न्यूयार्क के फायनेन्शियल केंद्र के बीचों बीच लगे खाने के ठेलों के बारे में पहले भी लिख चुका हूँ, इस गुरुवार को एक दोस्त जब फिर से इधर खींच ले गया तो अचानक से निगाह पडी एक ठेले पर - जिस पर हिंदी में उसका नाम लिखा था, हिंदी प्रेमी को तो उससे प्रभावित होना ही था ! उसी से शाकाहारी बिरयानी ली गयी चटपटे मसालों के साथ ! इन ठेले वालों पर आर्थिक मंदी का असर न्यूयार्क में कभी भी नहीं दिखा, लंच के समय पर फलाफल इत्यादि के लिए लगी लाईनें कभी कम नहीं देखी - जब भी उधर जाना हुआ ! क्यों होंगी - सस्ता - मसालेदार और चटपटा कौन नहीं खाना चाहता - चाहे लोग कितना भी स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हों, एक न एक दिन तो न्यूट्रिसनविहीन सबको चलता है !
चटपटे से ध्यान आया कि ब्लॉग्गिंग में भी अपने ब्लॉग को हिट करने को लेकर ऐसे चटपटे मसाले परोसने वाले ब्लॉग खूब चलते हैं, और चलेंगे भी, वैसे भी ब्लॉग्गिंग तो मन की अभिव्यक्ति का एक लाइव माध्यम जो है, लोग जो मन में आया लिख सकते हैं, कुछ शौक के लिए तो कुछ कमाई के लिए !
वर्धा में भी हिंदी ब्लोग्गिंग के ऊपर एक कार्यशाला चल रही है जिसमें ब्लोग्गिंग के मापदंड तैयार करने के बात हो रही है, कुछ लोगों ने थोडा बहुत गंभीर लिख दिया तो लोग उससे देश सुधार की उम्मीद लगा बैठे, क्या ये संभव है ? क्या ब्लोग्गिंग पर आचार संहिता लगाना व्यवहारिक है ? या ये सब करना एक मजाक है - मेरे हिसाब से से ये समय और पैसे की बर्बादी है ! ब्लोग्गिंग एक ऐसी विधा है जिसे लोग अपने मन की बात खुले में जब चाहे तब एक सार्वजनिक मंच पर बिना किसी प्रतिबन्ध और दबाब के बयाँ करने के लिए उपयोग में लाते हैं ! इससे देश सुधार कैसे हो ? देश के सुधार के लिए पहले जो हम सबको करना होगा - वो है अपने वोट का सही उपयोग - एक प्रजातंत्र में साफ सुथरे प्रतिनिधि भेजना सबसे अहम कर्तब्य होता है, क्या वह हम सब तथाकथित बुद्धिजीवी लोग करते हैं या कर रहे हैं? तो क्या फिर ये कार्यशाला इस बात पर केंद्रित नहीं होना चाहिए कि कैसे हिंदी ब्लोग्गिग को हिंदी लिखने वालों के लिए सुलभ और उपयुक्त बनाए जाए, और कैसे इसके बढावे के लिए प्रायोजक ढूंढें जाए जो अपने ads से और लिखने वालो को एक लोभ से ही सही - पर प्रेरित जरूर करे ! ब्लॉग्गिंग के भी क्या मापदंड बनाने ! हम हिन्दुस्तानी लोग बहुत भावुक होते हैं और इस लिए हर चीज में संघठन और समूह पहले बनाने लगते हैं ! ब्लोग्गिंग में भी यही कुछ कभी कभी होता रहता है, लिखने से ज्यादा लोग अपने आप को एक ग्रुप विशेष का मुखिया बनाने की मुहिम में जुड जाते हैं ! और कुछ लोग अपने आप को ब्लॉग्गिंग का प्रतिनिधि और शुभचिंतक समझ हर इन समारोहों में शिकरत की उम्मीद पाल बैठते हैं और फिर परेशान भी होते हैं जब अपेक्षाएं खरी नहीं उतरती !!
हिंदी ब्लॉग्गिंग हो या किसी और भाषा की ब्लॉग्गिंग, उसे नेतृत्व की कोई जरूरत नहीं और ना ही कुछ लोग किसी स्वतंत्र ब्लॉग्गिंग का प्रतिनिधित्व या विरोध कर सकते हैं, ये तो स्वतंत्र छाप है आपके व्यक्तित्व की, यहाँ भी एक विशेष परिभाषा में आप बंधकर कैसे रह सकते हैं ? कुछ लोग फोटो छपने से खुश तो कुछ सिर्फ बुलावा आने पर खुश, और कुछ ऐसे भी हैं जो न बुलाये जाने पर दुखी भी है और कुछ पारदर्शिता के नाम पर सरकारी खजाने को लुटाए जाने पर दुखी हैं तो कुछ इसके संयोजक बन वाहवाही लूटने में खुश ! वही सब जो नेता करते हैं, – गुटबाजी - वही हम करने लगे तो फिर ये ब्लॉग्गिंग निरपक्ष नहीं, ये फिर ब्लोग्गिंग नहीं , दर्पण नहीं आपने व्यक्तित्व का - बल्कि एक दिखावा है !
लोगों के पास इतना समय कहाँ से आता है व्यर्थ की गुटबाजी में संलग्न रहने का, मैं तो लिखता हूँ जो मन में आता है इसे उकरने को ! इन मठों का सदस्य बनने की दरकार नहीं है मेरी !
वैसे बिरयानी घर का ठेला लगाने वाला बांग्लादेश का रहने वाला है, पर बिरयानी बड़ी मजेदार बनायी उसने बिलकुल देशी - चटपटी !
देश सुधार तब कर पायेंगे जब खुद को एक आदर्श बना कर जी पाओगे !
फिर भी --- आयोजको को बधाई ! और दुखियारों को सलाह - एक और आयोजन कर लो :-))