हिंदी - हमारी मातृ-भाषा, हमारी पहचान

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए अपना योगदान दें ! ये हमारे अस्तित्व की प्रतीक और हमारी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है !

सोमवार, 31 मई 2010

मैं कहाँ पर हूँ ...

शिकागो   --->   डोर काउंटी    --->   शिकागो     --->    टोरोंटो
२७/28 मई          २८/२९/३० मई         ३०/३१ मई             आज

कंप्यूटर को आज जाकर छुआ है,  दिनचर्या बहुत व्यस्त हो गयी है. बस पैकिंग, अनपैकिंग, ड्राइविंग और फ्लाईंग ने सब कुछ अस्त व्यस्त कर दिया है.  डोर काउंटी प्राकृतिक सुन्दरता से भरा स्थल है,  वहाँ जाकर बहुत तारो ताजा अनुभव करता हूँ, लग रहा है उसके बारे में एक बड़ी सी पोस्ट लिखनी पड़ेगी.  मिशिगन झील की विशालता ने सबको अपने जादू में समेट रखा है.  कहीं सूर्यास्त का इन्तजार करते लोग तो कही पार्क में hiking और biking करते लोग. 
कुछ जगह जहाँ पानी की तरंगे बार बार नहीं आती उधर पानी में काई लग जाती है और लोग उस पानी में पैर तक नहीं डालना चाहते, यही मैंने सोचा की अगर ब्लॉग पर विचार बहेंगे नहीं तो इसमें भी सूखा पन आ जाएगा.
इसलिए सोचा की जल्दी में थोडा सा अपडेट डाल दूं.


बाकी कुछ देर में... 
डिनर के लिए कोई अच्छी सी जगह भी देखना है .....

बुधवार, 26 मई 2010

समीर जी की उड़न तस्तरी में उड़ेगा चम्बल का युवा

टोरोंटो जाने का वैसे कोई उत्साह नहीं है पर एक कारण है जिसकी वजह से मन में उल्लास है, मैं  जिनका हिंदी ब्लॉग्गिंग में कायल हूँ, उनसे मुलाकात होने की संभावना है. समीर जी किसी परिचय के मोहताज नहीं है हिंदी ब्लॉग जगत के लिए.

वैसे अच्छा ब्लॉगर बनने के कुछ गुर उन्होंने दिए थे अभी अपनी एक पोस्ट में  पर मैंने सोचा की चलो फेस टू फेस ज्ञान लिया जाए.  एक और छोटी सी ब्लॉगर मीट, कुछ गप्पें, और रचनात्मक बातें और बहुत कुछ ...देखते हैं क्या क्या होता है.  भाई लोंगों उड़न तस्तरी में बैठने से पहले कुछ सावधानियां ? या कुछ तैयारी की जरूरत ? जैसे अंतरिक्ष पर जाने से पहले लोग करते है.  अगला सप्ताह यात्राओं से भरा है, और मुझे लग रहा है की जैसे ही उड़न तस्तरी पर सवार होऊंगा , सब थकान दूर हो जायेगी.




वैसे एक समीर चालीसा लिखा है अभी अभी सरस्वती कंठ से निकला है ...

जय समीर हम मिलजुल गायें
देखो जिधर उन्हें ही पायें    ***हर ब्लॉग पर
अन्तर्यामी ये कहलायें
हर ब्लॉगर के ब्लॉग पे जायें
जय समीर हम मिलजुल गायें  ...

उड़न तस्तरी पर बैठाये
अपने ब्लॉग से नयी नयी ये सैर करायें
मस्त मौला से ये कहलायें
खूब मौज ये हमें करायें
जय समीर हम मिलजुल गायें

बज्ज़ पर भी ये बहुत बजियायें
टिप्पणियों की लाइन लगायें
ब्लॉग जगत में ऐसे छाये
अच्छे अच्छे भी गरियायें
जय समीर हम मिलजुल गायें

मंगलवार, 25 मई 2010

मेरे तट पर आते रहते है ज्वार भाटे ....

