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गुरुवार, 18 नवंबर 2010

शोध का सोच और आत्मनिर्भरता पर प्रभाव - भाग २

 

शोध का सोच और आत्मनिर्भरता पर प्रभाव - भाग १

कुछ दिन पहले यहाँ के एक बच्चों के म्यूजियम द्वारा (निकुंज के) प्राथमिक विद्यालय में पहली और दूसरी कक्षा के विद्यार्थियों के लिए गणित पर एक कार्यशाला रखी गयी जिसमें विद्यालय के बाद शाम को बच्चे को अपने माता-पिता के साथ आकर भाग लेना था,  मैं भी बड़ा उत्सुक था इसलिए समय से ही निकुंज के साथ विद्यालय पहुँच गया !  वहाँ पहली और दूसरी कक्षा के विद्यार्थीगणों को (जो घर पर बात तक नहीं मानते)  मैंने उनके स्वनिर्मित चक्रव्यूह को हल करते पूरी संलग्नता से देखा तो समझ में आया कि अगर हम बच्चों को एक समस्या दें और उसमें खुद बच्चे के साथ लगकर हल करने की कोशिश करें तो बच्चा पूरी तन्मयता से और सक्रियता से सीखता है और ऐसा सीखा हुआ पाठ उसके मानस पटल पर उम्र भर अमिट रहता है. 

अब सोचिये के इस गणित कार्यशाला का भले ही आज कोई परिणाम न मिले पर एक  दिन जब आप उस तरह की किसी समस्या का हल खोज रहे होंगे और आपका बालक अचानक से जबाब देगा तब आपको इस का जो सुख मिलेगा वो आनन्दमय होगा और ये ज्ञान बच्चे को अवश्य ही उसकी आगे चलकर उसकी तार्किक सोच में तीखापन लाने के लिए सहायक होगा.

इस कार्यशाला में जो प्रयोग किये गए उनमें से कुछ को में नीचे उल्लेखित कर रहा हूँ :

  1. एक बोर्ड रख दिया गया जिसको समुद्र या नदी बताया गया और उस पर बच्चे को पुल बनाना है,  कुछ अंक बोर्ड पर अंकित थे जो ५ के गुणा में थे,  इन १०-१५ अंको में से दो अंक चुनकर उनको जोड़कर जो अंक आएगा उस पर पहला स्तंभ खड़ा करना है और अगले स्तंभ के लिए ऐसे दो अंक बोर्ड में अंकित अंको से लेने होंगे जिनका जोड़ पिछले स्तंभ के आसपास हो, जिससे दो consecutive स्तंभों को जोड़ा जा सके. इस समस्या में बच्चे जल्दी से जल्दी अपना पुल इमानदारी से पूरा करने के चक्कर में पूरी इमानदारी और तन्मयता से लगे थे और हम पालक भी यथासंभव सहायता कर रहे थे.
  2. दीवाल पर हर अक्षर को एक सेंट या डॉलर अंकित कर दिया था, अब हर बच्चे को (जिसकी इच्छा हो ये समस्या हल करने की ) अपने नाम की कीमत बतानी थी, इस समस्या के जरिये डॉलर और सेंट को जोडने, सेंट को डॉलर में तब्दील करने और २ और ५, १० और २० के पहाडो के जरिये कैसे पैसो का हिसाब जल्दी किया जाए.  निकुंज को N, I, K, U, N और J पर लिखे डॉलर और सेंट को जोड़कर उसके नाम की कीमत बतानी थी.
  3. कुछ रंग बिरंगे पेपर रख दिए गए थे और दीवाल पर अलग अलग तरह के द्वि - विमीय और त्रि-विमीय आकार बनाने के तरीके लिखे थे, जिन बालको ने वहाँ पर वर्ग, त्रिकोण, क्यूब इत्यादी बनाए वो कैसे कभी भूल सकते हैं उन आकारों को!
  4. बच्चो को तराजू बनाने के लिए दिया गया और फिर दोनों तरफ उसको बेलेंस करने के लिए कुछ प्रयोग करने को बोला गया
  5. एक प्रयोग ऐसा था कि कुछ अंक एक बक्से में डाल दिए गए और फिर उनमें से जो ४ अंक आप निकालो उनमे से सबसे बड़ा अंक कैसे बना सकते हैं  इस प्रयोग से उनकी इकाई, दहाई और सैकडा में अंको को इधर उधर कर अंको के बदलाव की ज्ञान वृद्धि पर जोर दिया गया
  6. विभिन्न आकारों का उपयोग कर उन आकारों को अन्य आकारों में बदलने और उनसे चित्र में दी गयी कुछ तस्वीरें बनाने के लिए प्रयोग दिया गया

