हिंदी - हमारी मातृ-भाषा, हमारी पहचान

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए अपना योगदान दें ! ये हमारे अस्तित्व की प्रतीक और हमारी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है !

रविवार, 15 अगस्त 2010

कुछ दिन न्यूयार्क में …

 

६४ वें स्वतंत्रता दिवस पर सभी देशवाशियों को बहुत बहुत शुभकामनायें !!untitled आजादी शब्द ही ऊर्जा के तारों को झंकृत कर देता है, इसलिए भले ही देश में आजादी के बाद हजारों कमियाँ हों, पर आज का दिन विशेष महत्व रखता है और हम सबको एक जिम्मेदारी और स्वावलम्बन की अनुभूति देता रहता है !! तिरंगे को देख, बचपन में गाये राष्ट्र गीतों की स्मृति और राष्ट्रगान की तेजस्विता , और शहीदों की प्रेरणा मुझे देश के लिए , मात्रभूमि के लिए आत्मविश्लेषण करने के लिए प्रोत्साहित करती रहती है !! 

एक मित्र हैं भवदीप जी, जो ब्लॉग के नियमित पाठक है, उनके कहने पर इस शहर के बारे में कुछ दिन तक लिखूंगा। कौन नहीं जानता इस शहर के बारे में, बची हुई कसर हमारी फिल्में कर देती हैं, करन जौहर को तो जैसे भारत में कोई शहर ही फिल्माने को नहीं दिखता, घूम फिरकर उनकी बनावटी फिल्में इस शहर को जरूर दिखाती हैं।

खैर, मुझे भी कुछ दिन बेमन से इस शहर में बिताने हैं, पता नहीं क्यूँ बड़े शहर मुझे ज्यादा आकर्षित नहीं करते, छोटी जगह पर ही ज्यादा सुकून मिलता है -

बड़े शहरों की चौड़ी सडकें

भीड़ से भरी भरी

चल नहीं सकता घुटन से  …

छोटे शहरों की सकरी गलियाँ, 

जैसे खाली हों मेरे रास्ते,

मैं तय तो कर सकता हूँ …

ये मेरी न्यूयोर्क की कोई २०-२५ वीं यात्रा होगी, पर हर बार शुरुआत करनी पड़ती है नक़्शे और ट्रेन की ना समझ आने वाली मैट्रिक्सनुमा रास्तों से।  हर जगह भीड़, हर जगह भागमभाग और चारो और खत्म न होने वाली सडको और गगनचुम्बी इमारतों की श्रंखला! कोई भी समय हो, रास्ते भरे ही दिखते हैं, भिन्न भिन्न रंग और देश के लोग बस अर्थ और कर्म के योग में जैसे संलग्न हो अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह की गलियों में घूम रहे हों, पर ज्यादातर लोग रास्ता देखते देखते बस इन गलियों के अभ्यस्त हो जाते हैं और फिर इस चक्रव्यूह से बाहर आने का अपना उद्देश्य भूल यहीं के होकर रह जाते हैं।   कारन जोहर को ही दिखता ये ये शहर अलग, मुझे तो दिल्ली और मुम्बई कि तरह बस भीड़नुमा और बेबस ही दिखा …nyse

वाल स्ट्रीट - जहाँ से दुनिया भर की अर्थव्यवस्था रुपी महासंग्राम का अर्जुन अपने रथ में विवश किन्तु दृढ खडा है, और तमाम उलझनों, चढावों और उतारों से निकलकर भी चलायमान है अपने कर्म क्षेत्र में आगे बढ़ने की ललक और आशा के साथ !! कितनी विभिन्नता है, आज भी ५ डॉलर में आप लंच करके संतृप्त हो सकते हैं रेडी वाले ठेले से खाकर और दूसरी और क्रेडिट कार्ड भी कम पड़ जाए हलके से पेट को भरने में।  ऊँची ऊँची अट्टालिकाओं के बीच खड़े ये ठेले वाले ९० प्रतिशत लोगो का पेट आज भी यहाँ भरते हैं !  thela

ये यात्रा और वृतांत जारी रहेंगे आने वाले कुछ दिनों तक (और शायद चिंतन भी !)  …. इस सबसे दूर बच्चे भी गर्मी का लुत्फ उठा रहे हैं -

pool

19 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ.

संजय भास्कर ने कहा…

Ram bhaiya lagta hai aap bhool gaye sanjay bhaskar ko...

संजय भास्कर ने कहा…

ब्लॉग को पढने और सराह कर उत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया.

Udan Tashtari ने कहा…

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आप एवं आपके परिवार का हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ.

ललित शर्मा-للت شرما ने कहा…

राम जी, राम राम

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई

"दिल्ली का भी यही हाल है। आपको 10 रुपए में भी भरपेट खाना मिल जाएगा और थोड़े से नास्ते के लिए क्रेडिट कार्ड भी कम पड़ जाएगा।

आर्थिक विषमताएं चरम सीमा पर हैं।

एक तरफ़ एक रोटी के लिए तरसता है आदमी
देखो एक तरफ़ आदमी को ही खा रहा है आदमी
आर्थिक विषमताएं इस कदर बढ गयी है आखिर
कुत्ते-कुत्ते से से भी बदतर हो गया है आदमी

राम त्यागी ने कहा…

संजय - बहुत धन्यवाद और मांफी चाहता हूँ के आपके ब्लॉग को व्यस्तता की वजह से सक्रिय रूप से नहीं पढ़ पा रहा हूँ !