जीवन की राह भी कैसी कैसी पगडंडियों से गुजरती है  - कभी धुप तो कभी छाँव. कभी इतने काम कि फुरसत न मिले ब्लॉग लिखने की भी.  आज सुबह से शाम तक बहुत व्यस्त रहा और ब्लॉग लिखने या पड़ने का कतई समय नहीं मिला.  अभी लग रहा है कि बहुत कुछ है अधूरा !!

कुछ दिन पहले एक लेख भारत के पासपोर्ट के बारे में लिखा था.  आज कनाडा का वीजा  मिल गया है...ऐसा समाचार मिला, शायद उन लोगों ने मेरी पोस्ट पढ़ ली होगी इसलिए इतनी जल्दी वीजा दे दिया.  लेकिन इस न्यूज़ ने तो और भी व्यस्त कर दिया,  कनाडा से अमेरिका लौटने के लिए मेरे पासपोर्ट पर अमेरिका के वीजा की स्टंप होना जरूरी है , इसलिए कनाडा के किसी शहर के अमेरिकेन कांसुलेट में जाना पड़ेगा.  हमें तो यात्रा हर सप्ताह करनी थी, इधर पता चला कि सबसे पहली तारीख वीजा स्टंप के लिए जून २९ मिल रही है यानी लौटना संभव होगा एक माह के बाद. 

फिर क्या टेंशन शुरू...कौन जाएगा इस तरह से और कौन रुकेगा एक महीने दूर परिवार से.  पर फिर ऑफिस वालों ने सारे कनाडा के अमेरिकेन कांसुलेट पर retry  मार मार कर Montreal में अगले सप्ताह की तारीख ढूंढ ही डाली.  अब देखिये ऑफिस का काम है टोरोंटो में, गुरुवार को जाना पड़ेगा Montreal ...कितना गरीब की जान लेंगे ये लोग, वो तो शुक्र है हवाई जहाज बनाने वालों और चलाने वालों का !

समीर जी से मिलने का भी मन है, देखो पहले इस चक्रव्यूह से तो निकलूँ.  तारीख पक्की हो गयी है तो अब कागज़ भरने में व्यस्त.  सारी जिंदगी डर डर के जीने वालों और हर मोड़ पर समझौते करके पुलिस केस से दूर रहने वालों का ये हाल है !! दायूद अब्रहीम तो बेचारा और भी परेशान होता होगा :)  बहुत झंझट है भाई ये वीजा सिजा के ...क्यों न सब छोड़ मस्ती से गाँव में वापस रहने लगूं ....पर जीवन इसी का नाम है ..परेशानी कहाँ नहीं होगीं ..ऐसी दार्शनिक और समझौते वाली सोच हमें जिंदगी की पटरी पर ऐसे ही दौडाती रहेगी.

इतनी व्यस्तता और प्रोडक्टिविटी जीरो.

खैर कुछ अच्छी बातें भी हुई.  निकुंज के स्कूल का फील्ड डे था तो थोडा हम भी सेवा करने चले गए ..वोलंटियर गिरी करने !!  पर बहुत मजा आया, ९० डिग्री F में बच्चे मासूम और कर्मठ लग रहे थे.  कुल मिलकर बाहर स्कूल के पीछे वाले मैदान पर २१-२२ बूथ बनाये गए थे, हर बूथ पर एक विशेष खेल हर समूह को खिलाना था.  (चित्र में थके हुए बाल गोपाल )

