हिंदी - हमारी मातृ-भाषा, हमारी पहचान
मंगलवार, 9 जून 2009
पर्यावरण बचाने के लिए में क्या कर सकता हूँ ?
कलावती को भूले राहुल लाला
जब वोट की जरूरत थी तब राहुल को कलावती की याद आई और जब उसके
मुद्दों को सुलझाने की बात आई तो राहुल जी व्यस्त थे। ये कहानी इस परिवार के असली चेहरे को व्यक्त कराती है। इन लोगो की कथनी और करनी में अन्तर की वजह से ही भारत विश्व के अन्य देशो की तुलना में इतना पीछे रह गया है। अमेठी जहाँ से ये लोग जन प्रतिनिधि है, वहां की स्थिति इस बात को सिद्ध करती है की इनके खाने और दिखने के दांत अलग अलग है। CNN IBN की ये रिपोर्ट भी देखें -
http://ibnlive.in.com/videos/94536/mascot-kalavati-turned-away-from-rahuls-office.html
केवल किसी परिवार में जन्म लेने से कुछ लोग मसीहा बन जाते है, हम लोगो को देश में लोगो को शिक्षित करनेके लिए कुछ प्रयास करने होंगे जिससे लोग इन लोगो का मूल्यांकन उनके विकास के प्रष्ठभूमि के आधार पर कर सकें। अशिक्षा हमें बहुत पीछे धकेल रही है और ऐसे अवसरवादी लोगो को हमारा फायदा लेने के लिए अवसर दे रही है। मेरे पिताजी ने एक लडके को अपने घर रखा हुआ है, उसको वो पढाते है और स्कूल भेजते है, और उनसे बनता है तो उसके फॅमिली को आर्थिक सहायता करते है, वो कहते है की म्रतभोज और दहेज़ की जगह पैसा किसी गरीब की उन्नति में लगाओ तो वो किसी न किसी रूप में फलीभूत होता दिखेगा , जैसा की आप एक पेड़ लगाकर और जब पेड़ के बड़े हो जाने पर छाया लेकर अनुभव करते है।
चलो कुछ ऐसा ही करें जिससे कलावती को राहुल के चक्कर न लगाने पड़े और वह आत्मनिर्भर बने स्वाभिमान से जीने के लिए । हमें युवराज नही जन सेवक चाहिए, राहुल और सिंधिया को महलों में भेज देते है आराम करने के लिए।
शुक्रवार, 5 जून 2009
खुलासा एक और विकास का !!
ये सब चुनावी वायदे ज्यादा लगते है और विकास के लिये उठाये गये सही कदम कम , अभी मे जब फरबरी मे छुट्टियां बिताने के लिये मोरेना आया था तो देखा और लोगो से बात की
तो पता लगा कि ये सब योजनायें जरुरत मन्द लोगो तक पहुन्च ही नही रही हैं. लड्कियो को सायकिल लेने के लिये अफसरो के , मास्टरों के चक्कर लगाने पडते हैं. कुल मिलाकर जमकर भ्रश्टाचार है. कास कि लाडली लक्ष्मी योजना की जगह अस्पतालो की हालत में सुधार किया जाता, जिससे जन्म के समय मां और बच्चे क स्वास्थ्य सही रहता और जन्म की नीव सही रहती पर मेरी बातें स्वास्थ्य मंत्री जी को मजाक लगेगीं.गाँवों में अभी भी कभी बिजली नही आती और शहरों में उद्योग लगातार बंद हो रहे है, क्या यही कांग्रेस की सरकार को हटाने के बाद उम्मीद थी हमें अपने इस लाडले मुख्यमंत्री जी से ? गावो में अभी भी लोग स्वास्थ्य , सड़क, बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाओ के लिए मोहताज है , पुलिस अभी भी डर का अभिप्राय है न की सुरक्षा की मूरत। देशभक्ति और जनसेवा के नाम पर अभी भी करोडो की वसूली से केवल कुछ ही लोग अमीर हो रहे है, वो भी काबिल नही, सब के सब राजनीतिक गुंडे !
सोमवार, 1 जून 2009
बुधवार, 13 मई 2009
अरे भाई क्यों गाली देते हो ?
१। अगर ये दो नंबर की कमी न करेंगे तो इनके बच्च्चे और बीबी (यां) मल्टीप्लेक्स में जाकर कैसे सामान खरीदेंगे ? गाँव में कोई मल्टीप्लेक्स क्यों नहीं खोलता ? हर कोई वही क्यों खोल रहा है जहाँ पर ऐसे लोग रहते है ? इसका मतलब ये लोग आज की प्रगति के सच्चे जिम्मेदार लोग है.