ललित जी, बहुत बढ़िया संदर्भित पक्तियाँ बयाँ की हैं आपने, पता नहीं लोग न्यू योर्क को क्यों सर आँखों पर बिठाते हैं , अव्यवस्था और विषमता के मामले में यह भी दिल्ली जैसा ही है ...हर जगह सुधार की जरूरत महसूस होती है !! लोगो को अपने देश को गाली देने की आदत पड़ गयी है और कुछ नेताओं ने आम लोगो की सकारात्मक सोच पर जैसे अंकुश सा ही लगा दिया है !!

abhi ने कहा…

बड़े शहरों की चौड़ी सडकें
भीड़ से भरी भरी
चल नहीं सकता घुटन से …
छोटे शहरों की सकरी गलियाँ,
जैसे खाली हों मेरे रास्ते,
मैं तय तो कर सकता हूँ

--जबरदस्त लिखा है भाई आपने...अपनी भी सोच कुछ ऐसी ही है, छोटे शहरों से ज्यादा लगाव है.

ओर बाकी ललित जी की टिपण्णी ओर आपकी टिपण्णी से पूर्ण सहमत.

चलिए अब अगले पोस्ट का इंतज़ार रहेगा :)

भवदीप सिंह ने कहा…

स्वंत्रता दिवस की बहुत बहुत बधाइयाँ. जिन शहीदों की क़ुरबानी से आज ये दिन हमें नसीब हुआ है. उन्हें शत शत प्रणाम. "I Salute you Sirs "

चिकागो में तो बहुत जोर शोर से मनाया गया भारत का स्वंत्रता दिवस. नापेर्विल्ले में झंडा फहराया गया. पड़ोस के एक गिरजाघर (word of life ) में तो बाकायदा लघु-मेला लगा भारत के बड़े से झंडे के साथ ! चिकागो downtown के मध्य में बहुत बड़ा सा झंडा फहराया गया आज. काफी गर्व होता है ये सब देख कर.

पर जहाँ हम जोर शोर से अपनी जनम भूमि की आजादी को मन रहे हैं. वहीँ हमें अपनी करम भूमि (USA ) को भी उतना ही मान देना चाहिए. देखा जाये तो हम USA में कितने शान से भारत की स्वंत्रता मन रहे हैं. कोई कुछ नहीं बोलेगा. पूरा अधिकार है हमें ऐसा करने का. तो भाई ऐसी आजादी और किस राष्ट्र में मिलेगी? तो जहाँ एक तरफ में कहूँगा "जय हिंद". वहीँ साथ में ये भी कहूँगा के "God Bless America "

शहरयार ने कहा…

स्वतंत्रता दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनायें!

मेरा ब्लॉग
खूबसूरत, लेकिन पराई युवती को निहारने से बचें
http://iamsheheryar.blogspot.com/2010/08/blog-post_16.html

Arvind Mishra ने कहा…

यात्रा वृत्तांत की नींव मजबूत है -

सत्यप्रकाश पाण्डेय ने कहा…

atyant sundar.

शोभना चौरे ने कहा…

त्यागीजी आपने बिलकुल सही कहा है पता नहीं क्यों ?करन जौहर क्यों बनावटीपन में जीने की रह दिखाते है ?आज लगभग भारत के भी बड़े शहरों में भी यही हाल है मुंबई में भी १० रूपये में वडा पाव कहा सकते है और वाही बर्गर बन जाता है क्रेडिट कार्ड के जरिये \छोटे शहरों की अलग रौनक है अगर समय मिले तो पढियेगा |http://shobhanaonline.blogspot.com/ पर "तुलसी जयंती "

राज भाटिय़ा ने कहा…

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

"ऊँची ऊँची अट्टालिकाओं के बीच खड़े ये ठेले वाले ९० प्रतिशत लोगो का पेट आज भी यहाँ भरते हैं ! "
तब तो बैंकाक व चिन्नई जैसा ही हुआ ये...

राजभाषा हिंदी ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति!


“कोई देश विदेशी भाषा के द्वारा न तो उन्नति कर सकता है और ना ही राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति।”

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अथ न्यूयार्कम् कथा।

राज भाटिय़ा ने कहा…

जनाब आप के साथ साथ हम ने भी न्युयार्क देख लिया, वेसे सच कहुं तो मुझे मजा नही आता बडे बडे शहर देख कर, लोगो की भागदोड जेसे सब ने आपस मै रेस लगा रखी हो, लेकिन एक दो दिन तोफ़िर भी घुमा जा सकता है,आप की कथा बहुत सुंदर ओर प्यारी लगी. धन्यवाद

सतीश सक्सेना ने कहा…

बहुत सजीव वर्णन करते हो आप !

आप अपने देश के बाहर रहते हुए उस देश की बारीकियों को अपनी आँखों से समझ, बता रहे हैं !

इस प्रकार के लेखों को मैं सामान्य नहीं बल्कि महत्वपूर्ण दस्तावेज मानता हूँ हालांकि चलन में कम ही हैं ! आज भी हमारे देश में ह्वेनसांग का विवरण सही माना जाता है और वे वाकई सम्मानित हैं जिन्होंने हमारी स्मृतियाँ संजो कर रखीं ! इसे बरकरार रखियेगा !

शुभकामनायें !

शिवम् मिश्रा ने कहा…

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !