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मंगलवार, 11 मई 2010

एक दर्द भारत के पासपोर्ट रखने का ऐसा जो जाने कब जायेगा ...

नौकरी ऐसी है की प्रोजेक्ट के अनुसार कभी अंतर्राजीय तो कभी अंतर्राष्ट्रीय यात्रा करनी पड़ती है.  शिकागो से बोस्टन, न्यू योर्क या फिर ह्यूस्टन जाना पड़े तो कोई बात नहीं होती क्यूंकि किसी वीसा की जरूरत नहीं पड़ती.  पर किसी और देश को जाना पड़े तो बहुत पापड़ बेलने पड़ते है हम इंडियन पासपोर्ट धारको को.

हमारे अमेरिकेन भाई लोंगों के पास तो बस पासपोर्ट होना चाहिए और वो कहीं भी कभी भी उड़ने को तैयार.  पर ऐसा हम इंडियन पासपोर्ट वाले नहीं कर सकते. और ये दर्द समय समय पर सोचने पर मजबूर करता है कि क्यों नहीं सबके लिए एक जैसा क़ानून ?

अब में ऐसा अपने लन्दन, जर्मनी या फिर कनाडा में बैठे लोंगों को कैसे समझाऊं ? उनकी अपेक्षा है कि मैं १-२ दिन में फ्लाई करके प्रोजेक्ट ज्वाइन कर लूं.   बाकी लोग जो अमेरिकेन , कनाडा या फिर लन्दन के पासपोर्ट वाले है उनकी ही श्रेणी में शामिल करके अपेक्षा बढ़ जाती है.  पर ये नादान लोग इम्मिग्रेसन के बारे में कुछ नहीं जानते और फिर उनको सारी ABC पढ़ानी  पड़ती है.

वीजा का टाइम भी २ सप्ताह  से लेकर ६ सप्ताह का रहता है,  अब इतना इंतजार कौन करे ?  आजकल जब से चरम पंथ उत्कर्ष पर है,  वीजा लेना और भी मुश्किल हो गया है. 

इन सबके ऊपर से पेपर वर्क भी इतना कि सारा दिन लग जाए भरने में और उसके बाद अटोर्नी के सवाल पर सवाल.  जब तक वीजा ना आये तब तक आप इस चक्रव्यूह में घूमते ही रहो.  हर जगह के अलग टाइप के फोटो. हर जगह के वीजा के लिए पिछले वर्षो के सारे यात्रा का लेखा जोखा अलग से दो. सारे प्रमाण पत्रों की कॉपी कि जरूरत और तमाम प्रश्नों कि झड़ी.

जब अमेरिका से बाहर निकालो तो फिर वापस आते समय अमेरिका के वीजा का वैध स्टंप भी जरूरी है आपके पासपोर्ट पर अगर वो नहीं है तो एक और माथा पच्ची ...जीवन को बिना बात के बेतुके संघर्षो में ढालना पड़ता है.

बात हरे पत्ते के मोह तक होती तो कोई बात नहीं, पर वर्ल्ड ट्रेवल तो कही से भी करना पड़े , हम भारतीयों के लिए टेडी खीर ही है.  पश्चिम में रहने वाला कही भी आने और जाने के लिए आजाद और हम पर इतनी पाबंदियाँ ...कहाँ तक जायज है ये ?  कुछ तो पारदर्शिता और समानता आनी चाहिए इस भूमंडलीकरण के युग में ...

ये दर्द हर हिन्दुस्तानी या एशियन को है और कोई दवा मुझे आती नहीं दिखती !!

26 टिप्‍पणियां:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

भुक्तभोगी रहे हैं इसलिए आपका दर्द समझना आसान है. वीसा संधियाँ द्विपक्षी होती हैं. इसलिए इसमें दूसरी सरकारों का दायित्व उतना ही है जितना भारत सरकार का. बल्कि मैं इसमें भारत सरकार की ज़िम्मेदारी ज़्यादा मानूंगा क्योंकि जितने भारतीय यूरोप अमेरिका जाते हैं उतने यूरोपीय/अमेरिकन भारत नहीं आते इसलिए ऐसी संधियों के न होने से भारतीय नागरिकों को ज़्यादा तकलीफ होती है.

राम त्यागी ने कहा…

अनुराग जी, हमारी विदेश नीति कभी भी प्रभावी नहीं रही. अटलबिहारी के आने से पहले तो हालत और भी बुरे थे. अभी भी हम कागजो पर तो शेर दिखते हैं, पर कूटनीति और विदेशनीति में अभी भी नीचे से नंबर १ है.

Udan Tashtari ने कहा…

कनाडा के पासपोर्टधारी हैं तो इन सब झंझटों से मुक्त हैं मगर दर्द तो अहसास सकते ही हैं. :)

राम त्यागी ने कहा…

समीर जी, धन्यवाद दर्द बांटने के लिए :)
आपने भी झेला होगा ये झमेला कनाडा का पासपोर्ट हासिल करने से पहले.

