हिंदी - हमारी मातृ-भाषा, हमारी पहचान

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए अपना योगदान दें ! ये हमारे अस्तित्व की प्रतीक और हमारी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है !

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रविवार, 10 अक्टूबर 2010

वर्धा और बिरयानी घर

न्यूयार्क के फायनेन्शियल केंद्र के बीचों बीच लगे खाने के ठेलों के बारे में पहले भी लिख चुका हूँ, इस गुरुवार को एक दोस्त जब फिर से इधर खींच ले गया तो अचानक से निगाह पडी एक ठेले पर - जिस पर हिंदी में उसका नाम लिखा था, हिंदी प्रेमी को तो उससे प्रभावित होना ही था !  उसी से शाकाहारी बिरयानी ली गयी चटपटे मसालों के साथ ! इन ठेले वालों पर आर्थिक मंदी का असर न्यूयार्क में कभी भी नहीं दिखा,  लंच के समय पर फलाफल इत्यादि के लिए लगी लाईनें कभी कम नहीं देखी - जब भी उधर जाना हुआ ! क्यों होंगी  - सस्ता - मसालेदार और चटपटा कौन नहीं खाना चाहता - चाहे लोग कितना भी स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हों, एक न एक दिन तो न्यूट्रिसनविहीन सबको चलता है !

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चटपटे से ध्यान आया कि ब्लॉग्गिंग में भी अपने ब्लॉग को हिट करने को लेकर ऐसे चटपटे मसाले परोसने वाले ब्लॉग खूब चलते हैं, और चलेंगे भी, वैसे भी ब्लॉग्गिंग तो मन की अभिव्यक्ति का एक लाइव माध्यम जो है,  लोग जो मन में आया लिख सकते हैं, कुछ शौक के लिए तो कुछ कमाई के लिए  ! 

वर्धा में भी हिंदी ब्लोग्गिंग के ऊपर एक कार्यशाला चल रही है जिसमें ब्लोग्गिंग के मापदंड तैयार करने के बात हो रही है,  कुछ लोगों ने थोडा बहुत गंभीर लिख दिया तो लोग उससे देश सुधार की उम्मीद लगा बैठे, क्या ये संभव है  ? क्या ब्लोग्गिंग पर आचार संहिता लगाना व्यवहारिक है ?  या ये सब करना एक मजाक है - मेरे हिसाब से से ये समय और पैसे की बर्बादी है !  ब्लोग्गिंग एक ऐसी विधा है जिसे लोग अपने मन की बात खुले में जब चाहे तब एक सार्वजनिक मंच पर बिना किसी प्रतिबन्ध और दबाब के बयाँ करने के लिए उपयोग में लाते हैं !  इससे देश सुधार कैसे हो ?  देश के सुधार के लिए पहले जो हम सबको करना होगा - वो है अपने वोट का सही उपयोग - एक प्रजातंत्र में साफ सुथरे प्रतिनिधि भेजना सबसे अहम कर्तब्य होता है, क्या वह हम सब तथाकथित बुद्धिजीवी लोग करते हैं या कर रहे हैं?  तो क्या फिर ये कार्यशाला इस बात पर केंद्रित नहीं होना चाहिए कि कैसे हिंदी ब्लोग्गिग को  हिंदी लिखने वालों के लिए सुलभ और उपयुक्त बनाए जाए, और कैसे  इसके बढावे के लिए प्रायोजक ढूंढें जाए जो अपने ads से और लिखने वालो को एक लोभ से ही सही - पर प्रेरित जरूर करे !    ब्लॉग्गिंग के भी क्या मापदंड बनाने ! हम हिन्दुस्तानी लोग बहुत भावुक होते हैं और इस लिए हर चीज में संघठन और समूह पहले बनाने लगते हैं !  ब्लोग्गिंग में भी यही कुछ कभी कभी होता रहता है, लिखने से ज्यादा लोग अपने आप को एक ग्रुप विशेष का मुखिया बनाने की मुहिम में जुड जाते हैं !  और कुछ लोग अपने आप को ब्लॉग्गिंग का प्रतिनिधि और शुभचिंतक समझ हर इन समारोहों में शिकरत की उम्मीद पाल बैठते हैं और फिर परेशान भी होते हैं जब अपेक्षाएं खरी नहीं उतरती !!