मेरी ड्यूटी थी बूथ नंबर ६ पर , जहां पर दो विशाल गेंदे थी और उनके साथ बच्चो को ज़रा कुछ रोमांच कराना था.   इस तरह के हर बूथ पर हर समूह को खेलना था, मतलब हर बच्चे को २०-२२ गेम खेलने थे.  हर कुछ मिनट में एक घंटी बजती और बच्चे अपनी पानी की बोतल उठा दूसरे बूथ की तरफ दौड़ पड़ते. थके हारे मासूम जवानों का जोश फिर भी देखने लायक था.
(चित्र में बूथ # ६ और गेंद को फेंकते बच्चे )
PTA (Parents Teachers Association ) की तरफ से ये आयोजन था और आयोजको ने बहुत ही क्रमबद्ध तरीके से सब कुछ आयोजित किया हुआ था. मेरे लिए  यह एक बहुत ही सुखद अनुभव था पर अंत तक में भी धूप सहन नहीं कर पा रहा था, अरे भाई ये क्या हुआ ...फिर इंडिया में क्या होगा ...उधर तो इतनी गर्मी है इस साल.  एक ठंडा ठंडा पेप्सी पीया थोडा टेंटुआ शांत करने को. 



सूरज की गर्मी से तपते हुए तन को मिल जाए तरुवर ....अरे नहीं ...ऐसी (AC ) की छाया

इसका आभास हुआ जब पता चला कल कि कार का AC काम नहीं कर रहा,  वैसे भी बेचारा ९ महीने के उपवास के बाद कल खोला गया था.  कैसी जिंदगी है ये, ठण्ड में गर्मी और गर्मी में ठंडा चाहिए अब.   लपट नहीं चलती इधर ...नहीं तो AC भी फ़ैल हो जाएगा.




गर्मी आई है तो ये मजे भी हो जायें

गर्मी से ऐसे हुए हम सभी बेहाल 
पसीने को पौंछ पौंछ गीला हुआ रुमाल
कूलर की भौं भौं से सर हुआ हलाल
नौता खाने जा नहीं पाते अब तो चुन्नीलाल
पानी की किल्लत से हर कोई हुआ हलाल
नहाने से बच्चों को अब कुछ नहीं मलाल
ठंडक को तरसें अब तो हर पक्षी डाल डाल

और अंत में हमारे ब्लॉग समूह के मानसिक हलचल वाले ज्ञान दत्त जी के स्वास्थ्य लाभ के लिए ईश्वर से शुभकामनायें.

सोमवार, 24 मई 2010

संगीत की कोई भाषा नहीं...फोटो कुछ लम्हों के...



निकुंज की टेनिस क्लास हर शनिवार को सुबह ८:३० बजे होती है. जिस अथलेटिक केंद्र में कक्षा है, उसी के पास दो भारतीय मंदिर भी हैं. तो लौटते वक्त कभी दोनों में या कभी किसी एक मंदिर में दर्शन के लिए चले जाते है.  इसी क्रम में इस शनिवार को  जाना हुआ साईं बाबा मंदिर में.  हम इस मंदिर में पिछले ५ सालो से लगातार जा रहे हैं.


दूसरा मंदिर है बालाजी (श्री वेंकटेश्वर बालाजी)   का,  श्रद्धालुओं की भीड़ के हिसाब से ज्यादा बड़ा और प्रसिद्ध है,  उसका कारण है शनिवार और इतवार को वहां की रसोई.  ५ डॉलर में बढ़िया डोसा साम्भर  मसाले वाला गरम गरम, ३.५० डॉलर में २ इडली या वडा साम्भर के साथ, ५० सेंट में चाय या आम की लस्सी...मेनू भी बढ़िया है और भोजन का स्वाद भी.  बालाजी का ये मंदिर काफी बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है.  दिवाली पर बहुत बड़े स्तर पर फायर वर्क्स का आयोजन भी होता है और इसमें बहुत बड़ी तादाद में देसी लोग जमा होते है.   हम लोग भी बाकी लोंगों की तरह यहाँ तभी जाते है जब डोसा खाना होता है  :)  हाँ दिवाली पर बच्चों को ले जाना नहीं भूलते, हम भी उनके साथ कुछ फुलझड़ियाँ जला लेते हैं.

साईं बाबा के मंदिर में इन ५ सालों में बहुत परिवर्तन आया है, पहले ये मंदिर एक छोटे से भवन में था पर अभी सभी के सहयोग से एक विशाल मंदिर बन गया है और सामने पार्किंग के लिए भी काफी जगह है.  कुछ साल पहले हमने इसके बड़े से बेसमेंट में एक जन्मदिन भी मनाया था.

