर एक अनुशाशन में!!  यही ब्लॉग्गिंग का हाल है ..आकर्षक और अच्छे के चक्कर में ऐसा न छापें जिससे खुद भी असहज महसूस करें. थोड़ी देर पाठक भले ही आ जायें पर फिर आप पानी की बुलबुले ही रह जाओगे.  इसलिए ज्यादा पाठको के बारे में ना सोचें तो बेहतर होगा! 

अपने भावो के साथ साथ हिंदी को भी आगे बढ़ाना है हमें और अपनी रचनात्मक प्रव्रत्ति को भी...तो चलो इस अभियान में सही गणित और खुद की सहजता का प्रयोग करें .....

बुधवार, 5 मई 2010

एक सिक्के के दो पहलू

पानी की बड़ी महिमा है ,  ये आग बुझा दे , और प्यास भी बुझा दे, और अश्रु बनकर भावों को बता देता है, ओस बनकर सुबह सूर्य की किरणों को अलोकिक बना देता है.   फसल भी इसके बिना उग नहीं पाये और प्राणी पानी के बिना जीवन को भी न जी पाये.

बिन पानी सब सून  --- पानी के बिना कुछ भी तो संभव नहीं.  नदी कि लय को और समुन्दर की विशालता को भी पानी ही परिभाषित करता है.  रेगिस्तान बिना पानी के कितना भयावह लगता है.  कभी वाष्प तो कभी बर्फ के रूप में, पानी के अनेक रूपों ने हमारे जिंदगी में एक अभिन्न सी निर्भरता ला दी है.  कही पर लिखा देखा - जल ही जीवन है.   गर्मी में पानी प्यास बुझा देता है और सर्दी में यही पानी गर्म होकर हमें ठण्ड से बचा देता है.

लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है, यही पानी प्रलय भी ला दे , बाढ़ बनकर सब कुछ मिटा दे, तैरना न आये तो आपकी जान भी ले ले. एक तरफ जीवनदायी तो दूसरी तरफ विनास का द्योतक भी. अधिक बरसे या फिर ओले पड़ जाएँ तो फसल को बर्बाद भी कर देता है.  एक जगह भरा रहे तो मच्छर और कीड़े मकोडो के प्रदूसन से आपको बीमार भी कर सकता है.

यही हम सब लोगो का हाल है,  निर्भर करता है कि हम किस रूप में दूसरो के सामने आ पाते है.  संयम और धैर्यवान हमें मसीहा बना देता है, वही हमें हमारा क्रोध सबका और खुद का दुश्मन बना देता है.  

ब्लॉग्गिंग का भी वही हाल है, टाइम पास करने का साधन भी ये हो सकता है और कुछ गंभीर मुद्दों पर चिंतन और मनन करने का श्रोत भी.  ये हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम किस दिशा में जा रहे है. 

एक चीज और, मजेदार चीज जल्दी लिखी जा सकती है - दो लाइन लिख दो चटपटी काम हो गया, या फिर किसी न्यूज़ को अपनी तरफ से एक्सप्लेन कर दो, पर कुछ सार्थक लिखने के लिए आप शोध करते है, पढ़ते है,  आंकड़े देखते है और फिर एक सूचना प्रदान करने वाला लेख लिखते  है.  गंभीर और मजेदार दोनों का मिश्रण होना भी जरूरी है,  तभी ब्लॉग्गिंग सचमुच में एक पसंद का विषय बन पाएगी , नहीं तो एक बोर और गूढ़ विषय बनकर रह जायेगी.  

मैं  हिंदी ब्लॉग्गिंग में भी लड़ाई झगड़े, प्यार, चुटकुले और गंभीर विषयों पर लेख देख रहा हूँ और दिनों दिन बहुत अच्छे लोग ब्लॉग्गिंग करने आ रहे है.  कुछ सरकारी अफसर भी है जो पता नहीं ऑफिस में काम कैसा करते है, पर इधर बहुत अच्छा लिखते है तो कुछ मेरे जैसे लोग है जो देश से दूर रहकर भी इस माध्यम के जरिये देश के पास रहना चाहते है ...कुल मिलाकर ....
क्या कोई नेता भी ब्लॉग पर है क्या ? pls dont tell me about Amar singh :)

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

आदत - पार्ट २

आदत पार्ट १ यहाँ पढिये...