२। शादियाँ इतनी रंगीन और आलिशान कैसे होंगी फिर ? आजकल शादियाँ इतनी आलिशान इसलिए ही है क्यूंकि हमारा प्रजातंत्र बहुत योजनाये लेकर आ रहा है, और जितनी योजनाये , उतना ही बचत सरकारी कर्मचारियों के लिए २ नंबर की कमाई से, और उतना ही पैसा शादी के खर्च में लगा सकते है, जिससे अर्थव्यवस्था का चक्र चलता रहता है. नहीं तो बैंड की और हलवाई की दुकाने ही बंद हो जायेंगी.
३। पेमेंट वाली सीटो के कॉलेज खुल रहे है क्यूंकि दो नंबर का पैसा है तो क्या टेंशन है बच्चा पढे या नहीं, कही न कही तो जुगाड़ हो ही जायेगी. कॉलेज खुलेंगे तो आसपास के क्षेत्र का भी विकास होगा, इसका मतलब इन लोगो का ये योगदान भी अभूतपूर्व है.
४। रिश्वत की कमाई के लिए इन लोगो को भी बहुत कुछ करना पङता है, जैसे फाइलो में हेराफेरी , साईट पर जाओ तो कर्मचारियों या फिर सामान की संख्या में हेराफेरी, बॉस की कमीशन की जुगाड़, आदि आदि , ये सब करने में भी मेहनत लगता है.
५। शायद हम इसलिए इन लोगो की बुराई करते है क्यूंकि हम इस काबिल ही नहीं की ऐसी चतुराई से काम कर सकें -)
इन सब कारणों को देखते हुए, ये सत्य है ये लोग भी आज के तथाकतित प्रगतिशील भारत के विकास में जिम्मेदार है। पर ये इससे भी बड़ा सत्य है भारत की ७० प्रतिशत जनता अभी भी प्रगति से अछूते उन गांवों में रहती है जहाँ बिजली आती कभी कभी है , जाती तो हर समय है, जहाँ पर रोड कभी पूरी बन नहीं पाती, पुल टूटे ही पढे रहते है, ५० प्रतिशत जनता के लिए अच्छे अस्पताल और विद्यालय नहीं है. जहाँ आज भी लोग हर साल हर कोने में भूख से आत्महत्या कर रहे है और फिर भी वोट डाले जा रहे है उन निकम्मे लोगो को जो सिर्फ देश सेवा और जन सेवा के नाम पर परिवार सेवा को ही अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते है और जिन्होंने इमानदारी और देश प्रगति की बातो को सिर्फ फाइलो की सुन्दरता का अभिप्राय बना रखा है.
जय हिंद को हमने नारा तो बना दिया पर जीवन का सिद्धांत बनाना भूल गए. 'नर हो न निराश करो मन को' के भरोसे हम जैसे लोग भी बस गाली देते रहते है और सर्कस देखते रहते है, करते कुछ नहीं. एक साक्षात्कार में हमारे राजदीप सरदेसाई जी बोलते है कि "जिस दिन कही विस्फोट हो जाए और आप उस शहर में तो इससे बड़ा दिन पत्रकार के लिए कुछ नहीं" ...कैसी मानसिकता है ये ?
चलो इस लेख में इतना ही , आगे के लेख में जर्मनी के Dusseldorf शहर में बिताये सप्ताहांत के बारे में कुछ लिखूंगा !
- राम
रविवार, 3 मई 2009
फिर से चुनाव ....हर साल का नाटक !!
जो पूंजीवाद अमेरिका को गर्त में ले जाने का जिम्मेदार है, वही अब हम भारतीयों की नसों में आता जा रहा है। हर कोई पैसे के लिए पागल है, रिश्ते गए तेल लेने, अब तो लोगो को आर्थिक सम्रद्धि चाहिए किसी भी कीमत पर। मुलायम और मायावती जैसे समाजवादी विचारधारा के लोग भी पूंजीवाद के सहारे राजनीती के शिखर पर किसी भी कीमत पर जाना चाहते है। राजनीती के सारे शीर्ष लोग स्वार्थी, लालची और कुर्सी के लिए पागल है, सबने सिद्धांतो को बेच खाया। ईमानदार लोग चुनाव में आते नही, आते भी है तो केवल शोहरत लेने के लिए, और जो वास्तव में आते है उनको हतोत्साहित कर दिया जाता है। कुछ राजकुमार जिनको राजनीती विरासत में मिली है जैसे हमारे ग्वालियर के सिंधिया और पायलट , या फिर राहुल , कोई भी इमानदारी से प्रयास नही कर रहा, हम जैसे ब्लॉगर भी यही बस भड़ास निकालते रहते है।
भारत में लोकतंत्र के सारे स्तंभ बहुत ही विशाल है, पर ये किसी काम के है, नही लगता । विशाल तो है पर मजबूत नही। सफाई कि बहुत जरूरत है, जंग को हटाना पड़ेगा तभी ये स्तम्भ ज्यादा दिनों तक मजबूत रह सकेंगे।
राम त्यागी - जर्मनी के दुस्सेलदोर्फ़ शहर से।
शनिवार, 24 जनवरी 2009
कभी बीबी भी बेटी थी !!

