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सोमवार, 2 अगस्त 2010

मौत जैसे दरवाजे पर दस्तक दे रही हो …

 

अभी कल या परसों दोस्ती दिवस था, वैसे तो आजकल हर एक चीज का दिवस हो गया है, लगता है कि कोई दिन खाली छोड़ा ही नहीं हो;  पर कहीं न कहीं ये दिन सूचना तकनीक के जरिये आपको एक अहसास सा दे जाते हैं कि उठो प्यारे और देखो आपने क्या खोया और क्या पाया ?

रोजमर्रा के व्यस्त जीवन में कितनी अहम बातों को नजरअंदाज कर देते हैं , फिर एक दिन पता चला कि जीवन का बहुतेरा हिस्सा तो बीत भी गया और मैंने क्या किया ?  मौत जैसे सिरहाने खड़ी आपको ताने दे रही हो उन अनमोल पलों के बारे में जिन्हें आप और खुशनुमा और प्रेरक बना सकते थे।  क्यूं न मान लें कि मौत कभी भी आ सकती है और हर पल को ऐसे जियो कि बस यही दिन हो जीने के लिए।

काम, क्रोध, लोभ और स्वार्थ से घिरे हमारे मन को शायद मौत का ध्यान ही नहीं रहता और इसलिए कभी कभी दोस्त जैसे अनमोल उपहार का उपहास बना हम अपने आप को एकाकी बना डालते हैं,  मित्र बिना जीवन जैसे यांत्रिक उपकरण बन कर रह जाता है और हम चलायमान रहते हैं नीरस भाव से ….शायद मौत भी आपका उपहास ना उडाये अगर सच्चे मित्रों का साथ हो।  किसी ने ठीक ही कहा है -

“Life can give us number of beautiful Friends"But"Only True friend can give us beautiful Life"

near-death-experience-1 मौत एक कडवी सच्चाई है जो डर से ही सही, हमें जीवन का दर्शन सिखा जाती है और हम आत्मविश्लेषण करने पर मजबूर हो जाते हैं कि क्या हम उस दिशा में आगे जा रहे हैं जो हमारे उद्देश्यों की राह थी, क्या जीवन जीना सिर्फ स्वार्थ लाभ के लिए ही सार्थक है,  क्या हमारी सोच और वृहत नहीं होना चाहिए थी , क्या अनमोल मानव जीवन के कई वर्ष हमने यूं ही निकाल दिए ??? 

एक कलाकार को कम से कम कुछ तो संतुष्टि मिलती होगी अपनी कला के क्रियान्वयन से - जब वो सिरहाने खड़ी मौत से रूबर हो रहा है। फिर तर्क का झोंका झकझोरता है कि कला तो हर प्राणी में सन्निहित है, बस उसको खोजने वाली बात हैं !  फिर समय की कमी, मजबूरियां आदि आदि के बहाने से मैं कहता हूँ कि अपने अंदर के कलाकार को खोजने का समय ही कब था। सच तो यह है कि विकारों से घिरे मन को हर समय क्षणिक उद्देश्य ही दिखाई दिए - पहले लक्ष्य कक्षा में अव्वल आना और फिर जल्दी से नौकरी पाना, या फिर विदेश की झलक पाना - हर चीज क्षणिक।  मिली भी ये सब चीजें क्यूंकि हमारा प्रयास ही इस और था, शायद द्रष्टिकोण कभी दूरदर्शी नहीं रहा और बस चूहों कि दौड में ऐसे फँसे कि भूल भुल्लैयाँ के चक्रव्यूह में घूमते घूमते जब मौत सामने आई तब याद आया कि ये क्या हुआ - हमने तो जीवन का रस ही कहीं छोड़ दिया। 

मौत की सच्चाई को एक बार सामने से देखा है जब बाबा (दादाजी) को अंतिम साँसे लेते देखा और फिर हम लोग जो उनकी उंगली के सहारे चलना सीखे और जिनके बिना परिवार को एकसूत्र में आगे ले जाने का भाव सपनों में भी डरा देता था, उन लोगों ने उनके शरीर को लकडियों के बीच रख अग्नि के हवाले कर दिया, एक दिन भी घर में उस शरीर को नहीं झेल पाये, अश्रु तो छलक रहे थे पर हम कितने कठोर हो गए थे कि चिता को कुरेद कुरेद कर क्रमशः हर अंग को पूरी तरह नष्ट करने पर आमादा थे।  जाने से पहले उनके तेजस्वी चेहरे पर स्वाभिमान और संतुष्टि के भाव झलक रहे थे - उन भावों ने उनको ही तृप्त नहीं किया बल्कि हम जैसे नवांकुरों को भी नए सोपान तय करने की उर्जा से भर दिया था।  पर क्या हम उस ऊर्जा को सतत रख पाये उस दिशा में जहाँ मृग मरीचिका की तरह हम काल्पनिक सोपानों में न डूबे हों ….