हिंदी ब्लॉग्गिंग हो या किसी और भाषा की ब्लॉग्गिंग, उसे नेतृत्व की कोई जरूरत नहीं और ना ही कुछ लोग किसी स्वतंत्र ब्लॉग्गिंग का प्रतिनिधित्व या विरोध कर सकते हैं, ये तो स्वतंत्र छाप है आपके व्यक्तित्व की, यहाँ भी एक विशेष परिभाषा में आप बंधकर कैसे रह सकते हैं ?  कुछ लोग फोटो छपने से खुश तो कुछ सिर्फ बुलावा आने पर खुश, और कुछ ऐसे भी हैं जो न बुलाये जाने पर दुखी भी है और कुछ पारदर्शिता के नाम पर सरकारी खजाने को लुटाए जाने पर दुखी हैं तो कुछ इसके संयोजक बन वाहवाही लूटने में खुश ! वही सब जो नेता करते हैं, – गुटबाजी - वही हम करने लगे तो फिर ये ब्लॉग्गिंग निरपक्ष नहीं, ये फिर ब्लोग्गिंग नहीं , दर्पण नहीं आपने व्यक्तित्व का - बल्कि एक दिखावा है  !

लोगों के पास इतना समय कहाँ से आता है व्यर्थ की गुटबाजी में संलग्न रहने का, मैं तो लिखता हूँ जो मन में आता है इसे उकरने को !  इन मठों का सदस्य बनने की दरकार नहीं है मेरी !

वैसे बिरयानी घर का ठेला लगाने वाला बांग्लादेश का रहने वाला है, पर बिरयानी बड़ी मजेदार बनायी उसने बिलकुल देशी - चटपटी ! 

देश सुधार तब कर पायेंगे जब खुद को एक आदर्श बना कर जी पाओगे !

फिर भी --- आयोजको को बधाई ! और दुखियारों को सलाह - एक और आयोजन कर लो :-))

मंगलवार, 22 जून 2010

एक पग और बढ़ा…

 

imagesबहुत दिन से जद्दोजहद चल रही थी की कैसे हिंदी लेखन के लिए एक ओफलाइन टूल को लैपटॉप पर डाला जाए. अभी तक करीब कुल मिलाकर लगभग १०० से ऊपर पोस्ट हो गयी होंगी मेरे तीनों ब्लोग्स पर, सारी ब्लोग्गेर्स के टाइपिंग एडिटर को उपयोग में लाकर ही लिखी गयीं थी.  बहुत टाइम कोन्सुमिंग टास्क था.  कई बार लिखते लिखते बाद में एडिट करना पड़े तो बहुत मुश्किल होती थी, ओनलाइन होकर ही लिख पाता थे, ऐसी कई परेशानियाँ आती थी.   पर हिंदी में लिखने की चाह थी तो बस लिखता गया, पर हाँ उतना नहीं भावों को बिखेर पाया जितना चाहता था. 

आज सुकून सा अनुभव कर रहा हूँ जब गूगल का हिंदी और अंग्रेजी में स्विच करने वाला टूल भी इंस्टाल हो गया और ब्लॉग से डिरेक्ट कनेक्शन के लिए विंडो लाइव भी इंस्टाल कर लिया है. अब जब चाहे लिख कर रख सकता हूँ . थोड़ी सुविधा और सुगमता रहेगी. 

