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रविवार, 7 नवंबर 2010

क्षमा करें पंडित जी

 

अब जबकि इन्टरनेट पर आरती संग्रह से लेकर पूजा करने की विधि सब कुछ केवल एक क्लिक की दूरी पर संभव है,  भगवान की पूजा और हवन के लिए पंडित जी के नखरे कौन सहे ? 

यहाँ अमेरिका में मंदिर और पंडितों की कमी नहीं है,  पर अगर आप एक पंडित जी को कथा वाचन के लिए आमंत्रित कर रहे हैं, या फिर मंदिर में कोई पूजा आपके सौजन्य से होना है या फिर नयी कार की पूजा करानी है या फिर गृह प्रवेश जैसा यादगार पल पूजा से प्रारम्भ करना है तो पंडितो के नखरे और आसमान छूती फीस कभी कभी आपको सोचने पर मजबूर करेगी कि क्यूँ ना इन्टरनेट का उपयोग इसके लिए किया जाए !

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बहुत दिन से सत्यनारायण कथा कराने का मन था, इस बहाने दिवाली की गेट - टुगेदर भी हो जाती है ! जब पंडित जी को फोन किया तो उनके पास समय ही नहीं हैं,  फिर सलाह आई कि आब शाम को ८ बजे कथा करा लीजिए,  रात में कथा का फीलिंग कैसे आये अब ?  वीक डेस से लेकर वीक एंड तक रोज उनकी अपोइंटमेंट पहले से ही तय हैं !  मंदिर में भी स्लोट आसान नहीं है लेना !

एक बार गृह प्रवेश के मौके पर एक पंडित जी को ऐसे ही पूछ लिया कि आपकी फीस वगैरह बता दें तो कृपा होगी, तब हम नए थे तो पंडित के नखरे और भी आसमान पर थे,  बाद में शायद फीस और हमारी श्रद्धा कम लगी तो पंडित जी सर्दी का बहाना बना गये कि गला बहुत खराब है - ऐसे में मंत्रोचार करना उनके लिए संभव नहीं !

ज्यादातर पंडित जी बंधू किसी ना किसी मंदिर से सम्बंधित रहते हैं,  इनको ग्रीन कार्ड भी विशेष केटेगरी में जल्दी से मिल जाता है यानी रोजगार का उत्तम और सुरक्षित तरीका ! उसके बाद मंदिर से आमदनी के अलावा अगर व्यक्तिगत रूप से किसी के घर कथा /पूजा में जाना हो तो अलग से कमाई हो जाती है, सामान्यतः मंदिर प्रशाशन पंडितों को मंदिर की बिना अनुमति के व्यक्तिगत तौर पर पूजा करने करने के अनुमंती नहीं देता. अगर आप मंदिर से पंडित बुलाते हैं तो मंदिर की फीस बहुत रहती है और उसके बाद पंडित जी को भी श्रद्धावस (बहुत) कुछ देना पड़ेगा. आने जाने का खर्चा अलग, पंडित जी अगर अपनी कार से आयेंगे तो जिजमान पर एक और बड़ा अहसान.  व्यक्तिगत रूप से अगर पंडित जी को बुलायेंगे तो आप अपनी फीस फिक्स कर सकते हैं पर ऐसे में उचित दिन और समय मिलाना मुश्किल हो जाता है क्यूंकि वो पहले ही बुक रहते हैं !

जब पंडित जी घर आयेंगे तो समय के कमी अलग रहती है तो जल्दी जल्दी पंडित जी के उपलब्ध समय के अनुसार सब करो, वैसे भी हम भारतियों की आदत किसी के घर समय से पहुंचने की नहीं होती तो ऐसे में समय का पालन करना असंभव सा होता है !  अगर आप महाम्रत्युन्जय या कुछ और विशेष पूजा कराना चाहते हैं तो फिर उसका अलग से समय और समय की कीमत !

लग रहा है पोस्ट मार्टम कुछ ज्यादा ही हो गया, खैर ! मुझे कोई बुरे नहीं लगती इसमें क्यूंकि पंडित जी भी एक आम इंसान हैं और सात समुन्दर दूर अपने परिवार के साथ रह रहे हैं और परिवार पालना है तो फिर व्यवसाय से समझौता कैसा ?

बात इन्टरनेट पर उपलब्ध सामग्री से शुरू हुई थी , तो आजकल बहुत सारे लोग यहाँ पर खुद ही इन्टरनेट के सहारे घर पर कथा, हवन और पूजा करने की कोशिश कर रहे हैं और इसमें आनन्द भी आ रहा है बस आयोजक को थोडा सा समय पढने में, डाउनलोड करने में और प्रिंट आउट लेने में देना पडता है !

