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बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

तलाश एक खोये हुये सपने की…

 

16-17 दिसम्बर २०१२ को पूरा भारत देश अपनी बेटी के साथ हुए जघन्य अपराध के लिए आक्रोश में था,  पूरा देश प्रदर्शनों के जरिये अपने आक्रोश का इजहार करते हुए अपराधियों के लिए कड़ी से कड़ी सजा के लिए एक स्वर में खड़ा दिखाई दिया|  एक पिता ने बिना किसी भेदभाव के उच्च शिक्षा के लिए हर सुविधा मुहैया कराई, एक सपने की नीव बुनी, लडकी ने भी मेहनत से अपने पिता के विश्वास को एक बल दिया| पर एक भयावह रात में कुछ दरिंदों ने उस सपने को चकनाचूर कर दिया, रही सही कसर समाज ने - हम सब ने, पुलिस ने अपने लचर रवैये से पूरी करी, हम सब कहीं न कहीं इस वीभत्स कृत्य में जिम्मेदार थे|

हमारी असंवेदनशीलता और सब कुछ जल्दी ही भूल जाने की प्रवृत्ति ने समाज में कुकुरमुत्तों की तरह अपराधभाव को पनपने का मौका दिया है!  “सब चलता है!”, “ हम क्या कर सकते है!”  इस तरह के मनोभाव ने हमें एक तरह से अपराध का सरंक्षण दाता बना दिया है|

ऐसे कई माता पिता हमारे आसपास मिल जायेंगे, जिनके सपने समाज के अद्रश्य अपराध के चलते अचानक से बिखर गए और ये समाज, रिश्तेदार, पुलिश प्रसाशन, सरकारों ने ना तो उन सपनों के टूटने के परवाह करी और ना ही किसी ने उन माँ बाप की कोई सहायता की|  ऐसे पारिवार वालो के लिए जिंदगी एक अभिशाप बनकर रह जाती है

२६ मई २०१२ को भी एक ऐसा ही सपना दिल्ली में टूटा| मध्यप्रदेश के एक गाँव में एक परिवार खेती करके अपना जीवनयापन कर रहा है, बढते परिवार,  बढ़ते खर्चे पर कम होता उत्पादन और कम होता खेतों का क्षेत्रपल - ये सब हर भारत के हर गाँव की दास्ताँ है| पर फिर भी कुछ माँ बाप एक एक पैसा जमा करके अपने बच्चों को शिक्षा प्रदान करने की हर सुविधा मुहैया कराते है, जिससे आगे जाकर वो बच्चे उस गाँव से बाहर निकल कर अपने पैरों पर खड़े हो सकें और अपने परिवार को कुछ आर्थिक मदद दे सकें और अपने लिए भी नए आयाम तय कर सकें|  धर्मेन्द्र के घरवालो का भी कुछ ऐसा ही सपना था,  धर्मेद्र बचपन से ही पढ़ने में बहुत होशियार था, जब बड़ा हुआ तो जिले के आदर्श स्कूल में उसको एडमिसन मिला, परिवार को एक रोशनी की किरण दिखाई दी, सपनों की मंजिल कुछ पास सी दिखाई देने लगी|  पिता ने अपने आप को खेतों में लगाए रखा जिससे १ हजार महीने का खर्चा पूरा कर सके,  ये रकम भी बहुत बड़ी रकम थी उनके लिए, पर फिर भी एक आशा थी कि ये पैसा सही दिशा में लग रहा है|  जब कॉलेज की बात आई तो उसको BCA में एडमिसन मिला, मेहनत और जिम्मेदारी से तीन साल का कोर्स पूरा किया, अब आगे पढाने की हिम्मत नहीं थी घरवालो की,  तो धर्मेन्द्र ने दिल्ली जाकर नौकरी देखना शुरू किया और जल्दी ही उसको एक प्राईवेट कंपनी में नौकरी मिल गयी| दिल्ली आकर वह अपने कुछ दोस्तों के साथ रहने लगा और जॉब करने लगा|  घरवालो के सपने पूरे हुए, इससे ज्यादा और उनको भगवन क्या देता, अब तो उसके रिश्ते भी आने लगे थे| इसी तरह शायद उसको दिल्ली में दो साल बीत गये होंगे, भारत की प्रगति में एक सपना साकार हो रहा था|

