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रविवार, 5 दिसम्बर 2010

वर्तमान समय में नैतिक मूल्यों की आवश्यकता

यह पोस्ट मेरे पिताजी की अतिथीय पोस्ट है !

आज प्रतिदिन देखने में, सुनने में, समाचार पत्रों में पढने से यह अनुभव हो रहा है कि आज मंत्री से लेकर IAS अधिकारी भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं,  भ्रष्टाचार के कारण संसद नहीं चल पा रही है. अभी दूरसंचार मंत्रालय में अरबों रुपये के घोटाले का पता चला है जो एक वर्ष का रक्षा बजट होता था.  अभी कुछ माह पहले अरविन्द जोशी दम्पत्ति के यहाँ घर पर करोड़ों रुपये बिस्तर में छिपे पाए गए ! कारण स्पष्ट है कि भौतिकता की चकाचौंध में नैतिक मूल्यों में गिरावट आती जा रही है.

लालबहादुर शास्त्री, अटल जी ऐसे नेता थे जो नैतिक मूल्यों को महत्व देते थे आज अन्तरात्मा की आवाज न सुनकर केवल भौतिक सुविधाओं की ओर ध्यान दिया जा रहा है.

हर खाद्य पदार्थ जैसे बेसन, दाल, मिर्च, घी, खोया, तेल में मिलावट ही आ रही है. व्यापारी वर्ग अत्यधिक मुनाफे के प्रलोभन में नैतिक मूल्यों को तिलांजलि दे रहा है.

आज नैतिक मूल्यों के अभाव में परिवार टूट रहे हैं, अपने स्वयं के बच्चे, पत्नी के अलावा अन्य सदस्यों पर ध्यान न दिया जा रहा है. पहले नैतिक मूल्यों के कारण संयुक्त परिवार में सभी परिवार के सदस्य इकट्ठे रहते थे.

आध्यात्मिकता का अर्थ किसी विशेष सम्प्रदाय से नहीं है, आध्यात्मिकता का अर्थ है अपनी अन्तरात्मा की आवाज के अनुसार कर्त्तव्य पालन करना !  गांधीजी ने जीवन भर नैतिक मूल्यों को अपने जीवन में स्थान दिया, वे हर कार्य अपनी अंतरात्मा की आवाज (नैतिक मूल्यों) के अनुसार करते थे. 

यदि जीवन में उच्च आदर्शों, नैतिक मूल्यों को महत्व दिया जाय तो परिवार से लेकर समाज एवं समाज से लेकर राष्ट्र हर क्षेत्र में चहुँमुखी विकास कर सकता है. आज न्यायालय भी नैतिक मूल्यों के अभाव में सही निर्णय देने में असमर्थ होते जा रहे हैं.

नैतिक मूल्यों के अभाव के कारण व्यक्ति के चरित्र में गिरावट आती जा रही है, आज अपराधों का ग्राफ हर वर्ष बढता जा रहा है. चोरी, डकैती, बलात्कार, हत्याएं इसलिए हो रही हैं कि व्यक्ति स्वयं के जीवन में उच्च आदर्शों, नैतिक मूल्यों को जीवन में स्थान न दे पा रहा है.    इसलिए बच्चों को आज अच्छे संस्कारों की नितान्त आवश्यकता है, हम अपने चरित्र से, व्यवहार से बच्चों के सामने नैतिक मूल्यों के उदाहरण प्रस्तुत करें.

आज के बच्चे ही कल के भविष्य हैं, अतः शिक्षा के साथ साथ नैतिक मूल्यों को जीवन में स्थान दें, हम हर कार्य अपनी अंतरात्मा एवं उच्च आदर्शों को ध्यान में रखकर करें.  परिवार बच्चों की प्रथम पाठशाला है अतः हर माता पिता को स्वयं का आचरण शुद्ध सरल-पवित्र, मर्यादापूर्ण रखना चाहिए. आज जो संस्कार बच्चों में स्थापित होंगे वो ही आगे चलकर देश और समाज के, परिवार के विकास में सहायक होंगे.

