हिंदी - हमारी मातृ-भाषा, हमारी पहचान

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए अपना योगदान दें ! ये हमारे अस्तित्व की प्रतीक और हमारी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है !

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

अखंड भारत !!

जल रहा है कश्मीर, देखने में तो पत्थर फेंके जा रहे हैं पर मंच के पीछे घिनौने राजनीतिक दांव पेंच फेंके जा रहे हैं ।  गरीब लोग जो हर जगह गुमराह और गुमनाम रहते हैं, यहाँ पर भी प्रतिघात के शिकार हैं और दिखावे के लिए  पत्थर फ़ेंक रहे है पर अन्दर ही अन्दर रोटी  की कसक खाई की तरह गहरी  होती जा रही है पर सत्ता और प्रभुसत्ता के गलियारों में बैठे, प्रजातंत्र के आकाओं पर जो २१ वीं सदी के महानायक भारत के कर्णधार बने बैठे हैं और भूमंडलीकरण के युग में भी छद्म साम्प्रदायिकता को परिभाषित करने में ही उलझे हुए हैं , किसी को याद नहीं की यहाँ अमन था कुछ सालों से, किसी को परवाह नहीं उस अमन के बेला को क्षणिक से स्थाई बनाने का  । 

खैर प्रयास कुछ भी, कर लिया जाए अमन यहाँ क्षणिक ही होगा, उसके लिए जिम्मेदार है हमारे देश में साम्प्रदायिकता शब्द का गलत प्रयोग  ।  जब कुछ कठोर निर्णय लेने की बात आती है तो ये शब्द जरूर आड़े आता है और जब चुनाव हों तब तो इस शब्द की छत्रछाया में ही जैसे चुनाव की तपन से शीतलता मिलती है  ।  जब भारत का संविधान बना तब परिस्थितियां बहुत ही अलग थी , हम अधीन थे , और स्वतंत्रता के लिए एक तड़प थी की किसी भी कीमत पर बस मिल जाए और तब जो उस समय समझौते हो सकते थे , हमने किये  ।  पर उस बात को ६० से ज्यादा साल बीत गए हैं और आज हम विश्व के मानचित्र पर एक अलग स्थिति में हैं , आज समय ६० साल आगे आ चुका है , क्या फिर संविधान जो इधर उधर से नक़ल मारा गया था , कुछ संशोधित नहीं हो सकता क्या  ? 
कब तक हम संविधान के उन पहलुओं पर नजर नहीं डालेंगे जिनसे अखंड भारत के अंगों में एक असहजता है , बात भूमंडलीकरण की करने वाले हम लोग अपने ही घर में अलग अलग नियम बना बैठे  ।   

इधर अमेरिका में जब बच्चे शैतानी करते हैं तो उनके टाइम आउट दिया जाता है , बच्चों पर जोर जबरदस्ती या मारपीट के बजाय उनको एकांत में छोड़ दिया जाता है  या फिर एक कमरे में बंद कर कुछ समय तक घर का कोई सदस्य उससे बात नहीं करता , isolation  कर दिया जाता है कुछ देर तक !  पर ये कुछ देर के लिए होता है जिससे उसको समझ आ जाए की बिना बात सुने वो परिवार का सदस्य नहीं रह पायेगा और एकाकीपन कितना बुरा होता है ये दिखाने के लिए  ।   हमने कश्मीर को इतना एकाकीपन दे दिया की अब वो परिवार का सदस्य बनने तैयार ही नहीं, ये एक रोग हो गया उसके लिए अब ।   ऐसा एकाकीपन जहाँ न कोई उद्योग है और ना ही कोई बड़ा औधोगिक घराना वहाँ अपने आप को स्थापित करना चाहता है , हाँ एक उद्योग जरूर है - चरमपंथ का ! जब आप बेरोजगार हों और बच्चे भूख में एक रोटी का टुकड़ा मांग रहे हों तो आप किसी भी नौकरी के एक ब्रेक के लिए पागल हो जाते हैं और तब ये नहीं देखते की क्या अच्छा या बुरा है , तब बस आपको पैसा और बच्चों के मासूम चहरे नजर आते हैं !  

