हिंदी - हमारी मातृ-भाषा, हमारी पहचान
शुक्रवार, 23 जनवरी 2009
ओबामा आला रे . . .
राहुल गाँधी का सर्कस

राहुल और अन्य नेताओ में कोई फर्क नही नजर आ रहा सिर्फ इसके की इनको मार्केटिंग का आधुनिक तरीका आता है। राहुल को सबके सामने ये बात स्वीकार करनी चाहिए की उसके परिवार की वजह से अमेठी भी देश के अन्य भागो की तरह पिछड़ा है, रुकिए ज़रा .... ये स्वीकारोक्ति करनी होगी की गरीब और गरीब हुआ है और जो गाँधी परिवार को चाटने वाले थे उनका विकास हुआ है, वह लोग या तो राजनीती में , या धंधे में , या फिर गुंडागर्दी में आगे बढाए गए। गरीबो की तरफ इन लोगो ने कभी गंभीरता से ध्यान दिया ही नही, तभी तो गरीब विधवा की ये हालत है की राहुल की यात्रा के बाद मायावती ने उसके लिए अपने अफसर के हाथ ५०० रुपये भिजवाये, मायावती जो करोडो में खेलती है अपने आपको ५०० रुपये दान देकर रास्ट्रीय मीडिया के सामने महान बन रही थी।
में अपनी एक पुरानी कविता यहाँ लिखना चाहूँगा, की में पल पल यहाँ क्यों परेसान होता हूँ -
बहुत दुख देती है मेरे भारत की बीमारी मुझे
नाटक सा लगता है आज का ये विकास जहाँ सब कुछ है पर कुछ भी नहीं
कोई नही सुनता आज भी गरीब की, कोई नही देखता भूखे किसान को
न्याय के गलियारे हो या फिर सत्ता की बिसातें, हर जगह बिकती है ईमानदारी ....
गुरुवार, 22 जनवरी 2009
मुंबई के कुछ ही शहीदों को सलाम क्यूं ??

अगर कोई मेरी ये लेख पड़कर नाराज होता है तो मैं पहले से ही माफी माँग लेता हूँ , पर ये बात सच है की आप सबके दिमाग में भी यही सवाल बार बार आता होगा की क्यूं हर रोज केवल चुनिन्दा पुलिस वालो को ही बार बार शहीद बताया जा रहा है, सिर्फ़ इसलिए की वो उच्च पदों पर आसीन पदाधिकारी थे या फिर इसलिए की वो तथाकथिस शहरी वर्ग से आते थे, क्यों महानगरीय ठप्पे वाले लोग जैसे हेमंत जी, सालसकर जी को ही हम अशोक चक्र या वीरता चक्र देने की बात कर रहे है ? क्या वो पुलिस वाले जो तीसरे विस्वयुद्ध की बंदूको से लड़ रहे थे या फिर अपने डंडे से ही कुछ कमाल दिखा रहे थे, शहीदी का तमगा नही लगा सकते ? मेने आज तक किसी भी टीवी चैनल पर साधारण पुलिस वालो का नाम या लिस्ट नही देखी , मेने अपने ज्ञान के अनुसार वेब पर भी इधर उधर नजर दौडाई पर कही भी मुंबई के ३ अफसरों के अलावा किसी और का नाम नही दिखा, ये क्या मजाक है ? जैसे हेमंत करकरे जी, सालसकर जी और कामते जी ने बहादुरी या नेत्रत्व दिखाया वैसे ही अनेक और भी साधारण पुलिस वाले उस दिन अपना प्रयास करते हुए मारे गए होंगे, क्या कोई एक एसा आप लोगो मे से है जो उनके नाम जानता हो, किसी राजनीतिज्ञ ने या राहुल गाँधी जैसे तथाकथित महान लोगो ने उन बेनामो को याद किया ? क्या आपको नही लगता की सिर्फ चमत्कार को ही नमस्कार किया जा रहा है ? ऐसे अनेक सवालों ने मेरे को इतने दिनों से विचलित कर रखा है और मेने सोचा की चलो ब्लॉग के जरिये ही आप लोगो के साथ ये दुःख बाँट लूँ।