ईमानदारी, सत्यता, विवेक, करुना, प्रलोभनों से दूर रहना, पवित्रता ये नैतिक मूल्यों के आदर्श तत्व हैं, इन आदर्श तत्वों (सिद्धांतों) से जीवन में आध्यात्मिकता का जन्म होता है.  एक आदर्श परिवार या देश के संचालन हेतु परिवार के सभी सदस्यों, या देश के सभी नागरिकों में शिष्टाचार, सदाचार, त्याग, मर्यादा, अनुशासन, परिश्रम की आवश्यकता है. यदि जीवन में शिष्टाचार, सदाचार, अनुशासन, मर्यादा है तो परिवार और देश में शांति रहेगी.  यदि परिवार या राष्ट्र में स्वार्थ लोलुपता, पद लोलुपता बनी रहेगी तो परिवार भी टूटेगा, राष्ट्र भी  भ्रष्टाचार से प्रदूषित होता रहेगा.   इसलिए अहंभाव त्यागकर, स्वार्थ त्यागकर,  प्रलोभनों से दूर रहकर अपने व्यक्तिगत जीवन में विनम्रता, त्याग, परोपकार को जीवन में स्थान देना होगा तभी हम एक आदर्श परिवार का सृजन कर सकते हैं, एक आदर्श और खुशहाल राष्ट्र का स्वप्न साकार कर सकते हैं.

कन्फ्यूशियस के अनुसार - “यदि आपका चरित्र अच्छा है तो आपके परिवार में शांति रहेगी, यदि आपके परिवार में शांति रहेगी तो समाज में शांति रहेगी, यदि समाज में शांति रहेगी तो राष्ट्र में शांति रहेगी"

रविवार, 28 नवम्बर 2010

धोबी का कुत्ता घर का न घाट का

confused-monkey1 बाईक चलाना तो जैसे भूल ही गया हूँ, क्लिच के साथ गियर पर नियंत्रण और इधर उधर से रेंडम क्रम में आने वाले व्यक्तियों और वाहनों की कस्साकस्सी में मैं जैसे फिर से शहर के लिए गांव से आने वाला एक सीधा साधा इन्सान बन गया हूँ, मेरे छोटे भाई मुझे बाईक पर बैठने नहीं देते कि कहीं मैं हाथ - पैर ना तोड़ लूं !   इतना बुरा भी नहीं चलाता पर लोगों की फीडबैक ऐसी है कि कोई सुन ले तो साथ पीछे बैठेगा ही नहीं, अर्धांगिनी तो पहले ही हाथ जोड़ बैठी कि हम तो ऑटो कर लेंगे … पर फिर भी मन है कि खुद को सर्वश्रेष्ठ मानता है, लगता है थोड़े प्रयास और भरसक अभ्यास की जरूरत है. 

कार चलाना में भी वही संघर्ष, यहाँ भी क्लिच और गियर का मिश्रण और ऊपर से बाजारों की भीड़ मुझे अनियंत्रित सा कर देती है, भले ही अमेरिका और जर्मनी में गाडी की गति उड़न खटोले जैसी करके फिर भी नियंत्रण संभव है पर यहाँ वही हाथ डगमगा रहे हैं, सुविधा ने संघर्ष को मात दे दी और हम कुछ ज्यादा ही सरल जीवन जीने के आदी हो गए हैं,  बाथरूम में से बदबू आती है तो धूल से छींक ही छींक - जैसे हम अपने ही घर में बेगाने से हो गए !  इस कहते हैं कि धोबी का कुत्ता न तो अब घर का रहने वाला है और न घाट का…अमेरिका में भारतीय जीवन जीते हैं और भारत में आकर जैसे स्पीड में कही पिछड़ रहे होते हैं,  यहाँ आकर हर मोड पर मेरा और सबका बहाना होता है कि अब वो यहाँ नहीं रहते ना, तो आदत नहीं रही !!

