हिंदी - हमारी मातृ-भाषा, हमारी पहचान

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए अपना योगदान दें ! ये हमारे अस्तित्व की प्रतीक और हमारी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है !

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रविवार, 28 नवंबर 2010

धोबी का कुत्ता घर का न घाट का

confused-monkey1 बाईक चलाना तो जैसे भूल ही गया हूँ, क्लिच के साथ गियर पर नियंत्रण और इधर उधर से रेंडम क्रम में आने वाले व्यक्तियों और वाहनों की कस्साकस्सी में मैं जैसे फिर से शहर के लिए गांव से आने वाला एक सीधा साधा इन्सान बन गया हूँ, मेरे छोटे भाई मुझे बाईक पर बैठने नहीं देते कि कहीं मैं हाथ - पैर ना तोड़ लूं !   इतना बुरा भी नहीं चलाता पर लोगों की फीडबैक ऐसी है कि कोई सुन ले तो साथ पीछे बैठेगा ही नहीं, अर्धांगिनी तो पहले ही हाथ जोड़ बैठी कि हम तो ऑटो कर लेंगे … पर फिर भी मन है कि खुद को सर्वश्रेष्ठ मानता है, लगता है थोड़े प्रयास और भरसक अभ्यास की जरूरत है. 

कार चलाना में भी वही संघर्ष, यहाँ भी क्लिच और गियर का मिश्रण और ऊपर से बाजारों की भीड़ मुझे अनियंत्रित सा कर देती है, भले ही अमेरिका और जर्मनी में गाडी की गति उड़न खटोले जैसी करके फिर भी नियंत्रण संभव है पर यहाँ वही हाथ डगमगा रहे हैं, सुविधा ने संघर्ष को मात दे दी और हम कुछ ज्यादा ही सरल जीवन जीने के आदी हो गए हैं,  बाथरूम में से बदबू आती है तो धूल से छींक ही छींक - जैसे हम अपने ही घर में बेगाने से हो गए !  इस कहते हैं कि धोबी का कुत्ता न तो अब घर का रहने वाला है और न घाट का…अमेरिका में भारतीय जीवन जीते हैं और भारत में आकर जैसे स्पीड में कही पिछड़ रहे होते हैं,  यहाँ आकर हर मोड पर मेरा और सबका बहाना होता है कि अब वो यहाँ नहीं रहते ना, तो आदत नहीं रही !!

ट्रेन और बस में धक्कामुक्की है पर अगले ही पल बातों में अपनापन लिए पुरानी सौंधी खुशबू लिए प्रेम झलक पड़ता है.  सकल घेरलू उत्पाद की दर का प्रभाव लोगों के जीवन पर भी प्रतिलक्षित होता दिखता है, सब लोग व्यस्त है, बच्चे स्कूल के बोझ से पस्त हैं और हर कोई आगे बढ़ने की होड़ में मस्त है, हर हाथ की उँगलियाँ मोबाइल के पैड पर हैं, और शहरों के बाजारों की गलियाँ विदेशी रंग में रंगने के लिए उतावली हैं,  देश परिवर्तन के लिए तेजी से आगे बढ़ रहा है और कहीं  न कहीं मौलिकता बाजारू और दिखावे का साधन मात्र होकर रह गयी है, मैं स्तब्ध सा खड़ा मंहगी होती चीजों को बस निहारता रहता हूँ, खुद को गरीब अनुभव करता हूँ और असमर्थ भी यहाँ के बाजारों में !  इतनी महँगाई अगर प्रगति के साथ गेहूं के साथ खरपतवार की तरह आती रही तो क्या एक दिन ये देश बंजर नहीं हो जाएगा ? 

250px-Swami_haridas_TANSEN_akbar_minature-painting_Rajasthan_c1750_crpकल दैनिक भास्कर समाचार पत्र में एक समाचार था,  तानसेन समारोह जल्द ही ग्वालियर में शुरू होने वाला है,  हर साल दिसंबर में ये समारोह होता है. अकबर के नवरत्नों में से एक तानसेन जी ग्वालियर के पास ४० कि मी दूर बेहट नामक गाँव में जन्मे थे और समाचार पत्र के अनुसार इस गाँव का बच्चा बच्चा ध्रुपद गायन जानता है, ये कला उनके खून में बसती है,   250px-Tomb_of_Tansenपर सरकार की और से आज तक ना तो बेहट के लिए और ना ही इस गाँव के लोगों की कला को आगे लाने के लिए कुछ किया है ! मैं शिवराज सरकार और भाजपा से निवेदन करूँगा कि इस और कुछ ध्यान दें !    हो सकता है कि तानसेन समारोह को भी ग्वालियर से बेहट में ले जाकर इस स्थान पर एक उत्साह पैदा करे !!