कुछ दिन पहले एक मित्र ने सत्यनारायण कथा पर आमंत्रित किया और उस दिन हमने कथा से लेकर हवन को उस आनन्द से ही किया जिस आनन्द से पंडित जी के साथ करते हैं बल्कि मन्त्र और स्पष्ट रूप से पढ़े गये और बच्चों ने भी खुद मन्त्र पढकर एक नया ही आनन्द लिया !  जब इस बार पंडित जी व्यस्त थे तो हमने भी वही किया , कुछ इष्ट मित्रों के साथ कथा वाचन किया और फिर सबने मिलकर गृह्शुद्धि और आत्मशुद्धि के लिए हवन किया ! 

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क्षमा करें पंडित जी, आप भी अब रिप्लेसेबल लगते हैं पर फिर भी आपका अपना महत्व है - आपको भी कथा में आमंत्रित करेंगे बस आप थोडा फ्री हो लें  और हाँ कथा और हवन सायंकाल थोड़े अजीब से लगते हैं :( 

सोमवार, 24 मई 2010

संगीत की कोई भाषा नहीं...फोटो कुछ लम्हों के...



निकुंज की टेनिस क्लास हर शनिवार को सुबह ८:३० बजे होती है. जिस अथलेटिक केंद्र में कक्षा है, उसी के पास दो भारतीय मंदिर भी हैं. तो लौटते वक्त कभी दोनों में या कभी किसी एक मंदिर में दर्शन के लिए चले जाते है.  इसी क्रम में इस शनिवार को  जाना हुआ साईं बाबा मंदिर में.  हम इस मंदिर में पिछले ५ सालो से लगातार जा रहे हैं.


दूसरा मंदिर है बालाजी (श्री वेंकटेश्वर बालाजी)   का,  श्रद्धालुओं की भीड़ के हिसाब से ज्यादा बड़ा और प्रसिद्ध है,  उसका कारण है शनिवार और इतवार को वहां की रसोई.  ५ डॉलर में बढ़िया डोसा साम्भर  मसाले वाला गरम गरम, ३.५० डॉलर में २ इडली या वडा साम्भर के साथ, ५० सेंट में चाय या आम की लस्सी...मेनू भी बढ़िया है और भोजन का स्वाद भी.  बालाजी का ये मंदिर काफी बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है.  दिवाली पर बहुत बड़े स्तर पर फायर वर्क्स का आयोजन भी होता है और इसमें बहुत बड़ी तादाद में देसी लोग जमा होते है.   हम लोग भी बाकी लोंगों की तरह यहाँ तभी जाते है जब डोसा खाना होता है  :)  हाँ दिवाली पर बच्चों को ले जाना नहीं भूलते, हम भी उनके साथ कुछ फुलझड़ियाँ जला लेते हैं.

साईं बाबा के मंदिर में इन ५ सालों में बहुत परिवर्तन आया है, पहले ये मंदिर एक छोटे से भवन में था पर अभी सभी के सहयोग से एक विशाल मंदिर बन गया है और सामने पार्किंग के लिए भी काफी जगह है.  कुछ साल पहले हमने इसके बड़े से बेसमेंट में एक जन्मदिन भी मनाया था.

शनिवार को जैसे ही मंदिर में प्रवेश किया,  कुछ संगीत चल रहा था,  ज्यादा अर्थ समझ में नहीं आ रहा था क्योंकि ये मराठी में था, पर अवश्य ही मन को बहुत शांति मिल रही थी.  बस ऐसा लग रहा था की खूब देर तक बैठे रहे वहीं पर. 

इसी तरह का अनुभव होता है जब हम गुरुद्वारा जाते हैं, पूरा अर्थ गुरुवाणी का समझ नहीं पाते पर जो भी कानों से आता है वो दिल और दिमाग तक जाता है और सुकून देता है,  एक बार सुनने बैठो तो बस उठने का मन नहीं करता.  ज्यादा स्पीड वाला संगीत किसी भी भाषा का हो क्षणिक ही ठीक लगता है जबकि मंदिरों और गुरुद्वारों में बजने वाला संगीत या फिर कोई भजन हो या फिर कोई पुरानी फिल्म का गाना हो, बस मंत्रमुग्ध कर देता है.

चलते चलते बात कुछ फोटों की...