Udan Tashtari ने कहा…

विवादों को नजर अंदाज कर निस्वार्थ हिन्दी की सेवा करते रहें, यही समय की मांग है.

हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार में आपका योगदान अनुकरणीय है, साधुवाद एवं अनेक शुभकामनाएँ.

-समीर लाल ’समीर’

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

मैं इस आलेख से पहले नहीं जानता था कि इतनी परेशानी वीजा के लिए उठानी पड़ती है। इस में भारतीय विदेशमंत्रालय का दोष तो है ही।

बेनामी ने कहा…

bilkul theek likha hai aapane

ललित शर्मा ने कहा…

नौकरशाही को तो भुगतना पड़ेगा ही।
अगर कोई अच्छा मंत्री किसी विषय पर कुछ सार्थक करने की पहल करता है तो ये लाल फ़ीताशाही भांजी मार देती है। इनकी हरकतों को भोगा है हमने।

आपके विचारों से सहमत हुँ।

राम त्यागी ने कहा…

@ललित जी, ये नौकरशाही से ज्यादा दो देसों के बीच की संधि और हमारे देश की दूसरे देशो में साख और इज्जत का प्रश्न है. नौकरशाही और मंत्री तो परेशान हमेशा करते ही है, यहाँ तो भारतीय या कहूं एशियन होने की वजह से ये सब भुगतना पड़ रहा है.
हमारा देश विशिष्ट देसों में शामिल तो दिखता है पर जमीनी हकीकत कुछ और ही है.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

आपकी पीडा जायज है।
मेरा पासपोर्ट पिछले साल एक्सपायर हो गया है, नया बनवाना है, पर इतने लफड़े हैं कि हिम्मत ही नहीं पड रही दुबारा फार्म भरने की।
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बूझ सको तो बूझो- कौन है चर्चित ब्लॉगर?
पत्नियों को मिले नार्को टेस्ट का अधिकार?

राम त्यागी ने कहा…

जाकिर अली जी, मुझे लगा आजकल पासपोर्ट बनवाना कुछ आसान हुआ है. पर पासपोर्ट के बाद अगर आप विदेश यात्रा करने वाले है तो बस समझ लो की आप की राह आसान नहीं.

बेनामी ने कहा…

दोस्त राम, में तुम्हारी पीड़ा अच्छी तरह समझ रहा हु. में जो आगे बोल रहा हूँ उसका मतलब ये नहीं के तुम्हारी पीड़ा को महत्त्व नहीं दे रहा.

जैसा के ऊपर स्मार्ट इंडियन ने लिखा वीसा की प्रक्रिया दो देशो के बीच की संधि पर निर्भर करती है. अब कनाडा और संयुक्त राज्ये अमेरिका के बीच में संधि है तो दोनों देशो के नागरिक बेधड़क सीमा के आर पार आ जा सकते हैं. इसी तरह की संधि पश्चिमी यूरोपे के साथ भी है.

पर जहाँ तक भारत और अमेरिका की बात है तो भाई ऐसी कोई संधि नहीं है. आपके पास भारतीय पासपोर्ट है तो अपने अपनी तकलीफ बता दी. पर बिलकुल इसी तरह की तकलीफ एक अमेरिकेन को भी होती है जब वो भारत जाना चाहता है. उसको भी भारत का वीसा लेना पड़ता है. और यकीन मानिये २ किलो की कागज पत्री वीसा प्रपत्र के साथ में देनी होती है.

में तो भारत में ही जन्मा, पला बड़ा हूँ. पर अब अमेरिका का पासपोर्ट ले लिया है. एक साल पहले सोचा के ओ. सी. आयी. ले लूँ. तब मुझे पता चला के कितनी तकलीफ भरी प्रक्रिया है. कभी मिल कर बैठेंगे तो बतायूँगा के किस तरह लिज्जत पापड़ के कारखाने से भी ज्यादा पापड़ बेलने पड़े थे.

तो यार. ये तो भारत सरकार को पहल करनी होगी के किसी तरह इस तरह की संधि हो सके तो. पर उम्मीद कम ही है. क्योंकि अमेरिका इस के लिए राजी नहीं होगा.

-- भवदीप सिंह

राम त्यागी ने कहा…

शुक्रिया भवदीप जानकारी के लिए..मेरा छोटा लड़का अमेरिकेन है और उसको अभी यूरोप में कही भी वीजा की जरूरत नहीं पड़ी - ३ महीने के लिए, उससे ज्यादा पर वीसा आपको लेना पड़ेगा - में सहमत हूँ. नीं बिज़नस ट्रिप्स के बारे में मैं बात कर रहा था वो सामान्यतः कम अवधी की होती है. और इंडिया के लिए अमेय को १५ साल का वीजा मिल गया आसानी से. पर जमीनी हकीकत तुमने ज्यादा फील की होगी क्यूंकि तुम लोग टर्म वाला वीसा देख रहे हो. भारत और अमेरिका को निश्चित तौर पर बैठकर बात करनी चाहिए इस बारे में.