ट्रेन और बस में धक्कामुक्की है पर अगले ही पल बातों में अपनापन लिए पुरानी सौंधी खुशबू लिए प्रेम झलक पड़ता है.  सकल घेरलू उत्पाद की दर का प्रभाव लोगों के जीवन पर भी प्रतिलक्षित होता दिखता है, सब लोग व्यस्त है, बच्चे स्कूल के बोझ से पस्त हैं और हर कोई आगे बढ़ने की होड़ में मस्त है, हर हाथ की उँगलियाँ मोबाइल के पैड पर हैं, और शहरों के बाजारों की गलियाँ विदेशी रंग में रंगने के लिए उतावली हैं,  देश परिवर्तन के लिए तेजी से आगे बढ़ रहा है और कहीं  न कहीं मौलिकता बाजारू और दिखावे का साधन मात्र होकर रह गयी है, मैं स्तब्ध सा खड़ा मंहगी होती चीजों को बस निहारता रहता हूँ, खुद को गरीब अनुभव करता हूँ और असमर्थ भी यहाँ के बाजारों में !  इतनी महँगाई अगर प्रगति के साथ गेहूं के साथ खरपतवार की तरह आती रही तो क्या एक दिन ये देश बंजर नहीं हो जाएगा ? 

250px-Swami_haridas_TANSEN_akbar_minature-painting_Rajasthan_c1750_crpकल दैनिक भास्कर समाचार पत्र में एक समाचार था,  तानसेन समारोह जल्द ही ग्वालियर में शुरू होने वाला है,  हर साल दिसंबर में ये समारोह होता है. अकबर के नवरत्नों में से एक तानसेन जी ग्वालियर के पास ४० कि मी दूर बेहट नामक गाँव में जन्मे थे और समाचार पत्र के अनुसार इस गाँव का बच्चा बच्चा ध्रुपद गायन जानता है, ये कला उनके खून में बसती है,   250px-Tomb_of_Tansenपर सरकार की और से आज तक ना तो बेहट के लिए और ना ही इस गाँव के लोगों की कला को आगे लाने के लिए कुछ किया है ! मैं शिवराज सरकार और भाजपा से निवेदन करूँगा कि इस और कुछ ध्यान दें !    हो सकता है कि तानसेन समारोह को भी ग्वालियर से बेहट में ले जाकर इस स्थान पर एक उत्साह पैदा करे !!

ब्लॉग्गिंग से कमाया धन

हिन्दी ब्लॉग्गिंग विधा ने एक वातावरण पैदा किया है जहाँ पर कई ब्लॉगर एक परिवार की तरह एक दूसरे के दुःख सुख और वैचारिक आदान प्रदान में शामिल है.  कुछ लोग ब्लॉग्गिंग से धन कमाने की अपेक्षा करते हैं तो कुछ देश सुधार की !  मुझे लगता है कि हिन्दी ब्लोगिंग से कुछ तो सार्थक हुआ है :

१. एक अमूल्य धन की कमाई जिसमें कई अनजान लोग विचारों के आदान प्रदान से एक दूसरे के नजदीक आये, घनिष्ठ मित्र बने.

२. हिन्दी का एक तरह से विकास हुआ है, हिन्दी में लेखन से इन्टरनेट पर हिन्दी में उपलब्ध सामग्री की प्रचुरता बढ़ी है

३. जिन लोगों की हिन्दी लेखन में रूचि थी उनको एक वातावरण मिला है, प्रोत्साहन मिला है, रूचि जागी है और प्रतिस्पर्धा ने कई लोगों में लिखने और पढने का जुनून पैदा किया है