इस तरह के कई और भी प्रयोग थे, ये सब कार्यक्रम University of Chicago  के गणित विभाग द्वारा किये गए शोध पर आधारित थे,  विद्यालय की तरफ से ऐसे कई पुस्तिका घर पर भेजी जाती है जो University of Chicago  द्वारा तैयार की गयी है और बच्चों के ज्ञान को समृद्ध ही नहीं, तार्किक, तीखा, तीक्ष्ण और प्रायोगिक भी बनाती हैं, बच्चे समस्या के हिसाब से सोचते हैं, पहले समस्या और फिर हल !   ये एक छोटा सा उदहारण है शोध के बाद किसी चीज को बेहतर बनाने का, सरल बनाने का !

कैसे बिना दबाब के और बिना मानसिक तनाव के रोजमर्रा की चीजों के जरिये गणित और उससे सम्बंधित चीजें सिखाई जाए, ये सब एक दिन में निर्धारित नहीं हो सकता.  पर अगर आज शुरुआत की जाए तो हो सकता है कि हम भी भारत में आने वाले वर्षों में बस्ते का बोझ कम कर पायें.  हम अपनी शिक्षा प्रणाली से नौकरी करने लायक तो बन जाते हैं पर कहीं न कहीं वो आईडिया दुनिया को नहीं दे पाते जो फेसबुक, ऐपल इत्यादि के संस्थापक दुनिया को दे रहे हैं, ये स्वीकार करना ही होगा, ये प्रश्न खुद से पूछना ही होगा कि हम क्यों नोबल पुरुष्कारों को अपने घर नहीं ला पाते ! हम क्रियान्वयन में महारत रखते हैं क्यूंकि हम वो कर सकते हैं जो कोई पहले ही कर चुका है, हमें रास्ते तय करने वाले, रास्तों का निर्धारण करने वाले बच्चे विद्यालय से निकालने होंगे.  निश्चय ही भारत में परिवर्तन आ रहा है पर सरकार को और अधिक सक्रीय होना होगा जिससे हम वाकई में विकसित कहलाये जा सकें !  हम केवल विज्ञान, भौतिक और रसायन में ही प्रायोगिक परीक्षा न रखें बल्कि हमें हर विषय को प्रायोगिक बनाकर पढाने की व्यवस्था करनी होगी और प्रयोग को आम जिंदगी का हिस्सा बनाना ही होगा,  मुझे ध्यान है कि किस तरह १०वीं और १२वीं कक्षा में निर्धारित प्रायोगिक परिक्षा महज एक औपचारिकता होती थी.

यहाँ मैंने देखा है कि बच्चे पांचवे क्लास (अभी यहीं तक का पता है ) तक बिना बस्ते और बिना ड्रेस के विद्यालय जाते है पर ज्ञान के हिसाब से सिर्फ प्रोजेक्ट और रीडिंग के बल पर जो उच्च स्तर पढाई का दिखा उसे बेस्ट नहीं तो बेहतर जरूर कहूँगा !   कुछ मेरे दोस्त इसलिए भारत चले गए क्योंकि उनका बच्चा यहाँ किसी क्रमबद्ध कोर्स के जरिये नहीं पढ़ रहा था, बस्ते भरकर विद्यालय नहीं जा रहा था, पर कब तक हम नयी पीढ़ी पर ये दबाब डालेंगे गधे की तरह बस्ते ढोने का, ये बच्चे घोड़े से भी तेज मस्तिष्क रहते हैं इसलिए इन्हें बस्तों के बोझ से इन्हें मुक्त करना ही होगा, इन्हें बचपन को जीते जीते, आनंद करते करते ही सरलता से प्राथमिक शिक्षा की परिपाटी पर चलाना होगा !

