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सोमवार, 10 मई 2010

जन्मदिन उनका ........

जन्मदिन था एक महत्वपूर्ण व्यक्ति का, एक स्वजन का और एक भाई का, परम मित्र का सच्चे साथी का.  में यहाँ हूँ दूर हजारो मील फिर भी संवेदना और भावना जोड़कर रखती है, पास पास रखती है.  अमेरिका टाइम में पीछे है तो हमने कल भाभी को फ़ोन घुमाया, पता चला भाईसाहब है ही नहीं इंडिया में, वो साउथ अफ्रिका के बिज़नस टूर पर है.  भाईसाहब से मेरा रिश्ता अटूट है, एक भाई से ज्यादा वो मेरे दोस्त और मेरे सब कुछ.  सामने डेस्क पर रखी हुई फोटो जो २००७ में पुणे में उनके घर जाते समय ली थी, बहुत मधुर स्मर्तियों को ताजा करा रही है.  कई फोटो है जो में निहारता हूँ और मुझे वो बित्ताये गए मस्त पलों में ले जाती हैं.

ये स्मर्तिया जाती है २२ साल पीछे और शायद उससे भी कही ज्यादा. मेरी बुआ के लडके जो उम्र में मेरी बराबर या थोरे बहुत बड़े ..पर मेरे घरवालो ने मुझे भाईसाहब बोलना क्या सिखाया, अब वो हर किसी के भाईसाहब है. हम सब प्यार से उनको इसी संबोधन से बुलाते है.

२२ साल पहले हम दोनों ने एक ही क्लास से पड़ना स्टार्ट किया और फिर ये सिलसिला दादागिरी और भाईगिरी का लगभग १४ साल तक चलता रहा.  क्लास ७ से लेकर मास्टर डिग्री लेने तक हम एक ही क्लास में रहे, एक ही साथ एक ही छत के नीचे और एक ही मैदान के ऊपर रहे.  ये साथ अविस्मरनीय था, अद्वितीय था. दिल्ली भी साथ साथ आये और फिर २००२ में मैं विदेश क्या निकला,  फिर बस यादें ही रही.  खैर पत्नी का आगमन और एक नए दुनिया की शुरुआत, बच्चे , नौकरी और तमाम उलझाने, ८ साल निकल गए.   अब तो ईमेल पर भी उतनी बातें नहीं होती.  पत्नी बच्चे और हम सभी भाईसाहब की बहुत इज्जत करते है.  और इस जन्मदिन पर उनको इश्वर से और खुशियाँ देने की कामना करते है.

वो भी अब दो बच्चो के पिता है, और पुणे में एक सॉफ्टवेर कंपनी में कार्यरत है.  बहुत ही प्यारे बच्चे है.  भाईसाहब का खाना अगर कोई खा ले तो बस उनका फेन ही बन जाए,  मस्त खाना बनाते है.  और उनके चुटकुले ...हस हस के लोट पोट कर देंगे.  बहुत ही सकारात्मक प्रवृत्ति के इंसान है और जो भी उनके सानिध्य में रहता है, बस समझ लो वो हँसता ही रहेगा, मुस्कराहट को दूर नहीं होने देते ...में बिलकुल दूसरी साइड हूँ. 

बच्चो के साथ भाईसाहब -

वो मेरी बुआ के लडके है,  २००६ में मेरी बुआ का स्वर्गवास भाई साहब के लिए और हम सब के लिए  दुखों का  तूफान सा लेकर आया, बुआ की असमय मौत ने उनको हिला सा दिया.  बुआ तो जैसे मेरे लिए सब कुछ लुटा देते को तैयार रहती थी,  एक माँ से भी ज्यादा प्यार दिया करती थी, जब भी में उनके पास जाता या वो हमारे घर आती.  बहुत ही निश्चल , निर्विकार और ममतामयी थी.  भाईसाहब जब १२-१३ साल के रहे होंगे, तब से ही हमारे घर रहे और हम उनके घर केवल गर्मियों की छुट्टियों में ही जाते थे.  अब तो जाने का मन ही नहीं करता जब से बुआ न रही. एकाकीपन सा फील होता है. 

दक्षिण अफ्रीका में भाईसाहब -


खेतिहर भाईसाहब -

हम लोगो को इनमें रब दिखता है
सादगी की ये मूरत है
लाजबाब इनके लतीफे है
हँसी का ये वायरस है
इनका स्वभाव देवता तुल्य है
ये हमारे परिवार के भाईसाहब है , नाम या रिश्ते से ही नही अपने कर्म से भी ये भाईसाहब है.
प्रेरणा के श्रोत और अपने आप में एक मिसाल है
ये अपने आप में एक इन्सान की परिभासा जैसे लगते है
सच में कहूं तो मेरे पास वो शब्द ही नही जो इन्हे परिभाषित सच्चे अर्थो में कर सकूं........
सच में भाईसाहब आप महान हो !
<ऑरकुट पर लिखा तेस्तिमोनिअल>