ये पुलिस वाले हमारे जैसे साधारण परिवारों से आते है और इसलिए ही शायद ऐसे असाधारण वक्तों में लोग उनका नाम भूल जाते है और ये भी नही सोचते की उनके परिवार पर जो किसी छोटे से शहर या गाँव में होगा और उसी पर निर्भर होगा , क्या बीत रही होगी । इन बड़े अधिकारियो के बेटे बेटी तो विदेश में पड़ते है, पर उन छोटे लोगो को जिनके बच्चे सरकारी स्कूल में ही जाने को बहुत कुछ समझते है. भारत में यही अन्तर एक गरीब और अमीर , एक छोटे और बड़े आदमी के बीच मेरे को पीड़ा देता है. जब तक ये अंतर ख़त्म नही होगा, क्या हम छोटे लेवल पर, जड़ो में उर्जा पैदा कर पायेंगे ? मेरा उत्तर है नही नही....नही और इन्ही हरकतों से हम ये भावना भी भर रहे है की इमानदारी , बहादुरी की तारीफ तभी है जब आप चमक रहे हो, बड़े हो, पदासीन हो या फिर राजनैतिक गलियारों में आपकी पहुँच हो, चाटुकारिता में आप माहिर हो. हम सबने केवल कुछ को महत्व देकर सबके बलिदान को यहाँ तक की इन तीनो बहादुरों के बलिदान को भी फीका कर दिया.
अगर किसी के पास अन्य शहीदों की सूची है तो कृपया मेरे को ईमेल कर दें.
सादर धन्यवाद !!
शनिवार, 25 अक्टूबर 2008
प्रज्ञा सिंह - चम्बल का गौरव - क्यों कलंकित किया जा रहा है ?
भाजपा क्यों उनके बचाव में नही आ रही है ? क्या कोई मेरा ब्लॉग पड़ने वाला प्रज्ञा सिंह को नजदीक से जानता है ? अगर वो बेक़सूर है तो में उनकी हर सम्भव सहायता करने के लिए आगे आऊंगा , इसके लिए नही की वो हिंदू है , बल्कि इसलिए की चम्बल जैसे इलाके में इस तरह के उर्जावान लड़की कोई साधारण लड़की नही बल्कि एक क्रन्तिकारी युवा होगी जिसने समाज के तमाम संघर्षो के बाबजूद अपनी एक पहचान बनाई। राजनीती की चक्की में ऐसे युवा को पिसने नही देना चाहिए (अगर वो बेकसूर है)। मेरे को पूरा विस्वास है की दाल में कही न कही कुछ काला है ।
- राम
------------------
में सभी लोगो का धन्यवाद देना चाहूँगा आपके समय के लिए और इस भावनात्मक मुद्दे पर अपनी टिप्पणी देने के लिए.
मेने बहुत ही संक्षिप्त में अपना लेख लिखा था तो बहुत सी चीजे अनकही रह गई थी. में अपनी तरफ से कुछ सफाई और अपना पक्ष रखना चाहूँगा -
एक महाशय ने लिखा है की - "चम्बल में डकैत बहुत पैदा किए हैं।"
मेरा स्पष्ठीकरण - पता नही किसकी टिप्पणी है, पर महाशय ये भूल गए है की राम प्रशाद विस्मिल भी चम्बल से ही थे. चम्बल के सैकडो वीर भारतीय सेना में और अन्य विभिन्न स्तरों पर देश सेवा में अपना योगदान दे रहे है. डाकू होने का कारण कुछ परिस्थितियां होती है, चाहे वो आर्थिक हो या फिर सामजिक . मेने भी अपने छोटे से लेख में यही लिखा था की प्रज्ञा सिंह ने चम्बल की सामाजिक विसमताओ से ऊपर उठाकर अपने आप को स्थापित किया , वह अपने आप में एक बड़ी बात है.