फिर एक भयावह शाम आई, २६ मई २०१२ की शाम को वह अपने फ्लैट से निकला तो फिर कभी वापस नहीं आया, दिल्ली के अँधेरे में पता नहीं कहाँ खो गया, कौन ले गया, क्या कारण थे, क्या किया उसका, कुछ पता नहीं| एक गाँव का गरीब पिता दिल्ली में कैसे और क्या करता अपने बेटे की तलाश के लिए?  पुलिस के हिसाब से ये तो नोर्मल केस है और ऐसा तो होता रहता है,  पुलिस ने कभी कोई जिम्मेदारी और गम्भीरता इस मामले में नहीं दिखाई, ये लोग दिल्ली की दीवारों पर पोस्टर चिपकाते रहे, और अगर पुलिस को कोई भी क्लू देते तो दिल्ली पुलिस उलटे विक्टिम के घरवालों को ही बाकी की सूचना लाने के लिए कहते, उलटे दिल्ली पुलिस धर्मेन्द्र के परिवार वालों से प्रश्न पूछती कि कुछ सुराग लगा क्या| पुलिस का रवैया बहुत ही निराशाजनक और गैर जिम्मेदाराना रहा, उन्होंने कोई सहायता अपनी तरफ से नहीं करी, बस मूकदर्शक बनकर मामले को टालते रहे और वो इसमें सफल भी रहे, मामला रफादफा हो चुका है और जाने वाला अभी तक वापस नहीं आया|

सरकार तक गरीब की आवाज तो पहुँचना एक असम्भव सा ही काम है, घरवालों ने, रिश्तेदारों ने और दोस्तों ने बहुत हाथ पैर मारे पर कुछ पता नहीं चला उसका,  माँ ने खाट पकड़ ली और पिता इस तुषारापात से निशब्द हो गया, सपने धराशायीधर्मेन्द्र की गुमशुदी की जानकारी हो गए और आँशु भी बह बह कर कम से पड़ गए पर जाने वाला कभी वापस ना आया| अब तो घर में और पड़ोस में शहनाई की आवाजें फिर से आने लगी हैं, तब से कई मौसम बदल गए और बदलते मौसमों के साथ सब भूल से गए है उसके अस्तित्व को भी,  पर माँ अभी भी उस खाट पर पड़ी हुई आज भी टकटकी लगाये हुए है कि बस कोई कह दे कि पता चल गया है|  पुलिस से ज्यादा विश्वाश गांव में माता की चौकी और ज्योतिषी जैसे अंधविश्वासों पर होता है (इसकी भी एक वजह प्रशासन से कोई आशा न होना है, जबाब नहीं मिलना है, आदमी वहीँ जाता है जहाँ उसे कुछ रौशनी दिखती है) , सैकड़ो सिद्ध पुरुष आजमा लिए, सबकी चुनौतियाँ और भविष्यवाणियाँ महीने दर महीने झूठी पड़ती रहीं पर वो नहीं आया|  अब भी इन्तजार है, आशा है कि वो आएगा जल्दी ही….

दिल्ली से गायब हुए बच्चों का एक लेखा-जोखा  एक रिपोर्ट के अनुसार १३ बच्चे औसतन दिल्ली से रोज गायब हो जाते हैं (देखिये दायीं तरफ की टेबल में),  ज्यादा से ज्यादा मामलों में FIR ही दर्ज नहीं होती|