मेरी इस बार की भारत यात्रा का एक पहलू ब्लॉग्गिंग मित्रों से मिलना भी था, अब तक फोन पर कई मित्रों से बात हुई और हर एक से आत्मीयता भरे सम्बन्ध ही बने हैं,  मैं पहली बार किसी ब्लॉगर से मिला था २००९ में, तब मैं मुरैना निवासी भुवनेश शर्मा से मिला था,  भुवनेश से बात करना और उनके लेखो को पढना दोनों से ही मुझे कुछ न कुछ सीखने को मिलता था और जब मिला तो और भी अच्छा लगा, कल वो फिर मिलने ग्वालियर आये और घंटो हम बात करते रहे, कई विषयों पर ! कल उन्होंने माननीय दिनेशराय द्विवेदी से भी फोन पर बात कराई, द्विवेदी जी के ब्लॉग पर मेरा तो नियमित जाना बना रहता है पर बात करके और भी ज्यादा अच्छा लगा ! 

इसी तरह प्रवीण पाण्डेय के हिन्दी लेखन का में बड़ा प्रशंशक हूँ,  एक-दो बार फोन पर अल्प समय के लिए बात हुई है !   समीर लाल से कनाडा में हुई मुलाकात ने एक और घनिष्ट मित्र दिया तो पाबला जी, बिल्लोरे जी, महफूज मियां इन सबसे बात करके भी इनको और नजदीकी से जानने का मौका मिला !  रवींद्र प्रभात,  राज भाटिया जी, जय झा  से भी फोन पर बात हुई है और शायद ये सिलसिला चलता रहेगा ! अर्चना चाव जी, और अजित गुप्ता जी से भी बात करके आशीर्वाद लिया है.  अनूप शुक्ल जी,  शिखा जी, अभिषेक झा, अजय झा और अन्य लोगों से भी चेट पर बात होती रहती है.

इसी सिलसिले को आगे बढ़ाया इस शुक्रवार को ललित जी और खुशदीप जी ने,  एक संकट मोचक की तरह निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर एक आत्मीय मुलाकात ने मुझे दो और मित्र दिए.  दिल्ली महानगर में वर्किंग डे के दिन सुबह ८ बजे स्टेशन कौन आ सकता है, पर हमारे देश भावना प्रधान है जहाँ आलस या फिर और विकार भावों के सामने हावी नहीं रह पाते !   मेरे पास कुल मिलाकर छोटे से लेकर बड़े तक १० बैग थे और दो बच्चे :)  …कुली सामान को स्टेशन के बाहर से प्लेटफोर्म पर रखकर जा चुका था और जब गाडी आकर लग गयी तो फिर जद्दोजहद थी की कैसे सामान को अंदर रखा जाय, किसी एक को बाहर रखवाली भी करनी थी, पर समय बहुत था – लगभग ३५ मिनट तो सोचा कि धीरे धीरे खुद ही चढाते हैं पर तभी दो संकटमोचक मित्र उस समय आते हैं और सब काम एक मिनट में हो जाता है, बच्चे भी खुश हो गए और फिर बातों का सिलसिला ऐसा चला कि लगभग २५ घंटे की थकान कब दूर हो गयी - पता ही नहीं चला - बातों में ऐसे मग्न हुए कि ट्रेन जब चलने लगी तब मैं भागते भागते चढा !

कौन कहता है कि ब्लॉग्गिंग से कमाई नहीं होती :)

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बुधवार, 24 नवम्बर 2010

एक युद्ध की तैयारी - भारत आने के लिए !!

 

बच्चों के साथ यात्रा करना भी युद्ध पर जाने से कम नहीं,  उनकी तमाम फरमाईशों पर गौर फरमाने के साथ जो पेकिंग हो रही है उसको यथावत रखने का संघर्ष भी अनवरत करते रहना पडता है,  उसके बाद उनकी अति प्रसन्न वाली मुद्रा को शांत करने की कला में भी पारंगत होना पडता हैं -  अति उत्साह में अनगिनत प्रश्न और अनगिनत आकांक्षाएं !  बस एक बार उनको बता दिया कार्यक्रम के बारे में तो उनको लगता है कि समय को फेर कर गंतव्य समय को वर्तमान में मोड दिया जाये ! ऐसे में खुद की तैयारियां और जरूरी काम तो बस जैसे युद्ध में पैदल सेना को टैकल करना हो बस !