Ratan Singh जी लिखते है की प्रज्ञा सिंह जी को न्याय पालिका के सहारे छोड़ देना चाहिए -
मेरा स्पष्ठीकरण - में एक हद तक सहमत हूँ क्यूंकि मेरे को भारत के कानूनी आधारभूत ढाँचे पर पूरा विस्वाश है. राजनीतिक और तथाकतित धर्म निरपेक्ष पक्षों ने एक हद तक एस विस्वास को तोडा है पर जो सच होगा वो सामने आएगा ही- चाहे देर भले ही लग जाए. और में वादा करता हूँ की अगर प्रज्ञा सिंह दोषी है तो में अपने ब्लॉग में उनके घिनोने कृत्य की भर्त्सना करने से भी नही चुकूँगा. देश द्रोह तो हर मायने में निंदा का ही पर्याय बनेगा. ब्रंदा कारत मैडम ने तो इसे हिंदू आतंकवाद का नाम दे दिया बिना आगे पीछे देखे ... वोट बैंक के लिए ये नेता लोग अपने माँ बाप और धर्म किसी को भी बेच सकते है. सब कुछ राजनीती के पांसे लगते है इसलिए कभी कभी लगता है की कोई निर्दोष बेबजह इतना अपमानित न हो की वो जीने से ही डरने लगे, क्यूंकि कुछ लोगो के जीने का मतलब इज्जत और सम्मान , सिधान्तो पर चलना होता है.
आलोक सिंह "साहिल" जी जानना चाहते है की अगर प्रज्ञा सिंह दोसी है तो क्या में उनकी भर्त्सना करूँगा ?
मेरा स्पष्ठीकरण - जरूर करूँगा, फिर समर्थन करने की क्या बात है ? आतंकवाद को समर्थन देने की तो हम सोच ही नही सकते, हम भारतीयों ने आतंकवाद की जो मार झेली है , निर्दोष लोगो को ट्रेन में, बाजारों में, कश्मीर में मरते देखा है. किसी के जवान बेटे को तो किसी बेटी के बाप को बलि चढ़ते हुए हर रोज ही तो हम देखा रहे है देश के किसी न किसी हिस्से में, ऐसे में आतंकवाद को में कभी सही नही कहूँगा. बस जब तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोग इन भावनात्मक मुद्धो पर राजनीतिक रोटियां सेकते है तो बहुत दुःख होता है. मेने प्रज्ञा सिंह के बारे में लिखा है की अगर वो किसी षडयंत्र का शिकार है तो में हर सम्भव कोशिश करूँगा की में उनको इस सदमें से निकालने के लिए कुछ करू. इसलिए नही की वो हिंदू है बल्कि इसलिए की वो मुझको एक ईमानदार और निर्भीक युवा लगती है.
श्रीकांत पाराशर जी लिखते है की हमें न्याय व्यवस्था में विश्वाश होना चाहिए और हिंदू को हिंदू का और मुसलमान को मुसलमान का समर्थन करना छोड़ देना चाहिए क्यूंकि देशहित सर्वोपरी है.
मेरा स्पष्ठीकरण - में बिल्कुल सहमत हूँ. आतंकवाद का कोई धर्म नही होता और न ही इसका धर्म के आधार पर पक्ष लिया जा सकता है. आतंकवाद या फिर अलगाववाद के समर्थन के लिए मेरे पास कोई तर्क नही है.
Suresh Chiplunkar जी ने लिखा है की बीजेपी की आदत हो गई है उपयोग करके फेंकने की.
मेरा स्पष्ठीकरण - भारत के किसी भी राजनीतिक दल के पास कोई सिद्धांत नही है. ये सभी स्वार्थ की राजनीती करते है.
बुधवार, 1 अक्टूबर 2008
भारत की परमाणु यात्रा
भारत परमाणु परिवार का फिर से सदस्य बन गया है । मेने सोचा की चलो इसके इतिहास में जाकर कुछ निकाल कर लाया जाए।
- १९४७ जब भारत को स्वतंत्रता मिली , भारत ने शुरू से ही अहिषा के सिद्धांत को बढावा दिया इसलिए भारत ने कभी भी एक परमाणु हथियारों को महाशक्ति बनने की नही सोची। इसी सोच के साथ भारत ने १९४८ में Atomic Energy Act लाया गया।

3 January 1954 - Bhabha Atomic Research center की स्थापना की गई।
६ अप्रैल १९५४- अब तक लगभग ५० परिक्षण अनेक देसों ने किए और इसी पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लोक सभा में कहा - "nuclear, chemical and biological energy and power should not be used to forge weapons of mass destruction" । पर सुनने वाला कौन था, दुनिया के ज्यादातर देश cold war में संलंग्न थे ।
१९६३ - अब जब सब ताकतवर देशो ने अपने अपने परिक्षण कर लिए और अपने आपको इस क्षेत्र में माहिर बना लिए, उन लोगो ने इसे परीक्षणों पर रोक लगाने की मुहिम शुरू की।
१९६८ - Nuclear Non-Proliferation Treaty (NPT) को लाया गया। पर ये भी बहरत की सुरक्षा जरूरतों के मुताबिक नही थी। इस पर भारत की लोकसभा में बहस भी हुई, और एक मत से सभी ने इसके विपक्ष में मत दिया.