शनिवार, 13 नवंबर 2010

हिन्दी बोलने में असमंजस क्यूं ?

हम भारतीय उत्सव मनाने के बड़े शौक़ीन होते हैं,  शादी का जश्न हो या फिर पुरुस्कार वितरण का मंच, हर जगह दो चीजें जरूर प्रभावी रहती हैं - एक तो जगमग रौशनी और हिन्दी फिल्मों के गाने और दूसरा अंग्रेजी में वार्तालाप करते लोग !

अमेरिका में सामान्यतः लोग मंदिरों में मिलते हैं या फिर घरों में पौटलक के दौरान एक दूसरे से मिलते हैं, जब मिलेंगे तो अभिवादन से लेकर हर चर्चा में अंग्रेजी हावी रहती है, चलो एक बहाना हो सकता है विभिन्न क्षेत्रों से आये लोग एक कॉमन भाषा समझते हैं इसलिए चलो अंग्रेजी को ही तरजीह दी जाए !  मंदिरों में सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान हर चीज अंग्रेजी में ही बोली जायेगी पर सब थिरकते या कला का प्रदर्शन हिंदी में ही या हिंदी गानों पर ही करते दिखेंगे.  अभी हाल ही में जब निकुंज का मंच से पहला कार्यक्रम था तो तकरीबन ३०-३५ विभिन्न तरह के कार्यक्रम प्रस्तुत किये गए और ९८ प्रतिशत हिंदी में ही थे, बाकी २ प्रतिशत में वाध्य  यन्त्र इत्यादि के कार्यक्रम थे जिसको किसी भाषा के मोहताज होने की आवश्यकता नहीं है,  हालांकि इस मंदिर में ५० प्रतिशत से भी अधिक लोग दक्षिण भारत से आते हैं पर हिंदी गानों की लोकप्रियता सबको एक सूत्र में बांध देती है, पर एक गौर करने वाली बात रहती है कि जब स्टेज पर किसी को बुलाया जाने वाला हो या किसी नृत्य या कला की व्याख्या मंच संचालक कर रहा हो तब हिंदी के शब्द उनके मुंह पर क्यूं नहीं आते ?  इतना असमंजस क्यों उस समय हिंदी बोलने में  ? तब विभिन्न क्षेत्र से आये लोगों का हवाला दे अंग्रेजी ही क्यूं होटों पर आती है ?

हमारे यहाँ पास में ही हिंदू स्वयंसेवक संघ की एक शाखा हर रविवार को लगती है, एक दिन परिवार सहित इस आशा के साथ मैं भी गया के अब नियमित हर रविवार को आया करूँगा जिससे बच्चे भी कुछ अलग सीख सकेंगे और संस्कृति के पास रहने के एक और मौका हाथ से नहीं जाएगा.  ये शाखा यहाँ बहुत सारे कार्यक्रमों का संचालन छोटे छोटे स्तर पर कर स्वयंसेवकों को सार्थक कार्य में हाथ बंटाने के एक अवसर देती है और बच्चों के लिए भी पठन और अध्ययन की व्यवस्था है पर यहाँ भी अंग्रेजी बीच में आ गयी, हर कोई अंग्रेजी में ही परिचय से लेकर योग और धर्म की शिक्षा और कक्षा लेता दिखा, जैसे हम हिंदी को भी तोड़ मरोड़ कर हिंदी में घुसाने की कोशिश कर रहे हों , वही हिंदी में संचालन का असमंजस यहाँ भी दिखा !!

ये तो रही अमेरिका में रह रहे लोगों की बात !

अब अगर मैं हिंदुस्तान की बात करूँ तो वहाँ भी कार्यक्रमों के संचालन में हिंदी बोलने में बड़ा संकोच दिखाई देता है,  जैसे बॉलीवुड के हर पुरुस्कार वितरण समारोह में संचालन अंग्रेजी में ही होगा, हिंदी फिल्मो के पुरुस्कार वितरण में क्या हिंदी किसी की समझ में नहीं आती ?  या हिंदी बोलने से कार्यक्रम की महत्ता घट जायेगी या फिर क्या अंग्रेजी में बोलना समाज में आपके स्तर को ऊँचा दिखाता है ?  जो भाषा मुंबई को इतना व्यवसाय दे रही है क्या उसको लोग समझते नहीं, जब हम ही इतनी असमंजस में है तो आगे आने वाली पीढ़ी तो हिंदी के बारे  में और भी ज्यादा संशय में रहेगी !!

शायद इसलिए ही हिंदी केवल (symbolic) राजभाषा बन कर रह गयी है, राष्ट्रभाषा का सपना अगर असंभव नहीं तो असमंजस भरा जरूर लगता है !!   हम शायद भूल गए कि …

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