इंडियन एक्सप्रेस में २९ अगस्त २००८ को छपी रिपोर्ट के अनुसार २६ हजार लोग दिल्ली पुलिस के रिकॉर्ड के अनुसार दिल्ली से गुमशुदा हैं और दिल्ली पुलिस को कोई सुराग नहीं है| एक और रिपोर्ट के अनुसार भारत से हर आठ मिनट में एक बच्चा गायब हो जाता है,  वर्ष २००८ और २०१० के बीच  १.७ लाख बच्चों के खोने की FIR दर्ज की गयी थी, इस हिसाब से यह समस्या बहुत गंभीर है क्यूंकि ये गायब हुए लोग अपराधिक और असामाजिक कामों में उनकी मर्जी के खिलाफ उनको ब्लेकमेल करके लगा दिए जाते हैं| राज्यसभा में एक प्रश्न के जबाब में गृह राज्य मंत्री जीतेन्द्र प्रसाद ने बताया कि ६० हजार बच्चे २०११ में २८ राज्यों और केंद्रशाषित प्रदेशों से खोये थे, उनमें से २८ हजार अभी तक नहीं मिले हैं. ये सारे आंकड़े दर्ज की हुई FIR के अनुसार हैं - बहुत सारे मामलों में पुलिस FIR दर्ज नहीं करती या फिर लोग पुलिस के पास नहीं जात |  

तहलका डॉट काम पर एक लेख के अनुसार पुलिस की ऐसे केसों में मंशा और गम्भीरता कुछ ऐसे बयां की गयी है : “It starts with how the investigation is done. Very often, First Information Reports are not registered; just an entry is made into a list of missing persons at the police station, and a photograph of missing child sent across city police stations. Cases are only investigated if the person reporting the missing child files a case of kidnapping.”

ऐसे कितने केस होते है दिल्ली में, क्या कोई चैनल इस पर केस स्टडी नहीं कर सकता? क्या कोई इस बारे में पहल नहीं कर सकता?  मैंने इस दिशा में कोशिश करने की ठानी है और उस परिवार को एक एक आशा देने की सोची है और आशा है कि बहुत सारे लोग आगे आकार इस गरीब के, एक गाँव के केस को भी आगे बढाएंगे|  आप में से कुछ लोग प्रिंट मीडिया में है, तो इस स्टोरी को छापें और उस गाँव में जाकर उस परिवार की आपबीती को लोगों तक पहुँचायें, शायद वो हो कहीं और उस पर इसका असर हो| अगर आप पुलिस में है तो अपने लेवल पर हर सम्भव प्रयास करें, टीवी में है तो फिर तो आपके पास इससे अच्छी स्टोरी और क्या हो सकती है ?  और शायद इस बहाने हम एक सपने को भी पुनर्जीवित कर सकें !!!

 

8 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सच में दिल दहला देनी वाली जानकारी है, न जाने इनका क्या होता होगा, इनपर क्या अपराध होते होंगे या इन्हें किम अपराधों में झोंका जाता होगा। एक भी बच्चा न मिले तब तक पुलिस को प्रयास करते रहना चाहिये।

आपको एक वर्ष बाद पढ़ रहा हूँ, अच्छा लगा।

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

इश्क़ की दास्ताँ है प्यारे ... अपनी अपनी जुबां है प्यारे - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

सचमच भयावह स्थिति है । लेकिन पहलतो किसी को करनी ही होगी । आपका संकल्प स्वागत योग्य है ।

पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

बच्चों के खोने के मामले का ग्राफ देखा जाये तो दिनों दिन बढ़ता जा रहा है जो निश्चय ही चिंता का सबब है !

Blogvarta ने कहा…

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धन्यवाद
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निवेदिता श्रीवास्तव ने कहा…

पता नहीं क्यों पर मुझे तो ये बच्चों के खोने का ग्राफ न लगकर असमवेदनशीलता का ग्राफ लग रहा है . बेहद दुखद और त्रासद .....

Rajesh Yadav ने कहा…

आपने सामाजिक परीथितियों का जीवंत चित्रण किया है ,प्रशंशनीय है आपकी ये लेखनी .

Rajesh Yadav ने कहा…

हम सबको एकजुट होकर सामाजिक विसंगतियों को दूर करने के लिए प्रयास करते रहना चाहिए ,तभी बदलाव आएगा.