जी हाँ में जब भी अपनी बीबी को देखता हूँ यही सवाल आता है और प्यार उमड़ पड़ता है. चलो आज बालिका दिवस भी है तो कुछ बीबी की तारीफ ही कर देता हूँ , नही तो खटपट से ही फुरसत कहाँ मिलती है. शादी को कुछ साल जो गए है तो हम भी दुनियादारी से कहाँ बच पायेंगे. चिकागो की -४०' सेन्टीग्रेड की ठण्ड बोलो या कोई फ्लू, पिछले २-३ सप्ताह से कोई न कोई बीमार चल रहा है घर में, ऐसे में रात दिन लगे रहने का , लगातार बच्चो की कोयं कोयं और मेरी नौकरी की धोयं धोयं में मेरी पत्नी ने जो साहस और घर को चलाने का काम किया है वोह काबिले तारीफ है. इंडिया भी हम इस महीने के अंत में आ रहे है तो पैकिंग और लोगो के लिए कुछ लाने देने का काम भी जोर शोर से चल रहा है और में ब्लॉग भी एक्टिव रूप से लिख रहा हूँ, इसे में भी रोज डिनर में बड़े बड़े पकवान खाने को मिल रहे है, कल की ही लीजिये ..४ महीने का बच्चा गोद से नही उतर रहा सर्दी और जुक्कम की वजह से , ५ साल वाला अपनी डिमांड पूरी कराना चाहता है और फिर मेरे को गाड़ी से स्टेशन छोड़ना, लेने आना, बड़े लडके को स्कूल छोड़ कर आना और लेकर आना और ऊपर से छोटू का कोयं कोयं ...फिर भी कल दाल बाटी का मजे लेने को मिला और मेने क्या किया ....न्यूज़ सुनना और मस्ती से सोफे पर पड़े रहना ...और इसी व्यस्त दिनचर्या में आज भी पाव भाजी मिली , उससे पहले दिन छोला बटुरा ....आज के दिन तहे दिल से इस महान बीवी की धन्यवाद देता हूँ जो हमेशा अपने चहरे पर मुस्कराहट ही रखती है.
कोई विभीषण बनाकर इस लेख को उस तक भेज ना देना, नही तो ये सब सार्वजानिक कराने के एवज में हो सकता है फिर कभी एसा treatment ना मिले !!
अच्छे काम की शुरुआत घर से ही करनी चाहिए इसलिए आज सबसे पहले गृहलक्ष्मी की बड़ाई की , वैसे इस बालिका दिवस ("http://economictimes.indiatimes.com/ET_Cetera/National_Girl_Child_day_on_Jan_24/articleshow/3942980.cms" ) पर चलो प्रण करें की जैसे भी हो भ्रूण हत्या को रोकेंगे, दहेज़ से दूर रहेंगे और संजय दत्त की तरह लड़की को कभी उपनाम के लिए कोई शर्त नही रखेंगे. जब हमारा दूसरा बच्चा होने वाला था, हमारी हार्दिक इच्छा थी की लड़की हो और हुआ लड़का ...मतलब में जानता हूँ की लड़की न होना कितना बुरा लगता है......all in all लड़का हो लड़की ..दोनों एक ही जैसे होते है ....
पर भारत में अभी आकंडे कुछ और ही कहते है ...http://www.ndtv.com/convergence/ndtv/story.aspx?id=NEWEN20090080219&ch=1/17/2009201:04:00%20AM .
इस लिक को अगर पढ़ा जाए तो पता चलेगा की २००८ में
- ४५ प्रतिशत लड़कियाँ १८ साल की होने से पहले ही शादी करने के लिए मजबूर थी
- ७८,००० औरतें बच्चा पैदा होने के समय मर गयीं क्यूंकि या तो शारीरिक रूप से तैयार नही थी या फिर भोजन की कमी थी
- १००0,००० नवजात शिशु हर साल मर जाते है उनमें से ४० % पैदा होने के पहले सप्ताह में ही .
- और ना जाने कितनी हत्याए पैदा होने से पहले ही जो रिकॉर्ड में भी नही आ पाती
ये आंकड़े दर्शाते है की हमें जाग्रत होना पड़ेगा !!!