IME (गूगल का हिंदी और अंग्रेजी में स्विच करने वाला टूल )

  • पहले बार बार एक जगह हिंदी में टाइप करके कॉपी पेस्ट करना पडता था, कमेन्ट देने इत्यादी के लिए
  • किसी भी विंडो पर अब अल्त+शिफ्ट दबा कर कीबोर्ड अपने आप हिंदी में लिखने के लिए परिवर्तित हो जाता है.
  • सोफ्ट कीबोर्ड भी ओंन कर सकते हैं अगर टाइप करने में समस्या है

विंडो लाइव

  • सीधे सीधे एडिटर से ही ब्लॉग पर पोस्ट करने की सुविधा देता है
  • एडिट करके एक से अधिक बार भी पोस्ट करेंगे तो ये पोस्ट को डुप्लीकेट नहीं करेगा
  • लिखकर छोड़ दो और पब्लिश का टाइम सेट कर दो, अपने आप उस टाइम पर पब्लिश हो जाएगा आपका चिटठा
  • एडिटर भी बहुत सरल है और कई फीचर देता है,  फ्लेक्सिबल है
  • एक से अधिक ब्लॉग जोड़ सकते है, और जब लिख रहे हों, या पब्लिश कर रहे हों तो सम्बंधित ब्लॉग को सेलेक्ट कर लो
  • आपके ब्लॉग के फॉर्मेट, फॉण्ट इत्यादी को इम्पोर्ट कर लेता है ये, तो ऐसा लगेगा कि आप ब्लॉग पर ही लिख रहे हों

चलो इतने दिन के आलस के बाद कल की सक्रियता ने कुछ कमाल दिखाया.  खैर और भी उपयोगी टूल होंगे मार्केट में, पर अभी तो यही काफी सुविधाजनक लग रहा है.  धीरे धीरे एवोल्व होगा, शायद जीवन का यहीं नियम है की सीढियाँ चढते जाओ, कोई जल्दी चढता है तो कोई मेरी तरह धीरे धीरे. 

एक प्रश्न -  हिंदी के पूर्ण विराम के लिए यूनिकोड क्या होगा अभी तो डॉट से काम चलाना पड़ रहा है  ?

176025780_755491 खैर टोरोंटो में G20 Summit की वजह से इस हफ्ते घर से ही काम करने का मौका भी एक सुकून ही दे रहा है.  टोरंटो को कनाडा की सरकार ने कुछ हफ्तों पहले से ही छावनी में तब्दील कर दिया है,  बैरिकेट्स लगा दिए गए थे सडकों पर,  कुछ सडकें यातायात के लिए बंद कर दी गयीं थी, पुलिस वाले भी बहुत दिखते थे चारों G20_fence_716343gm-aतरफ.  सुना है इस हफ्ते तो ऑफिस में किसी को आने ही नहीं दे रहे सुरक्षा कारणों से.  मेरे ऑफिस के लोग जो लोकल हैं, उनको घर से ही काम करने के लिए बोला गया है. कदाचित ये हालत न होतीं अगर G20 अपने उद्देश्यों पर खरा उतरा होता.  सबकी आपनी अपनी समस्याएं हैं, अपने अपने राग हैं, बस सरकारों के विशाल दल इन समारोहों में औपचारिकता पूरी करने चले आते है.  सुना है कि कनाडा की सरकार ने १ बिलियन डॉलर इस समारोह के आयोजन पर  खर्च कर दिया है.  ये उसी तरह है जैसे मुकेश अम्बानी IPL में खर्च करते हैं, अर्थात मार्केटिंग के लिए. कनाडा  जैसे अमेरिका का छोटा भाई टाइप देश के लिए ये एक अच्छा मौका है अपने आप को मार्केट करने का.  खैर हमें तो फायदा ही मिला इस सबसे, एक वीक का ट्रेवल बच गया.

images हमारा भारत भी तो एक आयोजन में व्यस्त है, चलो उधर तो मार्केटिंग के सहारे नेताओं की जेबें हरी हो रही होंगी और मजदूर बेचारा डैड लाइन के भय में अपना डबल पसीना बहा रहा होगा.  फिर भी कुछ तो कदम आगे बढ़ ही रहे हैं. यानी हम एवोल्व हो रहे हैं, यही जरूरी है. आप भी अपना योगदान दे सकते हैं. देखिये ये विडियो…