१९७४ - भारत ने भी अपने परमाणु कौशल को संसार को दिखाया। हम कभी नही भूल सकते वो शब्द - "The Buddha is smiling" ।
कुछ तथ्य -
टेस्ट: Smiling Buddha
Time: 8:05 18 May 1974 (IST)
Location: Pokhran, Thar Desert, Rajasthan, India27।095 deg N, 71।752 E
Test Height and Type: Underground, -107 m Yield: 8 kt (12-13 kt claimed)
१९९६ - अब तक १००० से ज्यादा परिक्षण हो चुके थे, और तब CTBT (Comprehensive Test Ban Treaty ) को सारे देशो के समक्ष लाया गया। पर ये भी भारत की सुरक्षा चिन्ताओ के अनुरूप नही थी।
- ११-13 May १९९८ भारत ने पोखरण में तीन परमाणु परीक्षण किए और विश्व को अपनी काबिलियत से परिचय कराया।
भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल जी के शब्द -
"India is now a nuclear weapons state।""We have the capacity for a big bomb now। Ours will never be weapons of aggression।" Prime Minister Atal Behari Vajpayee, Thursday 14 May 1998

इसको operation शक्ति नाम दिया गया - http://nuclearweaponarchive.org/India/IndiaShakti.html
२१ वि शताब्दी में भारत एक नई शक्ति के रूप में आगे आता हुआ - एक लिंक http://nuclearweaponarchive.org/India/IndiaNPower.html
- २००५ जैसे की भारत एक महाशक्ति के रूप में उभर रहा था, परमाणु शक्तियो जैसे अमेरिका, फ्रांस आदि को भारत का विशाल मार्केट उनकी आर्थिक महत्वाकांछाओ को पूरा करता दिखा और तब तत्कालीन अमेरिकन रास्त्रपति बुश ने अपनी भारत यात्रा के दौरान भारत के साथ परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर किए।
- २००८ भारत और अमेरिका की लोकसभा और सीनेट ने एस बिल को पारित कर दिया. और फ्रांस भी कहा कम रहने वाला था, उसने भी भारत के साथ सिविल nuclear समझोते पर हस्ताक्षर किए.
साभार -
http://nuclearweaponarchive.org/India/index.html
PAPER LAID ON THE TABLE OF THE LOK सभा ON 27TH MAY, १९९८
http://www.fas.org/news/india/1998/05/980527-goi1.htm
नया नया मौसम
शायद कोई परिवर्तन की बेला हो
या फिर ये कोई नई कला है इनकी
भगवा रंग की चादर जैसे ओड़ रहे हों
उड़ते सुनहरे रंग के ये पत्ते
ठंडी हवा की कोमल झपकी सी दे जाते है
पत्झढ़ बोलूँ या फाल
नये मौसम का है ये आगाज।
रविवार, 28 सितंबर 2008
नमस्ते जी .....
