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शुक्रवार, 25 जून 2010

चींटियों से परेशान

YE5V1CAEW251YCA7OBXC3CAGAC54MCA434YRVCA3PE2TRCAAYD51ICAU2XBC1CALNP0DRCA22V247CAZAW7FNCAM071AICADXORH3CA7ZCJDUCARC140FCAUUFGA1CAPMG5XWCA7YPPNVCAF269R4CAT09Z9S चींटी देखने में बहुत छोटी लगती है, पर अपनी पर ये आ जाए तो अच्छे अच्छे मात खा जाएँ.  चींटी समाज की एकता के सामने खाप पंचायत भी फीकी पड़ जाएँ और टीम वर्क को देखा जाए तो अच्छे अच्छे PMP (Project Management Professionals) भी फ़ैल हो जाएँ|   इस छोटे से जीव को मारने में भी बड़ा संकोच सा होता है पर ये है कि अगर पीछे पड़ जाए तो फिर नानी याद दिला दे| एक मीठा टुकड़ा आप कहीं छोड़ दें फिर देखें कि सारी चींटी सेना कैसा एकत्र होकर काम निबटाती है और आपके लिए काम फैलाती है|

“देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर |”
जबसे गर्मी आयीं है, हम भी चींटियों से बहुत परेशान हैं! ससुरी कारपेट पर मिठाई तो दूर की बात नमकीन देखकर भी न जाने कहाँ से आ भटकती हैं| दो बच्चों का घर है तो कुछ न कुछ तो फैलेगा ही ना, पर इनकी समझ में ये नहीं आता|  बस बिना बुलाए मेहमान की तरह आ भटकती हैं और फिर जाने का नाम नहीं लेती जब तक कि इनकी जान न चली जाए|  हम भी क्रूर से क्रूरतम हुए जा रहे हैं, कभी स्प्रे से मार रहे हैं तो कभी गुस्से में आकर पैर से कुचलकर….तो कभी वैक्यूम क्लीनर से खींच डालते हैं, पर ये सब राक्षसी उपाय चींटी सेना के प्रयासों और इरादों की तीव्रता में कोई फर्क नहीं ला पा रहे हैं| हम और उधर चींटी सेना दोनों पक्ष यही गाये जा रहे हैं ..

“हम होंगे कामयाब एक दिन …..”
सुना है छत्तीसगढ़ में कुछ लोग इनको स्नैक्स के रूप में भूनकर या तलकर खाते हैं  !  पकोडे की तरह तलकर क्या ?  मुझे तो सुनने में ही घिन आ रही है, पर क्या कर सकते हैं लोगों का अपना अपना स्वाद है, देखो ये मशहूर एक्ट्रेस सलमा हायक भी क्या कह रही हैं -
"These little ants fried are amazing with a little guacamole."

क्या करें, यही सोच लेते हैं -

“तुलसी इस संसार में भांति भांति के लोग….”
मैं इन्टरनेट पर इनके बारे में पढ रहा था, गर्मियों में अक्सर चींटियाँ घरों और किचन के आसपास आती हैं, ये संयक्त परिवार में जीने वाला प्राणी है जो बड़ी बड़ी कोलोनी या समूह बनाकर रहता है| इनकी लगभग १२ हजार प्रजातियां अब तक पायी गयीं हैं| एक जगह लिखा था कि जैसे संयुक्त परिवार में सब मिलजुल कर काम करते है और फिर बाद में बांटकर खाते है, वैसे ही स्वभाव चींटी का होता है|  जब तक कोई चींटी काम करने लायक नहीं हो जाती (बचपन में) तब तक घर के या समूह के बड़े लोग इनका ध्यान रखते है और सिखाते है कि कैसे समूह में चला जाता है| काम करने के समूह भी बंटे होते हैं! इसके बारे में पढने के बाद ये बड़े एवं भले घर और सभ्य समाज से संबंद्ध रखने वाला प्राणी लगता/लगती है, पर शायद हमने अपनी सुविधाओं के चक्कर में इसे अपना दुश्मन मान लिया है! शायद यही हम प्रकृति की हर चीज के साथ कर रहे हैं !  मनुष्य कि चेष्टाएं अंतहीन हैं, फिर भी संतुष्टि का ग्राफ सबसे नीचे!!

शायद बाहर की तपन से अंदर घर में वातानुकूलित हवा के मजे लेने आती होंगी,   एक बार अंडे देना शुरू कर दें तो फिर इनके किले को तहस नहस करना डान की तरह मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है| कुछ लोग चिड़िया पालते है जो इनको खा जाती हैं. कुछ एसिड डालते है तो कुछ स्प्रे, कोई नहीं चाहता इनका अपने घर में विचरण!!  

