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शुक्रवार, 21 मई 2010

गुरुओं से भी सावधान होना पड़ेगा क्या ?

मेरे देश में एक प्रचलन बहुत तेजी से फैल रहा है,  गुरु बनाने का.  हर किसी ने किसी न किसी आश्रम या कहना चाहिए आलीशान आश्रम में रह रहे गुरु को अपना मार्गदर्शक बना रखा है.  इन गुरुदेवों का नेटवर्क बहुत अच्छा होता है,  और इनका मैनेजमेंट का तरीका भी अव्वल होता है, कहना चाहिए कि लीडरशिप की सारे गुण होते हैं इनमें.  लोगों कि श्रद्धा इतनी होती है कि मैने कई घरों को इस वजह से टूटते हुए देखा है.  कोई अपने भाई को छोड़ चुका है तो कोई बूढ़े माँ बाप को.  संयुक्त परिवार को छोड़ एकल परिवार में  रह रहे लोंगों के लिए तो जैसे गुरु जी का ठिकाना ही सब कुछ होकर रह जाता है.

वैसे भी हिन्दू धर्म में गुरु को ज्ञान का श्रोत और ईश्वर से भी उत्तम स्थान दिया गया है क्यूंकि अगर गुरु ही ना होंगे तो रास्ता कैसे दिखेगा, इसलिए गुरु का स्थान जो आपको तरीका बताता है हर चीज को पाने का, बहुत अव्वल रखा गया है, जैसा कि बुजुर्गों ने कहा है -

गुरु गोविन्द दोनों खड़े, का के लागौ पाव । बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो बताय ।।

यहाँ गुरु को समस्त बुराइयों से छुटकारा देने वाला बताया गया है -

गुरु मिला तब जानिये, मिटै मोह तन ताप । हरष शोष व्यापे नहीं, तब गुरु आपे आप ॥
यह तन विषय की बेलरी, गुरु अमृत की खान । सीस दिये जो गुरु मिलै, तो भी सस्ता जान ॥

गुरु कीजिए जानि के, पानी पीजै छानि । बिना विचारे गुरु करे, परे चौरासी खानि ॥

लोग इन दोहों को पढ़कर बहुत भावक रहते है, और अर्थ का अनर्थ हो जाता है जब वो आधुनिक गुरुओं के शरण में जाते है. मेरे हिसाब से, जबसे संयुक्त परिवार टूटने शुरू हुए, लोग बहुत अकेले रहने लगे और उनको किसी साथी या मार्गदर्शक कि जरूरत होने लगी. पहले संयक्त परिवार में ये काम घर के बुजुर्ग, बड़े भाई या पिता किया करते थे, पर अब उनके साथ रहना नहीं है क्यूंकि वो एक बोझ लगने लगते है.  इसी एकाकीपन का फायदा इन तथाकतित गुरुओं ने लिया है,   वो आपके मन की बात कहते है, अपने नेटवर्क के जरिये आपके एक दो काम भी बनवा देते हैं और आपको गुरु भाइयों के साथ एक सामाजिक वातावरण भी मिल जाता है उठाने बैठने का.

सामाजिक वातावरण और सलाह लेने तक सब कुछ सीमित रहे तो सब कुछ ठीक है पर यही सब कुछ अगर किसी का घर तोड़े या फिर ऊपर लिखे गुरु के आदर्शो के विपरीत हो तो कुछ गुरुओं की वजह से गुरु शब्द पर एक प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है.  जैसे एक मछली पूरे तालाब को गन्दा कर देती है वैसे ही कुछ धंधे बाज गुरु और साधुओं की वजह से पूरे समाज के इन आदर्शो का नाम खराब हो रहा है.

पता नहीं लोग कितना मुझसे सहमत होंगे पर मैंने कई ऐसे गुरुओं को एक छोटे से मंदिर की कुटिया से बड़े महलों का , आलीशान कारों का मालिक बनते देखा है, उनके लिए फिर सुविधाओं में जीना ही सब कुछ हो जता है.  और उनके लिए खुद का नाम और अहम् , धर्म से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते है.  उनकी  हर चीज फिर पैसे में बिकती है, चाहे पूजा हो या फिर आशीर्वाद.

जैसे कि मैंने देखा है कि लोगों के लिए ये गुरु परिवार से और माँ बाप से भी सर्वोपरी हो जाते है,  पर शाश्त्रो में तो ये भी लिखा है कि
जननी जन्मभूमिस्च स्वर्गादपि गरीयसी

सारांश ये है कि हम शाश्त्रो की इन  सूक्तियों का भावार्थ  अपने तर्क और स्वार्थ के अनुसार निकाल लेते है और वही करते है जिससे खुद का उल्लू सीधा हो रहा है पर ये भूल जाते हैं कि जिन लोगों के साथ हम है क्या वो वास्तव में मार्ग दिखने लायक है या सिर्फ वो भी धंधे बाज है. 