air travel

बच्चों की संख्या एक से अधिक है तो तुलनात्मक वस्तुओं से बच्चों में उपने खीजपन को भी संयमित करने का गुण सीखना पड़ेगा नहीं तो आप अभिमन्यु की तरह खीज गलियों के चक्रव्यूह में घुमड़ते रहोगे !  इस उत्साह को यहाँ के शिक्षक भी चार चाँद लगा देते हैं ये बोलकर कि वाह जाओ और मजे करो वत्स - यात्रा का वृतांत लिखना - बस यही तुम्हारी पढाई होगी  ! उनके अनुसार ये अमूल्य स्मृतियाँ मानसपटल पर हमेशा अंकित रहेंगी इसलिए ये तो पढाई से भी बढकर है - अब तो युद्ध में इन बच्चों को और भी शस्त्र मिल गए और हमेशा की तरह अपनी हार इन बच्चों के सामने अपेक्षित सी लगती है, जीतने का उपाय सोचना ही होगा क्यूंकि आगे १८-२० घंटे , रात दिन, सुईयों के साथ प्रथ्वी का ध्रुवीकरण भी परिवर्तित होगा और उससे उपजे जेट लेग रुपी विकार को भी झेलना होगा ! 

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खैर युद्ध की पूरी तैयारी कर ली गयी है, सारी बैटरियों को चार्ज कर लिया गया है,  सारे उपकरण मुस्तैद कर लिए गए हैं, विभिन्न खेलों से लेकर किताबों तक के पूरे इलेक्ट्रोनिक लश्कर के साथ हम भी युद्ध भूमि में उतरने तैयार हैं, पूरे रास्ते के रथों का इंतजाम हैं , कहीं सड़क खटोला तो कहीं उड़न खटोला तो कहीं पर प्रवीण (रेल) खटोले का इंतजाम है बस  देर सवार होने की है  !

जब ये लेख पढ़ा जा रहा होगा तब हम तो शिकागो के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर बच्चों को सांत्वना दे रहे होंगे की बस थोडा सा इन्तजार और - बस उड़न खटोला लगने वाला है पार्किंग में , फिर बैठे और उड़े !  उन दो घंटो में भी हमें एक छद्म युद्ध ही लड़ना पड़ेगा,  अकेले में तो पहुँच गए एअरपोर्ट ३० मिनट पहले पर अब तो करीब २ घंटे पहले ही रवाना होना पडेगा और फिर वहाँ इन्तजार में बच्चे बेचारे कैसे जिज्ञासा को शांत रखें, मन में उद्वेलन है अपनों से मिलने का,  जेल से बाहर जाकर उनका भी स्वछन्द होकर, उमुक्त होकर आवारा होने का मन है !

airport-securityपिछले २-३ सालों में मैंने १ लाख मील से भी ज्यादा हवाई यात्रा की है, इस यात्रा में करीब १५ देश तय किये होंगे,  करीब ९० उड़न खटोले बदले होंगे और हजारों मील की सड़क नाप दी होगी !   सोचता हूँ अब पुराने दिनों को जब स्कूल के मैदान से या घर की छत से आकाश में उडता हवाई जहाज देखते थे तो मन करता था कि बस एक बार बैठ जाऊं इसमें, एक बार तो पिताजी ने पुरुष्कार के रूप में ग्वालियर से दिल्ली की हवाई यात्रा का प्रलोभन भी दिया था पर तब तक शायद यात्रा अपने आप ही संभव हो गयी थी , अब मन करता है कि कौन हवाई यात्रा के तामझाम में पड़े  - तब नहीं पता था कि १ घंटे की यात्रा के लिए एअरपोर्ट पहुँचने से लेकर और बाहर निकलने तक कितने तामझाम - सुरक्षा जांच इत्यादि के बोरिंग प्रोसेस से गुजरना पडता है - इसलिए तब एक बार की आकांक्षा वाला व्यक्ति अब हवाई यात्रा से बचने का कोई न कोई बहाना ढूँढता रहता है और उसे एक युद्ध समझता है - ये भी एक यात्रा  है !