MFSchedulerICon एक और पहलू देखते हैं - हम कुछ देर के स्वाद के लिए क्या कुछ नहीं खा जाते, और उस समय यही सोचते हैं कि इतने सा खाने से क्या होगा,  लेकिन जब डाक्टर परीक्षण करता है तो पता चलता है कि हमने शरीर पर ध्यान ही नहीं दिया,  तब तक बहुत देर हो चुकी होती है, उसके बाद फिर हम सोचते हैं कि चलो २-४ दिन कुछ ध्यान रखते हैं फिर उसी ढर्रे पर आ जाते हैं और जब मौत सिरहाने खड़े होकर हमें उलाहने दे रही होती है तो हम बीते समय को फिर से ना पाकर सिहर उठते हैं , शायद यही व्यवाहारिक द्रष्टिकोण हमें शरीर के आलावा हमें हमारे कर्मों में भी उत्कृष्टता नहीं लाने देता।

चलो सोचते हैं कि मौत सिरहाने खड़ी है और हम कितने अंदर आ बाहर है संतुष्टि के पैमाने पर - शायद सच्चे दोस्त इस बात का अहसास पल पल दिलाते रहते हैं पर दोस्तों की सुनते हैं क्या हम ??

26 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बड़ी दार्शनिक पोस्ट हो चली...तबीयत सही है न भाई..

है विचारणीय.

रवि कान्त शर्मा ने कहा…

हम जिसे मृत्यु समझते हैं,
वह तो शरीर का परिवर्तन है।
वास्तविक मृत्यु तो उसे कहते हैं,
जिसे प्राप्त करके
किसी माँ के गर्भ में न जाना पड़े।

राम त्यागी ने कहा…

@समीर जी, शायद कनाडा को मिस कर रहा हूँ :-) तबियत बढ़िया है ...इसलिए ही ऐसी अच्छी बातें सोच पा रहा हूँ ....

@रवि जी, आशय यहाँ शरीर छोडने से पहले कैसे हम गंभीर हो सकते हैं अपने कृत्यों के प्रति है ...

वाणी गीत ने कहा…

कहते हैं कि मंदिर और शमशान में जो भाव होते हैं मनुष्यों के ...वे अगर स्थाई हो जाएँ तो यह धरा स्वर्ग हो जाए ...मगर ऐसा होता नहीं है ...आजकल तो शमशान में भी लोंग यह सोच कर जाते हैं कि हमें कौन सा यहाँ आना है ...

बहुत अच्छी पोस्ट ...!

शिवम् मिश्रा ने कहा…

विचारणीय !

राज भाटिय़ा ने कहा…

अगर हम हमेशा याद रखे कि हम ने एक दिन जाना है किसी भी समय बस कभी भी, किसी भी पल ओर अपने संग कुछ नही जायेगा तो दुनिया जरुर सुधर जायेगी....
बहुत ही अच्छा लेख लिखा. धन्यवाद

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मृत्यु अन्तिम लक्ष्य है और यदि लक्ष्य ही सब समाप्त हो जाना है तो राह या कहें कि जीवन अधिक महत्वपूर्ण अपने आप ही हो जाता है।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…


त्यागी जी, आपकी पोस्ट पढ कर हम भी सन्नाटे जैसी स्थिति में आ गये हैं। समझ में नहीं आ रहा कि क्या कहें?

…………..
अद्भुत रहस्य: स्टोनहेंज।
चेल्सी की शादी में गिरिजेश भाई के न पहुँच पाने का दु:ख..।

वन्दना ने कहा…

zindagii ki sachchayi.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

अभी से ऐसी बातें क्यों करते हो भाई ?
अभी तो कर्म करने का समय है ।
बहुत कुछ किया जा सकता है ।

भवदीप सिंह ने कहा…

कभी शुन्य की बात करते हो. कभी शुन्य में समां जाने की बात करते हो.

राम त्यागी ने कहा…

@वाणी गीत, बिलकुल सही कहा, स्वार्थ हावी है हर ओर !! दिखावा ज्यादा है !!