15 टिप्‍पणियां:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

हाँ, ऐसे गुरुघंटालों से तो सावधान रहना ही पडेगा.

anoop joshi ने कहा…

सर में नाम नहीं लूँगा, क्योंकि बहुत लोगो की भावनाओ का सवाल है, कुछ तथ्य नीचे है:-

१) एक बाबा भगवान निरकार है कहता है, सगुन ब्रहम को न मानने के लिए उपदेश देता है, उसके भक्तो के गले में मेने उस बाबा की तश्वीर वाला ताबीज और घरो में उनकी फोटो की पूजा करते लोग देखे. अरे भाई जब आपने तस्वीरों, मूर्ति की पूजा करने से मना किया है तो अपनी क्यों करवा रहे हो.

२) एक बाबा मोह और वासना से दूर रहने को कहता है. और उसकी अपनी शादी हो रखी और उसका लड़का भी है.

सर बहुत सी चीजे है लेकिन लिख दिया तो गलत होगा अपने पोस्ट की "ब्यर्थ का कोहराम" की दो पंक्तिया लिखना चाहूँगा:-



वाह क्या देश भक्त है हम.


हमें दान्त्वाड़े मै मरने वाले सैनिको का है गम.

तभी तो हमने बाज़ार मै फोटो खीचा कर सिर्फ मोमबत्ती को जलाया.

पर ''बाबाओं'' के खिलाफ कोई कुछ कह दे, तो चारो तरफ मार काट मचाया..............

भवदीप सिंह ने कहा…

कबीर जी का पक्का भक्त हूँ. गुरु की महिमा को अच्छी तरह जनता हूँ. घंटो और दिनों उस बारे में बात कर सकता हूँ. तो भाई बात दिल को चुभती है जब कोई गुरु की महिमा का निरादर करता है. पर जहाँ तक इस लेख में बात हुयी है. झूठे पाखंडियों की बात हुई है. पर ऐसे लोग गुरु थोड़े हैं. ये तो वोही बात हुयी के

फूंटी आँख विवेक की, जाने न संत असंत!
जाके संग दस बीस हैं, ताको नाम महंत!!

आब ऐसे गुरु के चक्कर में पड़ने पर गलत रास्ता ही दिखेगा न. जैसा के कबीरजी बोले

जाके गुरु हैं अंधला, चेला है जा चंद!
अंधे अँधा थेलिया, दोयुं कूप परंत!!

बंधे को बंधा मिले, छूटे कौन उपाई!
कर संगत निर्बंध की, पल में लेट छुडाई!!

-- भवदीप सिंह

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपने बहुत ही सटीक पोस्ट लगाई है!
आजकल गुरूजी नही रहे!
गुरू हो गये हैं!

राम त्यागी ने कहा…

धन्यवाद शास्त्री जी ..सही बोला की आपने की गुरु जी नहीं रहे
भवदीप, तुमने मेरी अधूरी पोस्ट पूरी कर दी अपने अमूल्य कबीरदास के दोहों से..
अनूप, में पूरी तरह सहमत हूँ, आप सब लोगों के विचार देखकर लगा की में पूरी तरह सही था