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इस युद्ध के बाद १ महीने तक अमन और मस्ती का माहौल रहने वाला है - बस आनंद का इन्तजार है जो संतुष्टि और संतृप्ति देगा !! आप में से भी कई लोगों के दर्शन होंगे इसलिए भी इस यात्रा का रोमांच हावी है !!!

मिलते हैं ….

मंगलवार, 23 नवम्बर 2010

अरुंधती रॉय पर बहस (जारी …)

 

पिछली बार की बहस क्या सिर्फ अरुंधती रॉय ही देशद्रोही हैं ?  से कुछ सवाल उठे थे जिनका जिक्र करना जरूरी था.

बाकी सब लोग तो एक सुर में बोल रहे थे पर हमारे एक मित्र है भवदीप सिंह,  वो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सहारे अरुंधती राय के सारे गुनाहों पर ऐसे ही पर्दा डाल रहे थे जैसे भ्रष्ट (जनसेवक नेता) लोग कोई न कोई बहाना बनाकर अपने आप को हर बार बचा ले जाते हैं !

पिछले लेख में जो प्रतिक्रियायें आयीं उनमें से कुछ यहाँ देखते हैं -

भवदीप सिंह ने कहा…

आप इसलिए उनको देशद्रोही बोल रहे हैं क्योंकि उन्होंने देश के खिलाफ ब्यान दिए हैं? ये तो भाई गलत बात है.
उन्होंने अपनी वाक्-स्वतंत्रता (Freedom of Speech) का उपयोग किया है. बुरा न मानिए पर मुझे इसमें कुछ गलत नहीं दिखा.
उन्होंने जो बोला. वो आप या मैं (या फिर हमारे देश की अधिकतर जनता) नहीं सुनना पसंद करेंगे. उन्होंने हमारे विचारो से हट कर बोला है. ये बात में मानूंगा. लेकिन, मुझे कोई क़ानून भंग होता नहीं दिखा.
Freedom of Speech तो है न हमारे देश में.. या फिर वो "खट्टा मीठा" के गाने वाली बात हो गए.. "यहाँ पर बोलने की आजादी तो है. पर बोलने के बाद आजादी नहीं है" ?
में उनके विचारो से सहमत होयुं या न होयुं. पर में इस बात से सहमत जरूर हूँ के उन्होंने क़ानून में रहा कर बोला है जो बोला है. अगर हमें उनकी बात पसंद नहीं आती तो क़ानून हमें पूरी आजादी देता है के हम उसके खिलाफ बोले. जैसा की इधर बोल रहे हैं.

राम त्यागी ने कहा…

पहले तो सभी का बहुत बहुत धन्यवाद इस ज्वलंत मुद्दे पर बहस के लिए !
जहाँ एक और भवदीप ने स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति के सहारे रॉय मैडम को सही ठहराने की कोशिश की है वही अन्य सभी लोगों ने एक मत से अरुंधती के गैर जिम्मेदाराना रवैये के साथ साथ नेताओं, मीडिया और अन्य खुले आम घूम रहे लोगों पर भी अंकुश लगाने पर भी जोर दिया !

भवदीप सिंह ने कहा…

पहली बात.. मैंने रॉय मैडम को सही नहीं बोला. मैंने बोला के तुम और हम उनके विचारो से सहमत नहीं हैं. पर उनको अपने विचार रखने की पूरी स्वंत्रता है.
दूसरी बात. अगर उनको बोलने का मकसद हिंसा भड़काना होता तो Sedition के अंतर्गत उनको गिरफ्तार करना बनता था. उन्होंने जो बोला उस से न तो हिंसा भड़की न ही ऐसा कुछ करना उनका मकसद था.
तो संछेप में फिर से बोलूँगा के. मैडम ने जो बोला उस से हम सहमत हो या न हों... पर उन्होंने क़ानून में रहा कर बोला .तुमको और हमको उनकी बात जमी नहीं तो हमें भी पूरा हक है उनके विपरीत बोलना का.

