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गुरुवार, 4 नवंबर 2010

घर घर दीप जले - चहुँ और खुशी फैले

 

प्रिय मित्रों और पाठको,

दीपावली - दीपों की श्रंखला से सजी, रोशनी से जगमग, प्रकाशमय महापर्व भारतीय संस्कृति का विश्व में ध्वजवाहक है, ये केवल एक पर्व नहीं, ये तो हमारी उर्जा को नवस्फूर्ति से संजोने वाला एक प्रतीक है !  जब बात भावों से जुडी हो तो शब्द भी कभी कभी व्याख्या के लिए कम पड़ जाते हैं, दिवाली भी एक ऐसा पर्व है जो बचपन से लेकर अब तक हर वर्ष खुशियों का, आनन्द का, सपनों का और सम्रद्धता का सन्देश हमें देता आया है !  

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बुराई पर अच्छाई की विजय, असत्य पर सत्य की मेधा और अन्धकार पर प्रकाश की ये बेला विश्व में भारतीय सूर्य की चमक है !  जब घरों की और दिलों की सफाई कर हर आँगन को हम नया नवेला बनाने के लिए उत्सुक रहते हैं, आर्थिक, सामाजिक प्रगति के सोपानो को संजोते, अभिलाषा के दीप जला हम असाध्य और असंभव को भी कर्म से पा लेने की द्रढता का वचन लेते हैं - उस पल को ही दिवाली कहते हैं, अहंकार , क्रोध और आलस्य पर विजय को रोशनी देने वाला ये महापर्व  जैसे सारे  अच्छे, महान और सार्थक उद्देश्यों का महासंगम हो !

कितनी यादें हैं इस पर्व के साथ, हर वर्ष कुछ न कुछ सकारात्मक ही हम जोडते हैं ! बचपन में पूरे घर की पुताई, कलई और चूने का गलाना और फिर पुताई के बाद हाथो का फटना कौन भूल सकता है, फिर जब लिपे पुते आँगन और दीवारे परिणाम के रूप में दिखतीं थी तो मन प्रप्फुल्लित हो उठता था, कुछ रुपयों के पटाखे – चकरी, राम बाण,  नाग, सुतली बम और पता नहीं क्या क्या ….रात में परिवार के साथ लक्ष्मी की मूर्ति दीवार पर काढ कर कुछ तेल के और कुछ घी के दिए जलाना और फिर पड़ोसियों, स्वजनों का लक्ष्मी पूजन के बाद हमारे घर पर दिए रखने आना और हमारा उनके घर सूप में दिए रखकर ले जाकर उनके घर रखना जैसे एक दूसरे की सम्रद्धि के लिए , सामंजस्य के लिए और समग्रता के लिए, सामजिक एकता के लिए बुने हुए स्तंभ हों जिस पर समाज नाम का ढांचा टिका है !  एक दिन बाद सारे परिवार जन का एक साथ मिलकर गोवर्धन परिक्रमा का क्रम एकसूत्र में बंधने के प्रेरणा देता है !   जगमग रौशनी से घर सब कुछ प्रकाशमय बना देते थे, बिजली नहीं तो दीप श्रंखला ही अन्धकार को प्रकाश में बदलने के लिए पर्याप्त थी !

अब शिकागो में दशहरे से ही घर को सजा दिया गया है, पहले तो स्कूल की छुट्टियाँ भी दशहरे से दिवाली तक हो जाती थी, पर शायद धीरे धीरे वो क्रम अब बंद हो गया है !  दिवाली की छुट्टियों में शहर से घर जाने का आनन्द अविस्मरणीय है !

कल ग्वालियर में भाई बाईक से फिसल गया तो उसके हाथ में गहरी चोट आई, वो भी दायें हाथ में, उसके CAT परीक्षा से कुछ ही दिन पहले ऐसा होना उसके लिए बहुत दर्द देने वाला है, शायद हाथ के दर्द से भी ज्यादा, पर आशा है कि दिवाली का प्रकाश जब अमावश्या को भी पूनम बना देता है तो वो अवश्य ही उसको भी नयी प्रेरणा और शक्ति देकर  आने वाले रास्ते के लिए उसे आत्मविश्वास देगा !  इस दिवाली के अवसर पर यहाँ शिकागो के ही एक मंदिर में निकुंज का एक मंच पर कार्यक्रम है, कुछ और नयी सुखद यादें जो संजोना है इस दिवाली पर !!

मैंने फेसबुक पर किसी के स्टेटस पर पढ़ा था :

“आई दीवाली फिर इक बार, हो जाओ सब तैयार
सबको हर बार देते हैं,इस बार खुद को दो उपहार”

नारायणांशो भगवान् स्वयं धन्वन्तरिर्ममहान्। पुरा समुंद्रमथने समत्तस्थौ महोदधेः।।  सर्व वेदेषु निष्णातो मंत्र तंत्र विशारदः। शिष्यो हि बैनतेयस्य शंकरस्योपशिष्यक।।

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आप सभी को ये प्रकाशमय महापर्व सम्रद्धि, संतुष्टि, आत्मविश्वाश और खुशियों का खजाना दे ! मेरी हार्दिक शुभकामनायें आप सभी दोस्तों और पाठकों के साथ हैं !

सादर,

राम त्यागी

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