जैसे की मेने कहा बाकी देशो में अमेरिकेन ३ महीने तक के लिए "वीसा on arrival " के जरिये जा सकते है और इंडिया के लिए मुझे एक ऐसा देश नहीं दिखा जहां पर आसानी से जाना हो सके. में अब तक सिंगापूर, लन्दन, पूरा यूरोप, नोर्थ अमेरिका, थाईलैंड, मलेसिया के अनुभव से तो कह ही सकता हूँ की पश्चिमी पासपोर्ट धारक , पूर्वी देशो के पासपोर्ट धारक की तुलना में फायदें में तो रहता ही है.

रही बात भारत की पहल की तो हमारे नौकरशाही और राजनीतिज्ञों के किस्से और अनुभव देखकर कोई आश नहीं दिखती...

देव कुमार झा ने कहा…

बडी दिक्कत है यह तो...

Gaurav Kudesiya ने कहा…

लेकिन यदि आप संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए वीजा पाने का जुगाड़ कर लेते हो तो , अन्य वीजा आपको आसानी से मिल जाता हिया नहीं तो बहुत पापड़ बेलने पढ़ते हैं.
अभी तो हम इंडिया के पासपोर्ट की बात कर रहे हैं... यही पासपोर्ट अगर पाकिस्तान या किसी इस्लामिक देश का हो तो ये दर्द दुगना हो जाये... हम भारतीयों की यही आदत है की हमे हमारा दर्द सुबसे जयादा दीखता है , और दुसरे की सब्जी मैं घी जयादा. लेकिन आपने जो भी लिखा है वो बिलकुल सत्य है , और इस अंतर ( भारतीय और अमेरिकेन ) होने के कारण दर्द तो बहुत होता है |

राम त्यागी ने कहा…

सारे एशियन का हाल बुरा है, और गौरव ने सही पॉइंट लिखा है की मुस्लिम होने पर तो फिर और भी हालत ख़राब है.

स्वेता ने कहा…

बात में दम है, आज से १० साल बाद हो सकता है उल्टा हो

राम त्यागी ने कहा…

आशा तो नहीं दिखती पर आपके मुंह में घी शक्कर :)

vikas ने कहा…

hum london mein hai aur yahi problem aati hai europe ke visa lete hue ...

संजय भास्कर ने कहा…

DHANYAWAAD TYAGI JI BLOG PAR ANE KE LIYE...
UMEED HAI AGE BHI HOSLA BADHATE REHOGE...........

संजय भास्कर ने कहा…

इस में भारतीय विदेशमंत्रालय का दोष तो है ही।

बेनामी ने कहा…

ये ब्लॉग तो अपनी लोकप्रियता की चरमसीमा चूता लग रहा है.. राम तुमको बहुत बहुत बधाइयाँ.

ऊपर काफी सज्जनों ने किसी न किसी का दोष उजागर किया है. में तो भाई ये ही बोलूँगा के दोष तो हमारा अपना भी है. हम ही इस जटिल प्रक्रिया के लिए जिम्मेवार हैं.

अब देखो राम ने बात करी बिज़नस वीसा की. तो भाई, हम में से कितने लोग हैं जो के बिज़नस वीसा ले करा अमेरिका या यूरोपे जाते हैं पर बिज़नस ख़तम होने के बाद वापस नहीं आते हैं. तो इसी कारन से हमें वीसा अफसरों को ये तसल्ली दिलानी पड़ती है के भाई हम सीधे सचे इंसान हैं. बिज़नस करेंगे, बिज़नस ख़तम होने के बाद अपनी जन्मभूमि वापस आ जायेंगे. उस तसल्ली के लिए १ मन कागज पत्री देनी पड़ती है.

चलो जो है सो है, अब हम तो येही दुया करेंगे के आपका कनाडा का वीसा जल्दी से जल्दी लगे और हमें भी लड्डू खाने का मौका मिले.

-- भवदीप सिंह

राम त्यागी ने कहा…

भवदीप, बॉस आपका उत्साहवर्धन मेरा संबल है !

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

main thoda bahut vishwas is baat par rakhti hu ki kalam me bahut takat hoti hai...so tyagi ji aap kalam ke sipahi to hain hi...apni kalam ki dhaar tez kariye aur itni tez ki videsh mantralye ki ghantiya baz uthe. ho sakta he un ghantiyo se uthne wali awaz ka fayeda apko na mile lekin apke peechhe aane wale apke sathiyo ko shayed mil jaye.
keep writing.
thanks a lot to come on my blog.

राम त्यागी ने कहा…

Thanks Anamika jee. You are right about the power of 'kalam' ... Will keep on escalating this issue...definitely would need your help....

Posted from iPhone esliye Hindi use nahi ki

shikha varshney ने कहा…

इस दर्द से तो हम भी रूबरू हैं ..पर दवा या इलाज़ अभी तक इजाद नहीं हुआ :).