आजकल मौसम ने भी हम पर मेहरबानी कर रखी है, रोज बारिश हो जाती है तो गर्मी उतना कष्ट नहीं दे रही. पहले गर्मी के लिए तड़प, और जब गर्मी आ गयीं तो हलकी हलकी बूंदों के लिए मन तरसता है, मन की संतुष्टि अंतहीन है !!

ages कुछ कहना था ब्लोग्वानी और चिट्ठाजगत के बारे में चल रही सार्थक या असार्थक बहस के बारे में. मेरे हिसाब से पक्ष, निरपेक्ष या गुटनिरपेक्षपन की ये लड़ाई जो कभी कभी गैंगवार का रूप ले लेती है , शीर्ष पर आने या त्वरित पापुलर होने के चक्कर में हो रही है.   तो अगर इतनी लड़ाई है इस छोटे से हिंदी ब्लॉग्गिंग में शीर्ष के लिए १४ हजार वें लेखक से लेकर पहले तक, तो फिर सक्रियता का गणित भी सही होना चाहिए.  मैंने अपने एक अन्य ब्लॉग में अपने इस वाले ब्लॉग का लिंक दिया १-२ बार (रेफेरेंस के लिए) तो मेरी सक्रियता में गजब का उछाल आ गया, अरे ये तो फर्जी काम हुआ मेरी ओर से, इसी लोजिक या लालसा ने कुकुरमुत्ते के पेड़ की तरह अनगिनत चिट्ठे चर्चे खोल दिए , जिनका उद्देश्य इस गणित के इर्द गिर्द ही था. सब सक्रियता के पीछे पड़े हैं, कंटेंट पीछे छूट रहा है :) 

बात अगर ब्लोगवाणी या चिट्ठाजगत के महत्व की है तो ये अपने हिसाब से बहुत कुछ योगदान कर रहे हैं, हिंदी के सारे ब्लॉग को एक जगह लाने में और लोगों को ब्लोगों पर लाने में.  जो लोग इन दोनों के बिना काम नहीं कर सकते, वो बस नदी में कूद कहीं भी गोता लगाना चाहते हैं.  उनके लिए कंटेंट महत्वपूर्ण ना होकर हर चिट्ठे पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना ज्यादा मायने रखता है.  एक - दो लोग ऐसा करें तो उनके कुछ कारण हो सकते है जैसे - उत्साहवर्धन करना इत्यादी. पर सब करें सब ब्लोगों को नापने का काम तो ये भेडचाल है. और लग रहा है कि आप टाइम को खराब कर रहे हैं, कुछ तो खुद की चोइस होनी चाहिए,  अगर है तो गूगल रीडर में या अनुसरणकर्ता बन कर उनकी लिस्ट बना लें, फिर क्या फर्क पडता है किसी के होने या ना होने का :)

मेरे हिसाब से अगर ये Aggregators अपना फोर्मुला , लोजिक सही कर लें तो बहुत हद तक तलवारें नियंत्रण में लायी जा सकती है ओर फिर ऊर्जा बढ़िया लिखने में लगायी जा सकती है.  मैं भी क्या लेकर बैठ गया ….जिनके पास बिषय नहीं उनके लिए तो ये सब विवाद रामवाण हैं .    एक मामूली सा लोजिक सक्रियता आंकड़ा सही करने का …हिट्स के आधार पर …

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रही बात नापसंदी की तो कबीर दास पता नहीं क्यों बोल गए थे की “निंदक नियरे राखिये आँगन कुटी छबाय…..” क्या कोई पालन करता है इसका ? आजकल तो NGO भी अपनी निंदा नहीं सुनना चाहते !!

