कुछ चीजें पसंद नहीं आ रहीं आजकल, या फिर मेरे सोचने के मुताबिक नहीं हो रही हैं.
नक्सली समस्या
नक्सल से निबटने के सरकार का तरीका समझ नहीं आ रहा. चिदंबरम एक जाने माने सुलझे हुए लीडर लगते हैं, पर क्यों फिर बार बार CRPF और आम आदमी नक्सल हिंसा की आग में बुरी तरह जल रहा है ?
ब्लॉग्गिंग के गुट
वैसे ये स्वाभाविक प्रवृत्ति का नतीजा है, जिनको आलस में कुछ लिखना नहीं या सोचना नहीं, वो इस तरह की मानसिक प्रवृत्ति की तरफ झुकते है. और वैसे भी चाहे कोई ऑफिस हो या दल, देश हो या विदेश - भले और बुरे का साथ तो रहता ही है. धुप के बिना छाँव का मजा ही क्या. अनुराग शर्मा जी का उल्लेख उल्लेख विशेष श्रेणी में इसलिए की वो कुछ अलग और ज्ञानवर्धक लिख रहे हैं.
राहुल गाँधी
राहुल का कभी मिलबैंड और कभी बिल गेट्स को अमेठी की सैर कराके गरीब लोंगों को सर्कस की भांति दिखाना अजीब लगता है. विकास पर ध्यान दें तो अपने आप लोग आयेंगे जैसे बंगलोरे और हैदराबाद जाते हैं. भीख के लिए किसी अमीर को बुलाना कौन सा स्वाभिमान है . पहले भी राहुल के बारे में लिखा है, नीचे लिखी दो लिंक देखी जा सकती है -
राहुल गाँधी का सर्कस
कलावती को भूले राहुल लाला
कोई दुश्मनी नहीं है इनसे पर जिस हिसाब से लिबर्टी इनको मिली है, उम्मीदें ज्यादा हैं और ये लीपापोती करते दिखते है.
मेरे ब्लॉग का Template
ठीक नहीं लगता पर समय का अभाव या आलस...इनकी वजह से जस का तस पडा है.
यूरोप की अर्थव्यवस्था
अब ये तो हद ही हो गयी मेरे सोचने की. पर मेरे जैसे कई लोंगों का पोर्टफोलियो ख़राब कर रखा है मार्केट में इस संकट ने.
अंतर्द्वंद के क्षणों के कुछ भाव इधर बिखेर रहा हूँ ....
ज्वार भाटे आते रहते हैं मेरे तट परविचार उद्वेलित होते रहते है मेरे मन परलोग आते रहते है मेरे ब्लॉग परजैसे चिड़ियों की चहचहाहट हो खेत पररहंट की कलकल ध्वनि हो कुएं परघंठो की करतल हो जैसे बाग़ के मंदिर परभजनों की धुन जैसे माता के द्वार पर