गिरीश बिल्लोरे ने कहा…

Bhaiya
ganda hai par dhandha hai
ha ha ha

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

गुरु अर्थात भारी । हल्के फुल्के को गुरु बनाया भी नहीं जा सकता है ।

indu puri ने कहा…

मैं अक्सर एक बात सबसे कह्ती हूँ कोई सहमत हो ना हो,किसी की भावनाओं को ठेस भी नही पहुँचाना चाहती किन्तु मेरे विचार से 'गुरु' अर्थात बड़ा,जिसके व्यक्तित्व में एक बडप्पन हो,उसके कर्म में भी बडप्पन हो.
यानि गरिमामई हो वो,सच्चा मार्ग दर्शक हो ,गुरु हर स्थिति में अपने शिष्य की उन्नति,प्रगति,खुशी चाहता है और जब भी उसका शिष्य उससे ऊंचे पड़ स्थान पर पहुंचा सबसे ज्यादा खुश वो गुरु ही हुआ.अब हमें देखना है कि 'गुरु' किसे कहें? किसे बनाये ? किसे माने?
हमें पहला अक्षर सिखाने वाला भी तो गुरु ही था.माँ को भी बच्चे का पहला गुरु कहा गया.
जिससे भी ज्ञान की प्राप्ति हो,जो सही राह दिखाए वो ही गुरु है.अच्छे साहित्य,प्रेरणादायी फिल्मो,जीवन में देखी,सुनी,अनुभव की गई घटनाओं ने भी गुरु की भूमिका अदा की है जब उनके सम्पर्क में आने पर व्यक्ति का जीवन बदल गया.अच्छे य बुरे रूप में इसलिए 'गुरु'शब्द के साथ प्राप्त परिणामों के अनुसार 'गुरूजी' 'गुरुदेव' 'दादागुरु' और 'गुरुघंटाल' शब्द जुड़ते गए और अर्थ भी बदलते गए.
राम! गुरु तो सदा अपने शिष्य का भला चाहता है ना ? वो बुरा कैसा हो सकता है?
'गुरु' को मुखोटे की तरह काम लेने वाले 'गुरु' नही है. हमें इतनी समझ तो होनी हि चाहिए कि हम किसे गुरु कह रहे हैं?
मैं आज भी अपने गुरुओं के भरे बीच बाज़ार में पैर छूती हूँ और मेरे बच्चे भी उनके पैर छूते हैं.
कोलेज छोड़ने के तीस साल बाद मैंने अपने सर को फोन किया -'सर! मुझे पहचानिये मैं कौन हूँ?'
थोड़ी देर बात की.अचानक उन्होंने कहा-'आप 'इंदु पुरी' बोल रही हैं,मैं पहचान गया आपको'
मैंने कहा-'आप नही 'तुम' कहिये सर.आप मेरे रोल मोडल हैं आपके कारन ही मैंने डिसाइड किया था कि मैं 'टीचिन्ग'जॉब में जाऊंगी और आप जैसी ही टीचर बनने की कोशिश करूंगी,अपने सब्जेक्ट में माहिर और बच्चो को समझने और प्यार करने वाली टीचर.'
भावुक हूँ इसलिए बात जुबान से कम की आंसुओं से ज्यादा...........
'गुरु'शब्द को लोंगों ने एक दायरे तक सिमित कर दिया है बाकि.....
कहाँ जरूरत है 'तथाकथित गुरुओं' के पास जाने की.
राम! जानते हो मुझे मिले मेरे लिए मेरे जीवन का अब तक का सबसे बदा कोम्पिमेंट क्या है? जब मेरे पति ने विदेश प्रवास के दौरान मेरे बच्चों को एक पत्र लिखा था और उसमे लिखा था-'मैं तुम्हारी मम्मी को अपना गुरु मानता हूँ'
शायद किसी पति ने अपनी पत्नी को इतना खूबसूरत कोम्प्लिमेंट नही दिया होगा.
मेरा जीवन सफल हो गया एक औरत के रूप में भी और .........एक पत्नी के रूप में भी.

प्यार
आपकी बुढिया दोस्त (माने तो)
इंदु पुरी

Udan Tashtari ने कहा…

सूक्तियों का भावार्थ अपने तर्क और स्वार्थ के अनुसार निकाल लेते है

-यही तो आज का सूत्र है सफलता का.

गुरु या गुरुघंटाल-जहाँ मतलब सीधा हो जाये.

राम त्यागी ने कहा…

शुक्रिया समीर जी ..२-३ दिन बाद मुश्किल से दिखे हो इस बार :)

राम त्यागी ने कहा…

हरीश सोलंकी ने कहा -
bhai bahut hi achhi kosis he kyu k aaj kisis k paas b apni feeling kehne hi himmat hi nahi bachi he or aap apni baat keh rahe ho esse badiya or kya baat ho sakti he bahut bahut subh kaam naye aap ko

राम त्यागी ने कहा…

इंदु जी बिलकुल सही लिखा आपने ....बहुत अच्छा लगा की कमेंट्स "वाह वाह" से हटकर रहीं और आप सभी ने आपने मेरी अनकही बातों को कह दिया ...ऐसे ही चर्चा की आवश्यकता है.
आत्मीय प्रसन्नता है की आपको मेरे लेख और ब्लॉग पसंद आया, तहेदिल से शुक्रिया !!

Santosh ने कहा…

bhaisahab main bhi aaj kuch kahna chahuga
plz forgive me i sorry
but i hate these gurujis bocz they r the culprits
they use the weapon which r used by the english mens divide and rule
they r the i dun wanna say but i really hate them and kill them
i really too much hurted by them\
they only destroyed the families and do nothing else like panchamnanda..they r bullshits
i wanna shoot them..reallly

डॉ महेश सिन्हा ने कहा…

गुरु को ढूँढा नहीं जाता .
जब व्यक्ति पूरी तरह से तैयार होता है तो गुरु स्वयं उपस्थित हो जाता है .
राम और क़ृष्ण के भी गुरु के पास जाना पड़ा .
अपने जीवन काल में राम और क़ृष्ण को भी मनुष्य ही समझा ज्यादातर लोगों ने .
कलीयुग में हर चीज में भ्रम है .

देव कुमार झा ने कहा…

वैसे ज़माना गुरु का नहीं... गुरु घंटालों का ही है...