शनिवार को जैसे ही मंदिर में प्रवेश किया,  कुछ संगीत चल रहा था,  ज्यादा अर्थ समझ में नहीं आ रहा था क्योंकि ये मराठी में था, पर अवश्य ही मन को बहुत शांति मिल रही थी.  बस ऐसा लग रहा था की खूब देर तक बैठे रहे वहीं पर. 

इसी तरह का अनुभव होता है जब हम गुरुद्वारा जाते हैं, पूरा अर्थ गुरुवाणी का समझ नहीं पाते पर जो भी कानों से आता है वो दिल और दिमाग तक जाता है और सुकून देता है,  एक बार सुनने बैठो तो बस उठने का मन नहीं करता.  ज्यादा स्पीड वाला संगीत किसी भी भाषा का हो क्षणिक ही ठीक लगता है जबकि मंदिरों और गुरुद्वारों में बजने वाला संगीत या फिर कोई भजन हो या फिर कोई पुरानी फिल्म का गाना हो, बस मंत्रमुग्ध कर देता है.

चलते चलते बात कुछ फोटों की...

शनिवार, 22 मई 2010

मंगलौर दुर्घटना के मृतकों को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजली !!

Air India के विमान Boeing 737-800 की दुर्घटना में असमय मौत का शिकार हुए सभी यात्रियों को "मेरी आवाज" की तरफ से श्रद्धांजली  !!
ईश्वर इनकी आत्मा को शांति प्रदान करे !!

शुक्रवार, 21 मई 2010

गुरुओं से भी सावधान होना पड़ेगा क्या ?

मेरे देश में एक प्रचलन बहुत तेजी से फैल रहा है,  गुरु बनाने का.  हर किसी ने किसी न किसी आश्रम या कहना चाहिए आलीशान आश्रम में रह रहे गुरु को अपना मार्गदर्शक बना रखा है.  इन गुरुदेवों का नेटवर्क बहुत अच्छा होता है,  और इनका मैनेजमेंट का तरीका भी अव्वल होता है, कहना चाहिए कि लीडरशिप की सारे गुण होते हैं इनमें.  लोगों कि श्रद्धा इतनी होती है कि मैने कई घरों को इस वजह से टूटते हुए देखा है.  कोई अपने भाई को छोड़ चुका है तो कोई बूढ़े माँ बाप को.  संयुक्त परिवार को छोड़ एकल परिवार में  रह रहे लोंगों के लिए तो जैसे गुरु जी का ठिकाना ही सब कुछ होकर रह जाता है.

वैसे भी हिन्दू धर्म में गुरु को ज्ञान का श्रोत और ईश्वर से भी उत्तम स्थान दिया गया है क्यूंकि अगर गुरु ही ना होंगे तो रास्ता कैसे दिखेगा, इसलिए गुरु का स्थान जो आपको तरीका बताता है हर चीज को पाने का, बहुत अव्वल रखा गया है, जैसा कि बुजुर्गों ने कहा है -

गुरु गोविन्द दोनों खड़े, का के लागौ पाव । बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो बताय ।।

यहाँ गुरु को समस्त बुराइयों से छुटकारा देने वाला बताया गया है -

गुरु मिला तब जानिये, मिटै मोह तन ताप । हरष शोष व्यापे नहीं, तब गुरु आपे आप ॥
यह तन विषय की बेलरी, गुरु अमृत की खान । सीस दिये जो गुरु मिलै, तो भी सस्ता जान ॥