 

अब भवदीप और आप सब से मैं पूछना चाहूँगा कि क्या हम दंगे होने तक इन्तजार करेंगे और देश की अखंडता पर कश्मीर को अलग करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों को उसी तरह गुनाह करने देंगे जैसे हम अपने कुछ भ्रष्ट नेताओं को उनके बुरे कामों का इनाम उनको वोट देकर करते हैं ?

मंसूर अली हाशमी जी ने बहुत ही सही बात कही थी  -
उसका 'गीला', 'नी' लगे, 'गंदा' उन्हें !
'अंधी' 'रुत' है, दोस्तों अब क्या करे?
कैसी आज़ादी उन्हें दरकार है,
अपने ही जो देश को रुसवा करे !!

अनुराग जी की बात सही है कि कब तक सहेंगे -  

जिस हमाम में सब नंगे हों वहां हर नंगा दूसरे का ही उदाहरण सामने रखेगा| लेकिन इस देश पर हक सिर्फ इन नंगों का नहीं है| देश के सीधे सच्चे नागरिक कल चुप थे, आज चुप हैं इसका मतलब यह नहीं है की वे हमेशा चुप रहेंगे| कहीं न कहीं से तो आरम्भ करना ही पडेगा.

अभिव्यक्ति की स्वच्छन्दता और अखंड भारत में से आपको क्या चुनना है ?

सोमवार, 22 नवम्बर 2010

दिवाली की रौनक अभी भी बरकरार है

भारत आने की तैयारी से बच्चों में उत्साह और उत्सुकता पूरे सबाब पर है, इधर हमारी तैयारियाँ जोरो पर हैं तो उधर भारत में घरवाले भी हर पल इन्तजार में पलक पांवड़े बिठाकर बैठे हैं ! भारत आने का दुःख भी होता है क्यूंकि एक महीने बाद जब लौट कर आयेंगे तो फिर से एक लम्बा इन्तजार, अकेलापन और अपनो से दूर रहने की वेदना ! पर जो लोग नौकरी करते हैं वो कब स्वतंत्र होते हैं तो अगर भारत में होते तो भी कहीं न कहीं घर से दूर रह रहे होते - किसी महानगर में जद्दोजहद कर रहे होते, भीड़ में धक्के खा रहे होते ! छोटे शहरों की सौम्यता, सरलता और हल्का सा सूनापन पसंद है पर हम पलायन कर जाते हैं स्वावलंबन की चाह में, कहीं न कहीं ये पलायन हमें स्वावलंबन के बदले एकाकीपन भी दे देता है और फिर हम आते हैं सूचना तकनीक के विभिन्न सहारों पर कुछ तलाशते - पर असली तलाश तो बस परसों ग्वालियर में ख़त्म होगी जब भावनाएं स्वार्थ की सीमायें लांघकर परिवार को परिभाषित कर रहीं होंगी !

इस शनिवार को स्थानीय निरंकारी संत मिसन  और देसी जंक्सन रेडियो द्वारा पास के ही एक कस्बे  में दिवाली मेले का आयोजन किया गया था,  मेले में संस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ साथ भारतीय खाने का भी पूरा इंतजाम किया गया था. चाय, ब्रेड पकोड़े, पपड़ी चाट, नान-पूरी-सब्ज्जी, गुलाबजामुन, समोसे, कचोडी सब कुछ उपलब्ध था !  निकुंज का एक स्टेज प्रोग्राम था तो बस बॉलीवुड गानों, भजन और चाट सब का मजा साथ लिया गया !  मजेदार रही ये शाम भी !