खैर! इसने संयुक्त परिवार, टीम वर्क, एकता, श्रम, छोटे होकर भी सफल होने जैसे पाठ तो पढ़ा ही दिए मेरे जैसे कई लोगों को हराकर !!

देखो ये चींटी कितनी समझदार है ….
ant

चलो चींटी तो नहीं भाग रहीं घर से, आप जैसे ब्लॉग पर आने वालों को एक कविता ही झिला कर भगा देते हैं ….

चींटी तू इतनी सी छोटी पर बड़ी है खोटी
तुझसे छुटकारे की दिखती नहीं कोई गोटी
दिखने में तो तू है नहीं बिलकुल भी मोटी
फिर इतना खाना किधर तू करती है कल्टी
क्रमबद्ध चींटी सेना एकजुट होकर डटी
गिरकर बार बार चढती दीवाल ये नौटी
हार कैसे सकती है ये छोटी सी चींटी

10 टिप्‍पणियां:

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

जब ज़्यादा दु:खी करें तो हल्दी से भगाएं. कविता शायद काम न भी करे :)

Udan Tashtari ने कहा…

कविता सही ठेल गये और चीटियों की जानकारी भी..आ कहाँ से गईं सब? हमारे यहाँ तो नहीं होती.

आचार्य जी ने कहा…

बहुत सुन्दर।

abhi ने कहा…

:) awesome

शिवम् मिश्रा ने कहा…

बढ़िया पोस्ट|

राज भाटिय़ा ने कहा…

राम त्यागी जी मेरे गार्डन मै बहुत सी चींटिया है, जहां बेठना कठिन था, एक बार मेने बाजार से इन्हे मारने वाली दवा खरीद कर इन सब को मार दिया, फ़िर चार पांच साल मुझे कोई चीटीं तो नजर नही आई लेकिन मन मै एक ऊलझन सी थी कि मेने इन्हे क्यो मारा, फ़िर धीरे धीरे पहले से दुगनी चींटीया आ गई, लेकिन अब मैने इन्हे कुछ नही कहा, ओर देखा कि यह भी हमे कुछ नही कहती जब तक हम इन्हे ना छेडे, अगर यह शरीर पर भी चढ जाये तो नही काटती, बाकी बहुत से लोग इन को जिन्दा भी खाते है.
आप के लेख मै बहुत नयी बाते पता चली, इस सुंदर लेख के लिये धन्यवाद

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

पन्त की बहुत ही सुन्दर कविता है । मैं चींटी से बहुत प्रभावित है अतः मैं पूरी की पूरी डाल रहा हूँ । पढकर मनन करने योग्य है यह कविता ।

चींटी को देखा?
वह सरल, विरल, काली रेखा
तम के तागे सी जो हिल-डुल,
चलती लघु पद पल-पल मिल-जुल,
यह है पिपीलिका पाँति! देखो ना, किस भाँति
काम करती वह सतत, कन-कन कनके चुनती अविरत।

गाय चराती, धूप खिलाती,
बच्चों की निगरानी करती
लड़ती, अरि से तनिक न डरती,
दल के दल सेना संवारती,
घर-आँगन, जनपथ बुहारती।

चींटी है प्राणी सामाजिक,
वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक।
देखा चींटी को?
उसके जी को?
भूरे बालों की सी कतरन,
छुपा नहीं उसका छोटापन,
वह समस्त पृथ्वी पर निर्भर
विचरण करती, श्रम में तन्मय
वह जीवन की तिनगी अक्षय।

वह भी क्या देही है, तिल-सी?
प्राणों की रिलमिल झिलमिल-सी।
दिनभर में वह मीलों चलती,
अथक कार्य से कभी न टलती।

राजकुमार सोनी ने कहा…

चींटी तो बड़े काम की चीज है। यह बात किसी हाथी से पूछकर देखो।

राम त्यागी ने कहा…

@काजल भाई, चलो कभी जरूरत पड़ी तो हल्दी का उपयोग भी करके देखा जाएगा

@समीर जी, ये सब पिछले साल जब जर्मनी २-३ महीने के लिए गए थे तो घर लगभग बंद ही था , उस समय सारे अनचाहे मेहमान घर में आ बैठे थे

@भाटिया जी, बिलकुल सही कहा आपने , ग्लानी फील होती है मारने के बाद ..एक चींटी मार दो तो भी बेकार सा फील होता है

राम त्यागी ने कहा…

@प्रवीण जी, बहुत सार्थक और विषय को छूती कविता दी है आपने अपने साहित्यिक भण्डार से...हर पंक्ति में पन्त जी ने कूट कूट कर भाव भर दिए हैं !! अब तो चींटियों का स्वागत करना पड़ेगा इतनी प्रेरणा के बाद :)

@सोनी जी, सही कहा !! हाथी भी विचलित हो जाए इस नन्हे श्रमजीवी से !