गुरु कीजिए जानि के, पानी पीजै छानि । बिना विचारे गुरु करे, परे चौरासी खानि ॥

लोग इन दोहों को पढ़कर बहुत भावक रहते है, और अर्थ का अनर्थ हो जाता है जब वो आधुनिक गुरुओं के शरण में जाते है. मेरे हिसाब से, जबसे संयुक्त परिवार टूटने शुरू हुए, लोग बहुत अकेले रहने लगे और उनको किसी साथी या मार्गदर्शक कि जरूरत होने लगी. पहले संयक्त परिवार में ये काम घर के बुजुर्ग, बड़े भाई या पिता किया करते थे, पर अब उनके साथ रहना नहीं है क्यूंकि वो एक बोझ लगने लगते है.  इसी एकाकीपन का फायदा इन तथाकतित गुरुओं ने लिया है,   वो आपके मन की बात कहते है, अपने नेटवर्क के जरिये आपके एक दो काम भी बनवा देते हैं और आपको गुरु भाइयों के साथ एक सामाजिक वातावरण भी मिल जाता है उठाने बैठने का.

सामाजिक वातावरण और सलाह लेने तक सब कुछ सीमित रहे तो सब कुछ ठीक है पर यही सब कुछ अगर किसी का घर तोड़े या फिर ऊपर लिखे गुरु के आदर्शो के विपरीत हो तो कुछ गुरुओं की वजह से गुरु शब्द पर एक प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है.  जैसे एक मछली पूरे तालाब को गन्दा कर देती है वैसे ही कुछ धंधे बाज गुरु और साधुओं की वजह से पूरे समाज के इन आदर्शो का नाम खराब हो रहा है.

पता नहीं लोग कितना मुझसे सहमत होंगे पर मैंने कई ऐसे गुरुओं को एक छोटे से मंदिर की कुटिया से बड़े महलों का , आलीशान कारों का मालिक बनते देखा है, उनके लिए फिर सुविधाओं में जीना ही सब कुछ हो जता है.  और उनके लिए खुद का नाम और अहम् , धर्म से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते है.  उनकी  हर चीज फिर पैसे में बिकती है, चाहे पूजा हो या फिर आशीर्वाद.

जैसे कि मैंने देखा है कि लोगों के लिए ये गुरु परिवार से और माँ बाप से भी सर्वोपरी हो जाते है,  पर शाश्त्रो में तो ये भी लिखा है कि
जननी जन्मभूमिस्च स्वर्गादपि गरीयसी

सारांश ये है कि हम शाश्त्रो की इन  सूक्तियों का भावार्थ  अपने तर्क और स्वार्थ के अनुसार निकाल लेते है और वही करते है जिससे खुद का उल्लू सीधा हो रहा है पर ये भूल जाते हैं कि जिन लोगों के साथ हम है क्या वो वास्तव में मार्ग दिखने लायक है या सिर्फ वो भी धंधे बाज है. 

गुरुवार, 20 मई 2010

भोपाल गैस त्रासदी || नम आँखें तरसती न्याय को ...

 दिसम्बर २-३ की रात और १९८४ का साल - क्या कोई भूल पायेगा ? बहुत ही गंभीर और दिल दहला देने वाली ये वीभत्स घटना पता नहीं कितनों  के घर और जिंदगी उजाड़ गयी.  कुछ वहीं  धरासायी हो गए और कुछ जीवन भर के लिए खराब/अपंग और कुछ को वंशानुगत बीमारी का अभिशाप मिला.  अधिकारिक आंकड़ो के अनुसार ५००० से १५००० लोंगों म्रत्यु के शिकार हुये और इससे कहीं अधिक कभी ठीक न होने वाले बीमारी, अंधेपन और लाचारी के शिकार हुये. खतरनाक विषैली गैस methyl isocyanate के रिसाव की वजह से लगभग ५० हजार से ज्यादा भोपाली लोग प्रभावित हुये.  मुझे नहीं लगता की आजादी के बाद के भारत में ऐसी कोई ओद्योगिक त्रासदी हुई होगी.