अब ब्लॉग्गिंग की आदत ही देख लीजिये , एक ब्लॉग से दूसरे पर और दूसरे से तीसरे पर कूदते कूदते लिखने का टाइम ही नहीं बच पाता। कभी कभी लगता है की हमें आदत उस चीज की लगती है जो स्वभाववश सरल होती है, जैसे लिखने और पढ़ने से ज्यादा देखने की आदत जल्दी लगती है।

टीवी बच्चे इसलिए ज्यादा देखते है क्यूंकि देखना सबसे सरल काम है , लिखना और पढ़ना उससे थोडा कठिन । टीवी देखने की आदत मुझे तो टीवी वाले रोग जैसी लगती है , एक बार लग जाए तो टीवी की बीमारी जैसे शरीर को सुखा देती है, टीवी देखने की आदत आपके दिमाग को बिलकुल बंद कर देती है। मुझे याद है टीवी घर में लाने से पहले में काफी पत्रिकाएँ पड़ता था और जबसे टीवी की आदत लगी, पड़ने की आदत ही चली गयी, एक बार सोफे पर बैठो तो फिर चैनलों की कोई कमी ही महसूस नहीं होती । मेने अपना पहला टीवी ख़रीदा २००० में , १ साल दिल्ल्ली में जॉब करने के बाद, हम लोग - में और मेरा भाई उन दिनों आश्रम (दिल्ली में एक जगह का नाम है - किसी गुरु जी का आश्रम नहीं :) ) में रहते थे जब ये पहला टीवी लिया और उन दिनों स्टार प्लस 'कौन बनेगा करोड़पति' की वजह से बहुत मशहूर हो रहा था। तब से पढ़ना बंद है और लिखना तो बिलकुल ही ख़त्म :(

कुछ लोगो को सिर्फ अपनी ही बात सुनाने की आदत पड़ जाती है और या फिर खुद के समर्थन में ही सुनने ऐसी आदत पड़ती है की फिर वो अपनी दुनिया को ही, अपने बनाए या कहे हुए को ही सच मानते है, जैसे कुएं में रहने वाला मेंडक कुए को ही संसार मानने लगता है। और इस आदत से फिर जन्म होता है अहंकार या ईगो का - हमारे हिंदी ब्लोग्गेर्स भी कभी कभी कुछ ऐसे आदत के लोगो से आपस में तू तू में में करने लगते है और उद्देश्य से भटककर फालतू बहसों में उलझ जाते है । परिवार में लड़ाई झगड़े और प्यार दोनों चलते रहते है। हमें ब्लॉग्गिंग में हर तरह की कमेंट्स सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए , कुछ लोग तंग आकर ब्लॉग्गिंग से विदा होने का मन बना लेते है और मेरे हिसाब से वो फैसला ठीक नहीं। सोसल नेट्वोर्किंग पर विचारो का आदान प्रदान खुले में होता है और हमें उसके लिए खुद को परिपक्व बनाना ही होगा।

इन्टरनेट पर बैठने की आदत हो जाए और किसी दिन ये न मिले तो एसा लगता है की जीवन में कोई रस ही नहीं, चाय पीने वालो को चाय न मिले तो सर में दर्द होने लगता है और पीने वालो को एक बार पीने मिले जाए तो फिर .....!

अति सर्वत्र वर्जते - इसलिए किसी भी आदत को अति की दहलीज़ से नीचे ही रखें तो हो सकता है की वो आदत हमारे लिए रोग या परेशानी का शबब न बनेगी अन्यथा पीछा छुड़ाना मुस्किल हो सकता है ! इसी के साथ और ढेर सारी शुभकामनाओ के साथ आदत पार्ट २ की समाप्ति करते है :)