इन दिनों में देश एक तरफ आतंकवाद में झुलसा तो दूसरी तरफ साम्प्रदायिकता की आड़ में, नेता लोग एस दौरान बिल्कुल उम्मीदों पर खरे उतरे और उन्होंने वही व्यवहार दर्शाया जिसकी सबको उम्मीद थी। किसी ने बजरंग दल को सिमी जैसा बताया तो किसी ने बोला की हम आतंकवादियों के सामने नही झुकने वाले। हमारे योग्य पर अक्षम्य प्रधानमंत्री जी ने हमेशा की तरह फिर से कड़े क़ानून को न लाने की वकालत कर सोनिया जी को खुश किया। उधर शिवराज पाटिल जी ने भी मैडम सोनिया जी के दरबार में पेशी कर अपनी कुर्सी बचने की कोशिश करते रहे और सफल भी रहे पर कभी भी देश को बचाने के लिए मेरे को कर्त्व्यनिस्ठ नजर नही आए। किसी ने मोदी के उन शब्दों पर ध्यान नही दिया जब उन्होंने बोला था की ये एक तरह का युद्ध है जिसके लिए हमें व्यापक स्तर पर प्रेपरेशन करनी होगी और इस युद्ध को जीतना होगा। मोदी की बात को क्यों सुना जायेगा, जहा पार्टी देश से बड़ी और निजी महत्व के लिए राजनीति हो रही हो वहां पर सही बात के लिए जगह न होना स्वाभाविक है
उधर लोग बजरंग दल को सिमी की तरह भी बता कर अपनी रोटिया सेंक रहे है। अपनी इटली वाली मैडम को खुश कराने के लिए हमारे राधोगढ़ के भुत पूर्व राजा दिग्गी राजा किसी से कम नही रहे, क्यों न हो , राज तो तभी करने मिलेगा। उन्होंने बोला की सिमी और बजरंग दल एक ही सिक्के के दो पहलू है । एस पर रोक लगा दो , इसको आतंकवादी संघठन घोषित कर दो। जब ख़ुद के घर में प्रोग्राम हो तब हिंदू धर्म ही याद आएगा और जब वोट बैंक की बात हो तो हिंदू धर्म की वकालत कराने वाले साम्प्रदायिक हो गए। में किसी धर्म या ग्रुप का पक्ष नही ले रहा बल्कि ये कहने कोशिश कर रहा हूँ की हम समस्या की जड़ को क्यों नही देखते। ये बात सही है की हिंदू लोग कुरीतियों के लिए जिम्मेदार है जिनकी वजह से अपने ही लोग इस महान धर्म और संस्कारों की परम्परा को छोड़कर कुछ लोगो के बहकावे में आ जाते है और जब कुछ लोग esi गलती का पश्चाताप कर कुछ सही कराने की कोशिश करते है तो हमारे राजनीतिक लोग कथित धर्म निरपेक्षता की आड़ में ग़लत बात को भी सही bataane पर utar आते है। कुछ हद तक इसाई मिशनरी भी जो उडीसा और कर्नाटका में हो रहा है उसके लिए जिम्मेदार है। वो पश्चिम में जाकर अपने अधिकारों के लिए रोते hai, और bhool जाते है की wo bharat mein rah rahe hai, bujurgo ne kahaa hai ki apane ghar ki baat bahar naa ye to theek rahataa hai. पॉप को अपना मेसेज तब देना याद नही आता जब कश्मीर में निहत्थे लोग मारे जाते हैभारत सरकार को आर्थिक रूप से हो रहे धर्मांतरण पर रोक लगानी होगी और हिंदू धर्म को पिचारे लोगो को सम्मान देना होगा, और इन नेताओ को कुछ अपने अन्दर की आवाज भी सुननी होगी। मेरे को नही लगता की बजरंग दल के लोग आतंकवादी है। वो गुंडागर्दी करते है जिसके लिए sakht क़ानून होना चाहिए। पर अपने वोट बैंक के लिए गुंडागर्दी और आतंकवाद की परिभासा एक कर देना सही नही है। पाबन्दी लगा दो गुंडागर्दी और कानून तोड़ने के नाम पर , पर देश तोड़ने के नाम पर नही। क्या लालू के प्यारे शहाबुद्दीन और कोंग्रेस के प्यारे सिबू सोरेन गुंडे नही है ? ये तो सत्ता का सुख भोगे क्यूकी वो aapaki सरकार बचाते है और जो विपक्ष में है वो आतंकवादी हो गया। देश को आगे बढाना है तो राजनीती को वैचारिक और सैधांतिक रूप से मजबूत होना होगा।
जागो प्यारे मनमोहन और बचा लो इस देश को इससे पहले की हर गली में गुजरने से पहले लगे की कही कोई विस्फोट ना हो जाए/
आज इतना ही ....