सरकार और उस समय के कांग्रेसी मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह इतने कद्दावर नेता होते हुये भी उस समय और बाद में लोंगों को कुछ  भी न्याय नहीं दिला पाये. वो खुद भोपाल से उस दिन दूर भाग गए और ये भी भूल गए की वो प्रदेश के मुखिया है. और फिर तो ये सिलसिला लगभग २५ साल से ज्यादा चलता रहा, कोई उन हजारो लोंगों का सहायक न बना जिनकी जिंदगी और घर दोनों इस त्रासदी ने अपने राक्षसी संहार में समा लिए.  बर्बादी शब्द जैसे इस दिन के लिए ही रचा गया हो.  लोंगों की जानें और जिंदगी गयी, कुछ आश बची थी  वो भी ज्यादा दिन नहीं चली और उसका अनेक कारणों में से कुछ  कारण थे - "न्याय की लम्बी लड़ाई, भ्रष्टाचार की दर बदर ठोकरें ,  और नेताओ की सोची समझी अनभिज्ञता और अकर्मण्यता"

सुनाने में आया है की लगभग ४०० टन विषैली गैस को इस त्रासदी के बाद वहीँ दफना दिया गया था और वो अभी भी आसपास का पर्यावरण खराब कर रही है. प्रदूषित हवा तो शायद अब ना रही पर पानी अभी भी प्रदूषित है और इसकी वजह से अनेको बीमारियाँ फैल रही है.

ये कारखाना था यूनियन कार्बाइड का जो की अब डाऊ केमिकल के नाम से जाना जाता है,  अमेरिका की जानी मानी कंपनी है, मुझे नहीं लगता की इस पर कोई असर हुआ या इसकी क्रेडिट पर कोई असर हुआ.  पश्चिम के देश पर्यावरण पर तीसरी दुनिया के देशो को हमेशा भाषण देते रहते हैं पर जमीनी हकीकत कुछ और ही है.  अगर ये हादसा अमेरिका या यूरोप में होता तो शायद ये कंपनी आज बिज़नस में नहीं होती, पर "हू केयर्स अबाउट पूअर्स एंड थर्ड वर्ल्ड"

वारेन एन्डरसन जो उस समय CEO था,  ७ दिसम्बर १९८४ को मध्यप्रदेश सरकार ने  इन महाशय को गिरफ्तार भी किया पर ये जमानत पर ऐसे छूटे की फिर कभी भारत लौटने का नाम नहीं लिया और अमेरिका में तो इनका कोई बाल भी बांका नहीं कर पाया.  अभी अमेरिका में इनके पास कई घर है और शानो शौकत से बिना किसी रोकटोक के मस्त जीवन जी रहे है.  अर्जुन सिंह और उनकी फॅमिली भी मस्त जीवन जी रहे है और राहुल लाला अमेठी में विदेशी मेहमानों के साथ व्यस्त है.  लोग अभी भी इस अभिशाप से झूझ रहे है.  ये एक चक्रव्यूह है जिसमें से निकलना असंभव है, रोगों की इस रिकर्सिव श्रंखला में भोपाल के ये अभिशप्त  लोग तड़प तड़प कर हर दिन इश्वर से उस दिन को भूलने और न्याय पाने की गुहार कर रहे है. 

नेताओ की बात न करें तो बेहतर होगा पर इनके बिना बात भी तो पूरी नहीं होती, कांग्रेस और BJP के नेता इस त्रासदी की आड़ में अपनी अपनी राजनीतिक रोटियां सेकंते रहे,  संवेदना विहीन और स्वार्थी , कथित महान राजनीतिज्ञों ने अपने लिए महल बनवाये और गरीब न्याय की आस में रोता रहा, यहाँ तक की मुआवजे की राशि को डकारने में भी ये लोग सकुचे नहीं.  प्रभावित लोंगों को ना तो पुनः रोजगार मिला और न ही उनके हक का पैसा.  मिली तो बस दर दर भटकने और न्याय माँगने की सजा. 