शनिवार, 20 नवम्बर 2010

शोध का सोच और आत्मनिर्भरता पर प्रभाव - भाग ३

शोध का सोच और आत्मनिर्भरता पर प्रभाव - भाग १

शोध का सोच और आत्मनिर्भरता पर प्रभाव - भाग २

पिछले दो लेखों में आपने भारत में शोध की दशा, राजनीतिक उदाशीनता और इसका शिक्षा पर असर के बारे में पढ़ा,  उसी क्रम को थोडा और आगे बढाता हूँ -

भारत में सबसे बड़ी समस्या है हर क्षेत्र में ज्यादा शोध न होने की ! बिना शोध के हम पुरानी पगडंडियों पर बिना सुधार और उन्नयन के चलते रहते हैं और हाथ लगता है तो बस कठिन परिश्रम - आईडिया तो शोध से ही आते हैं , उन्नयन तो शोध से ही आता है अन्यथा मानसिक तनाव और कठिन परिश्रम के दो किनारों के बीच झुलसते रहते हैं हम !!

अब देखिये कि कोई भी काम करना हो तो कारीगर को जरूर बुलाना पड़ेगा,  खिड़की का शीशा हटाना हो या नया दरवाजा लगाना हो, हर चीज  के लिए किसी न किसी को बुलाना पडता है पर पश्चिमी देशों में क्यूंकि मजदूर बुलाना आसान नहीं, और जैसा कि बोलते हैं कि “आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है”  इस बात की आवश्यकता ने कि खुद ही कैसे घर का रख रखाव किया जाये - यहाँ की सरकारों ने और विभिन्न निजी संस्थाओं ने नए नए तरीके खोजने के लिए अपने अपने स्तर पर प्रयास किये और इसका नतीजा है कि आज यहाँ दरवाजा भी आप खुद फिट कर सकते हैं और खिड़की के शीशे भी कुछ ही समय में आप खुद फिट कर सकते हैं और बाकी का काम यू ट्यूब इत्यादि ने सरल बना दिया , हर चीज के विडियो आप यू ट्यूब पर देख सकते हैं कि कैसे कौन सा काम किया जाये !

मैं चाहता हूँ की यू ट्यूब का आईडिया, ऐसे खिड़की और ग्लास बनाने के आईडिया हमारे भारत से आये, क्रियान्वयन तो हो ही जाता है, जरूरत है दिमाग में ये नुकीलापन लाने की जिससे हम सोच सकें कि करना क्या है ! 

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आज भारत को अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिए उच्च तकनीक के लिए कई गुना कीमत चुकानी पड़ती है,  देश आजाद ६० साल पहले हुआ पर अब भी हम विदेशों के गुलाम हैं, अब भी हमारा अधिकतर विदेशी मुद्रा भण्डार तेल और रक्षा प्रणाली की जरूरतों में खर्च हो जाता है,  प्राकृतिक संसाधनों के आधुनिक संसाधन हमारे पास नहीं हैं और हालत ये है कि हम सिर्फ सूचना तकनीक में आई आंधी से खुद को विकसित समझ रहे हैं, आँधियाँ जितने वेग से आती हैं उतने ही वेग से चली भी जाती हैं , हमें विकास का सुनामी नहीं बल्कि एक सुव्यवस्थित, क्रमबद्ध और स्वनियंत्रित वाहक बनना होगा अन्यथा हम आजादी के बाद से हो रहे प्रतिभा के पलायन को रोक नहीं पायेंगे !

एक पत्रिका में लिखे लेख के अनुसार -

“While defence trade in the region is dominated by China, in terms of both exports and imports, India is becoming increasingly significant as an importer. “

चीन दोनों तरफ से अपना संतुलन बना कर रखता है , कहीं अपनी चीजें बेच रहा है तो कहीं वो खरीद रहा है , अगर हम (केवल) खरीददार ही बने रहे तो कैसे संतुलन का गणित हमें सफल करेगा ?