 

बहुत पहले ‘भारत की बीमारी’ नाम से एक कविता लिखी थी …भोपाल और अन्य बहुत सारी समस्याओं को देखकर फिर से कविता के शब्द दिमाग में चमक रहे थे…पूरी कविता लिंक पर क्लिक करके पढ़ी जा सकती है ..कुछ पंक्तियाँ इधर …

बेरोजगार चुप है मगर ‌‍‍‍मृत है भत्ते की आड़ में

कैसे मैं कह सकता हूँ आज मेरा भारत महान है

जहाँ पर सिर्फ राजनीतिक गुंडो का राज है

मायावती के लिए सुरक्षा एसरायल से आती है

पर यू पी के गरीब की लड़की विद्यालय कई कि. मी. चलकर जाती है t1larg

सोनिया वायु मार्ग से गाँवों का भ्रमण करती हैं

उन्ही गाँवों में एक किसान 100 रुपये के लिए आत्महत्या कर लेता है

गाँवों के विकास से ही भारत सजता है

नही तो ये बीमार सा और नंगा सा लगता है

बुधवार, 10 जून 2009

अधिकतर ब्लॉगों का मात्र “एक पाठक” होता है! ...

ये लाइन चुराई है तरकश से - http://www.tarakash.com/200906094180/Knowledge-Base/is-blogging-is-dying.html

उड़न तस्तरी जी का लेख पड़ते पड़ते तरकश पर पहुँचा और उधर ये लेख पड़ा, शायद ये हम जैसे कई लोगो की अपेक्षाओ को दर्शाता हुआ लेख है, शुरुआत में मेने जब ब्लॉग लिखना शुरू किया तो यही लगता था की यार कोई पड़ेगा ही नही तो कैसे पता चलेगा की में क्या लिख रहा हूँ, पर फिर सोचा की मन की भडास कही तो निकालो, परदेश में रहकर देश की यादो और अपने जज्बातों को कही तो जगह दूँ।

हमारे कई हिन्दी ब्लॉगर बहुत प्रसिद्ध हो रहे है, अभी हाल ही में द्विवेदी जी की डांट और समझाईस के किस्से बहुत छाए रहे, एक महासय ख़ुद को पंगेबाज कहते है पर बकिलो के डर से अपनी बेबाक बात को बेबाक न रख सके और, ये किस तरह की अभिव्यक्ति है ? कही पर भी एक गाँव की समस्या को इंगित करते नही दिखाते ये हमारे मसहूर ब्लोग्गेर्स, सभी लोग बस कांग्रेस और बीजेपी तक अपने को सीमित रखकर कथित साम्प्रदायिक और अन्य भावनात्मक मुद्दों पर बहस करते रहते है और कभी कभी व्यक्तिगत आवेश में आपस में ही लड़ जाते है और अंग्रेजो के फूट डालो ....वाले कहावत को अभी भी याद दिला जाते है । भारत की ७० प्रतिशत जनसँख्या गांवों में बसती है, और हमें अपने ब्लोग्स पर इनकी उन्नति और शाक्षरता के लिए सार्थक बहस करनी चाहिए।
हमें भुवनेश शर्मा के हाल में लिखे गए ब्लॉग से कुछ सीखना चाहिए जिसमें उन्होंने किसी को गाली देने के बजाय पर्यावरण के बारे में बहुत ही उम्दा लेख लिखा, ऐसे अच्छे प्रयासों की धरा को बहुत जरूरत है।
हमारे ब्लोग्स में कही भी ऊर्जा की बचत कैसे करे, गावो को सौर ऊर्जा और गोबर गैस जैसी उर्जा पद्धतियों से कैसे आए ले जाए, ये सब नही दिखा।

हम सभी अपने अपने लेवल पर बेहतर लिखने की कोसिस करते है, चलो इसमें भारत के ७० प्रतिशत क्षेत्र के उन्नयन के बारे में लिखे सोचे और कुछ करें ....