हिंदी - हमारी मातृ-भाषा, हमारी पहचान

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए अपना योगदान दें ! ये हमारे अस्तित्व की प्रतीक और हमारी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है !

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शनिवार, 13 नवंबर 2010

हिन्दी बोलने में असमंजस क्यूं ?

हम भारतीय उत्सव मनाने के बड़े शौक़ीन होते हैं,  शादी का जश्न हो या फिर पुरुस्कार वितरण का मंच, हर जगह दो चीजें जरूर प्रभावी रहती हैं - एक तो जगमग रौशनी और हिन्दी फिल्मों के गाने और दूसरा अंग्रेजी में वार्तालाप करते लोग !

अमेरिका में सामान्यतः लोग मंदिरों में मिलते हैं या फिर घरों में पौटलक के दौरान एक दूसरे से मिलते हैं, जब मिलेंगे तो अभिवादन से लेकर हर चर्चा में अंग्रेजी हावी रहती है, चलो एक बहाना हो सकता है विभिन्न क्षेत्रों से आये लोग एक कॉमन भाषा समझते हैं इसलिए चलो अंग्रेजी को ही तरजीह दी जाए !  मंदिरों में सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान हर चीज अंग्रेजी में ही बोली जायेगी पर सब थिरकते या कला का प्रदर्शन हिंदी में ही या हिंदी गानों पर ही करते दिखेंगे.  अभी हाल ही में जब निकुंज का मंच से पहला कार्यक्रम था तो तकरीबन ३०-३५ विभिन्न तरह के कार्यक्रम प्रस्तुत किये गए और ९८ प्रतिशत हिंदी में ही थे, बाकी २ प्रतिशत में वाध्य  यन्त्र इत्यादि के कार्यक्रम थे जिसको किसी भाषा के मोहताज होने की आवश्यकता नहीं है,  हालांकि इस मंदिर में ५० प्रतिशत से भी अधिक लोग दक्षिण भारत से आते हैं पर हिंदी गानों की लोकप्रियता सबको एक सूत्र में बांध देती है, पर एक गौर करने वाली बात रहती है कि जब स्टेज पर किसी को बुलाया जाने वाला हो या किसी नृत्य या कला की व्याख्या मंच संचालक कर रहा हो तब हिंदी के शब्द उनके मुंह पर क्यूं नहीं आते ?  इतना असमंजस क्यों उस समय हिंदी बोलने में  ? तब विभिन्न क्षेत्र से आये लोगों का हवाला दे अंग्रेजी ही क्यूं होटों पर आती है ?

हमारे यहाँ पास में ही हिंदू स्वयंसेवक संघ की एक शाखा हर रविवार को लगती है, एक दिन परिवार सहित इस आशा के साथ मैं भी गया के अब नियमित हर रविवार को आया करूँगा जिससे बच्चे भी कुछ अलग सीख सकेंगे और संस्कृति के पास रहने के एक और मौका हाथ से नहीं जाएगा.  ये शाखा यहाँ बहुत सारे कार्यक्रमों का संचालन छोटे छोटे स्तर पर कर स्वयंसेवकों को सार्थक कार्य में हाथ बंटाने के एक अवसर देती है और बच्चों के लिए भी पठन और अध्ययन की व्यवस्था है पर यहाँ भी अंग्रेजी बीच में आ गयी, हर कोई अंग्रेजी में ही परिचय से लेकर योग और धर्म की शिक्षा और कक्षा लेता दिखा, जैसे हम हिंदी को भी तोड़ मरोड़ कर हिंदी में घुसाने की कोशिश कर रहे हों , वही हिंदी में संचालन का असमंजस यहाँ भी दिखा !!

ये तो रही अमेरिका में रह रहे लोगों की बात !

अब अगर मैं हिंदुस्तान की बात करूँ तो वहाँ भी कार्यक्रमों के संचालन में हिंदी बोलने में बड़ा संकोच दिखाई देता है,  जैसे बॉलीवुड के हर पुरुस्कार वितरण समारोह में संचालन अंग्रेजी में ही होगा, हिंदी फिल्मो के पुरुस्कार वितरण में क्या हिंदी किसी की समझ में नहीं आती ?  या हिंदी बोलने से कार्यक्रम की महत्ता घट जायेगी या फिर क्या अंग्रेजी में बोलना समाज में आपके स्तर को ऊँचा दिखाता है ?  जो भाषा मुंबई को इतना व्यवसाय दे रही है क्या उसको लोग समझते नहीं, जब हम ही इतनी असमंजस में है तो आगे आने वाली पीढ़ी तो हिंदी के बारे  में और भी ज्यादा संशय में रहेगी !!

शायद इसलिए ही हिंदी केवल (symbolic) राजभाषा बन कर रह गयी है, राष्ट्रभाषा का सपना अगर असंभव नहीं तो असमंजस भरा जरूर लगता है !!   हम शायद भूल गए कि …

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