भारत सरकार ने कश्मीर के लिए अनगिनत आर्थिक पैकेज दिए पर सब नेताओं और मुल्लाओं की जेब में गए, हिन्दू पंडित पलायन करते रहे और मुस्लिम बच्चे अपना भविष्य खोते गए , नुकसान हर कश्मीरी को हुआ , हर भारतीय को हुआ और हमारी अखंडता को हुआ , फले फूले तो सिर्फ जो दिल्ली, श्रीनगर के वातानुकूलित कक्षों में बात - श्रीनगर से जम्मू राजधानी बदलते रहे !  डलझील और बर्फ से ढंके खूबसूरत धरा के मनमोहक स्थल सूने पड़े रहे पर श्रीनगर से जम्मू राजधानी मौसम के क्रंदन से शिफ्ट करने वाले कर्णधारों को एक पल भी ये अहसास नहीं हुआ के जनता  उनके व्यवहार से , जम्मू और कश्मीर उनके गैरजिम्मेदाराना इरादों से कितनी क्रंदित और पीड़ित है  ।  जम्मू के पंडित पलायन करते रहे, नरसंहार से पीड़ित होते रहे और सैनिक अपनी बहादुरी के बदले लोगों की गली खाते रहे पर ये नेता हमेशा चुन चुन कर विधान सभा और ससंद तक आते रहे , ये कभी एक ठोस निर्णय नहीं ले पाये, एक ठोस  दृढ दिशा तय नहीं कर पाये , एक पाले में सब बैठकर सर्वहित में कभी सोच ना पाये !  राजा हरीसिंह से लेकर , ऐयाशी फारूक साहब तक , राहुल लाला से लेकर युवा रुबिया सईद तक सब के सब भ्रमित ही रहे , फारूक अब्दुल्ला को केंद्र में मंत्री बनने से ही फुरसत नहीं और अब तो क्रिकेट , मंत्रालय और पार्टी सब कुछ संभाल रहे हैं पर अपनी मात्रभूमि को नहीं संबाल पाये ...क्यूं  ??

ऊपर लिखी पीड़ा का एक ही रोग है , एकाकीपन कश्मीर का और वो आता है धारा ३७० की वजह से ! बाकी भारत के लोग कश्मीर में उद्योग कर नहीं सकते,  फिर वहाँ कैसे विकास हो , क्या बिना रोजगार पैदा किये कभी शांति और अमन की उम्मीद की जा सकती है  ? क्या बिना रोजगार के संसाधन उपलब्ध कराये बिना कभी दिए गए आर्थिक सहायता कारगर हो सकती है ?  नहीं ...कभी नहीं ! 
फिर क्यूं एक ठोस निर्णय नहीं लेते हम इस धारा को समाप्त करने का  ?  ६० साल बाद भी सडांध मार रही इस धारा को क्यों नहीं काट देते जो पूरे शरीर की विषैला कर रही है और हमारी अखंडता के लिए एक चुनौती पैदा कर रही है ?  बहुत हो गया टाइम आउट कश्मीर का , चलो अब बुला लो उनको इधर और हम भी चलें उस जमीन पर इस एक्ट को धाराशायी कर !  फिर देखो - जब उद्योग होंगे , रोजगार होंगे - तब सिर्फ विकास होगा और ये फेंके जा रहे पत्थर लोगों के घरों के कंगूरे बनेंगे ना की गलियों के रोड़े !  फिर युवा फसबूक पर पत्थर फेंकने की गैंग ना बनाकर अपने भविष्य और भारत के भविष्य की बात कर रहे होंगे और तब फारूक भी क्रिकेट और दिल्ली छोड़ शायद श्रीनगर में रहने का मन बना रहे होंगे !   

आशा है की आज नहीं तो कल ये article ३७० ख़त्म होकर  कश्मीर को भारत से जोड़ पायेगा !!  क्यूंकि - सत्यमेव जयते - और आज का सत्य यही है की भारत की अखंडता ही सबसे बड़ी शक्ति है !! 

8 टिप्‍पणियां:

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
साहित्यकार-महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

Arvind Mishra ने कहा…

त्यागी जी ,
आपने बहुत संयत होकर इस नासूर सी बन गयी समस्या पर अपने विचार व्यक्त किये है -
मैं तो समझता हूँ या तो धारा ३७० ख़त्म कर दें या फिर इस नासूर को शरीर से काट कर अलग !

Udan Tashtari ने कहा…

विचारणीय आलेख.

दीपक 'मशाल' ने कहा…

आज आपका ब्लॉग चर्चा मंच की शोभा बढ़ा रहा है.. आप भी देखना चाहेंगे ना? आइये यहाँ- http://charchamanch.blogspot.com/2010/09/blog-post_6216.html

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आग को ईंधन देने से आग भड़केगी। हममें पीड़ा देने वाली भौगोलिक परिस्थितियों का भूगोल बदल देने की क्षमता होनी चाहिये।

'उदय' ने कहा…

... samsyaaon ke samaadhaan ke liye samaadhaan kaarak vyaktitv kee jarurat hotee hai !!!

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

विचारणीय भी और सटीक भी..... बाकी तो प्रवीणजी और अरविन्दजी की बातों से पूरी तरह सहमत हूँ.....

PN Subramanian ने कहा…

बहुत ही पीड़ादायक मंथन. धारा ३७० को हटाने का साहस कौन करेगा.