छोटे छोटे बच्चे यहाँ अभी से लिखना सीख रहे हैं , लेखक बन रहे हैं और अपने रूचि के हिसाब से एक विषय विशेष में पारंगत बन रहे हैं पर इस तरह की स्वच्छंद पढाई में घर ध्यान न दिया जाए तो बच्चा पिछड भी सकता है क्यूंकि यहाँ बच्चे पर पढाई के लिए दबाब नहीं डाला जाता !  इसलिए यहाँ अमेरिका में स्कूल ड्रॉप आउट की समस्या बहुत है, घर पर और विद्यालय की गतिविधियों में पालक का सम्मिलित रहना अनिवार्य है अन्यथा ये स्वच्छंदता कई बुराइयों, आलसों और बहानों को जन्म दे देती है, पर गौर करने वाली बात है के शोध के जरिये कैसे बच्चे को सरलता से और सहजता से कठिन से कठिन बात सिखाई जा सकती है !!

ये बात में सरकारी विद्यालयों की कर रहा हूँ इसलिए अगर आप DPS या किसी अन्य विद्यालय से तुलना करेंगे तो फिर हम आम आदमी के बच्चे की बुनियादी शिक्षा की बात नहीं कर पायेंगे, ये बात में खुद के परिवेश ओर आज भी उसी ढर्रे पर चल रहे सरकारी विद्यालयों की कर रहा हूँ, क्या उन में परिवर्तन समय के साथ अपेक्षित नहीं ?  जब अमेरिका का सरकारी विद्यालय हमारे प्राईवेट विद्यालय से बेहतर है तो हमें ओर हमारी सरकारों को इस विषय में सोचना ही होगा अन्यथा हम विकासशील से विकसित होने का फासला तय नहीं कर पायेंगे!

भारत में सबसे बड़ी समस्या है हर क्षेत्र में शोध की ! बिना शोध के हम पुरानी पगडंडियों पर बिना सुधार और उन्नयन के चलते रहते हैं और हाथ लगता है तो बस कठिन परिश्रम - आईडिया तो शोध से ही आते हैं , उन्नयन तो शोध से ही आता है अन्यथा मानसिक तनाव और कठिन परिश्रम के दो किनारों के बीच झुलसते रहते हैं हम !!

(जारी …)

5 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

पढ़कर आनन्द आ गया। कुछ ऐसी ही शिक्षा हो। गृहकार्य ठोंक कर शिक्षक अपने कर्तव्यों की इतिश्री न कर लें।

ZEAL ने कहा…

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हर क्षेत्र में शोध की आवश्यकता है। निश्चय ही शोध से ही बेहतरी और विकास संभव है।

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'उदय' ने कहा…

... behatreen post !!!

उपेन्द्र ने कहा…

बहुत अच्छी शिक्षा व्यवस्था वहा पर .. येहा की शिक्षा व्यवस्था मैकाले जी निज़ात पाए तो न सुधरे .

संतोष त्रिवेदी ♣ SANTOSH TRIVEDI ने कहा…

"जनसत्ता" में आज छपी पोस्ट पढ़कर ,प्रवीण पाण्डेय के ब्लॉग के द्वारा यहाँ तक पहुंचा हूँ.शिक्षा के क्षेत्र में यदि अपने यहाँ भी सरकार सही वस्तु-स्थिति जान कर कार्य करे तो ही सुधार हो सकता है !