@शिवम - करो विचार जल्दी से और लग जाओ शार्थक उद्देश्य की ओर

@राज जी, दुनिया सुधर जायेगी तो फिर क्या कहने - पर क्या धूप के बिना छाँव में सुस्ताने का मजा है - इसलिए सम्पूर्ण सुधार का होना तो संभव नहीं लगता

राम त्यागी ने कहा…

@प्रवीण जी, उस अंतिम लक्ष्य तक आते आते कहीं पीछे देखने पर पश्चाताप ना हो , यही सोचकर चलना होगा ,आपकी बात से सहमत हूँ शत प्रतिशत !!

@जाकिर जी, सन्नाटे में आ गए हैं तो बस अन्तर्मन में झांके और लग जायें स्प्रिंट में !!

@भवदीप, और दराल जी , मेरा कहने का आशय है कि अगर ऐसा सोच ले और फिर अपने उद्देश्य निश्चित करें तो कुछ हद तक हम विकारयुक्त होकर कुछ शार्थक पाने कि दिशा में काम कर सकते हैं

धन्यवाद वन्दना जी और आप सभी का !!

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

दस्तक देती मौत को, रोक सका नही कोय।
ऐसी धरती है कहाँ, मौत जहाँ नही होय।।
--
http://charchamanch.blogspot.com/2010/08/235.html

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

२-४ दिन कुछ ध्यान रखते हैं फिर उसी ढर्रे पर आ जाते हैं
सत्य वचन!

शिवम् मिश्रा ने कहा…

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

सत्यप्रकाश पाण्डेय ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति,
आभार...

राम त्यागी ने कहा…

@शाश्त्री जी, बहुत ही सही बात कही है आपने, बस अब इसे जीवन में ढालना है !!

@सत्यप्रकाश जी - धन्यवाद

@अनुराग जी, बहुत दिन बाद दिखे हो आज :)

@शिवम भाई - बहुत बहुत शुक्रिया कि आपने इस लायक समझा ..

राम त्यागी ने कहा…

@राजभाषा जी - चलो हिंदी को बनाएँ राष्ट्र की भी भाषा !!

सतीश सक्सेना ने कहा…

बढ़िया विचार करने लायक एक गंभीर पोस्ट मगर खराब शीर्षक ! जीवन के आगे पीछे का न जानने वाले हम लोगों को जीवन का सम्मान करना सीखना चाहिए ! निराशा जनक भाव कई बार ऐसी स्थितियां लाते हैं मगर हंसों और आगे चल दो ....
शुभकामनाये राम !!

राम त्यागी ने कहा…

सतीश जी, शीर्षक पोस्ट के हिसाब से ही है और ये निराशा जनक स्थिति में नहीं लिखा गया बल्कि पूरी सकारात्मक सोच के साथ लिखा गया था, कैसे जीवन में हम आलस्य , लचरपन और अन्य विकारों से दूर होकर परिश्रम और संयम के साथ जीवन जी सकते हैं जो हमें अंदर से संतुष्टि दे सके - यही कोशिश थी - अगर ऐसा नहीं हैं तो मेरी अभिव्यक्ति में कहीं न कहीं कमी रह गयी होगी !!

JHAROKHA ने कहा…

yah to hamare sansakaron me shamil haiki hame majburan aisa karna padta hai varna ye kitani ajeeb baat hai ki jo insaan hame pranon se bhi priy raha ho uske mout ke baad vah ek laash ban jaata hai .fir ye hota ki jaldi se jaldi ghar se bahar nikaal kar uska daah sanskar karne ki koshish me lag jaate hai yah ek dardnaak sthiti hoti hai jab uski upasthiti ka ahsaas se hi ham darne lag jaate hain .par ye bhi ek parampara hai jisko nibhana hi padta hai.
poonam

भवदीप सिंह ने कहा…

पूनमजी, परम्पराएँ सयानो ने कुछ सोच समझ कर ही बनाई होती हैं. ये अलग बात है के समय से साथ साथ हम परंपरा तो रख लेते हैं, पर परंपरा के महत्व और कारण को भुला देते हैं. फिर वो परम्पराएँ अन्धविश्वास भी कहलाने लगती हैं. साथ ही साथ नयी पीड़ी को बोझ और बेतुकी भी लगने लगती हैं.

विषय से हट कर बात करने का फायदा नहीं. पर जो बात अपने छेड़ी उसका बहुत ही वैज्ञानिक कारन है. बड़े बुजुर्गो से पूछिए या फिर गूगल अंकल से पूछ लीजियेगा.

संजय भास्कर ने कहा…

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

राम त्यागी ने कहा…

भवदीप - पूनम जी ने भावनात्मक संवेदना व्यक्त की है और तुमने वैज्ञानिक पक्ष रखा है ....

आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद - ये लेख दैनिक जागरण में भी छापा है -

http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2010-08-05&pageno=9#