ये फैक्ट्री १९६९ में भोपाल में स्थापित हुई और तब ५१ प्रतिशत यूनियन कार्बाइड का हिस्सा था और ४९ प्रतिशत भारतीय निवेशको का हिस्सा था.  इसने रोजगार भी प्रदान किये पर आंकड़ो और इसके इतिहास को देखें तो नहीं लगता की कभी भी ये कंपनी पर्यावरण के प्रति जागरूक थी

विकिपीडिया के अनुसार :
  • १९७६ में इसके प्रदूषण की वजह से दो ट्रेड यूनियन ने अपनी प्रतिक्तिया जाहिर की
  • १९८१ में एक कार्मिक जहरीली गैस का शिकार बना
  • १९८२ में भी कुछ २५ लोंगों को संक्रमण की वजह से अस्पताल में भर्ती किया गया
  • १९८२-८३-८४ में कई गैस रिसने की छोटी मोती घटनाएं हुई
समय रहते सावधानी नहीं बरती गयी,  १०० प्रतिशत लापरवाही का नतीजा थी ये दर्दनाक बीभत्स दारुण घटना.

२६ साल गिनने में भले ही आ जायें पर क्या असहनीय दर्द और असीमित पीड़ा सहकर भी जीने वाले लोंगों के लिए भी ये २६ बर्ष ही होंगे ?   ये अभिशाप पता नहीं कब टलेगा....हालांकि जून ७ को एक स्थानीय अदालत इस बारे में अपना फैसला सुनाने जा रही है.  जैसा की बोलते है की देर है पर अंधेर नहीं ...पर इतनी देर कि कोई इस शूक्ति के अर्थ पर विश्वास ही न करे.  केसुब महेंद्र, विजय गोखले, किशोर कामदार, ज मुकुंद, एस. पी. चौधरी, के वी शेट्टी आदि को कटघरे में खड़ा किया जाएगा पर क्या वारेन एन्डरसन को भी सजा मिलेगी ?  जब लाभ कमाने के एवज में बोनस मिलता है तो लापरवाही की सजा भी तो मिलनी चाहिए और ये तो ऐसी लापरवाही कि शब्द भी इस नर संहार को परिभाषित करने में शर्म महसूस करेंगे.


मेरी आँखे नम हैं, दिल में अजीब सा दर्द है और अंतर्द्वंद कई दिन और सालों से ...उंगलिया लिखती ही जायेंगी पर फिर भी उनका दर्द बयां नहीं कर पाएंगी.

फोटोग्राफर समीर जोधा कहते है की "हम सिर्फ इसलिए भोपाल त्रासदी को नहीं भूल सकते क्यूंकि ये गरीब के साथ घटी"  ..समीर जी BBC के एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे जो की इस त्रासदी के ऊपर केन्द्रित था.  उनके अनुसार उस टाइम मीडिया का उतना सक्रिय न होना भी एक कारण था की ये घटना विश्व के सामने सही प्रभावशाली तरीके से नहीं आ सकी. पर आज कि हमारी अतिसक्रिय मीडिया क्या कुछ कर रही है इस बारे में ?

कैसे दर्द को झेला होगा अनगिनत को गिनते गिनते
आंसू भी कम पड़ गए होंगे शब्दों की तो बात क्या
कहीं पालनहार न रहा तो कहीं बुझ गयी मासूम किलकारी
कोई जिन्दा तो रहा पर मरने से भी बदतर रहा
गरीबी में ही क्यों होता आटा गीला
शायद भगवान् से भी गलती हो गयी


कुछ विडियो जो की दिल दहला दें मेरा, विस्वास है की न्याय करने वालो ने भी महसूस किये होंगे संवेदना और दर्द के अहसास ..









 
 
- राम त्यागी
 
आवश्यक सूचना - चित्र और कुछ सामग्री गूगल, विकिपीडिया और रीडिफ़ वेबसाइट से ली गयी है.

मंगलवार, 18 मई 2010

विचार धारा ...

आदमी काम की अधिकता से नहीं वरन उसे भार समझकर अनियमित रूप से करने पर थकता है - श्रीराम शर्मा आचार्य

पापाजी गायत्री परिवार के सदस्य है और पिछली बार कुछ स्टीकर यहाँ भी लगा गए थे. उनमें से ही एक पर उपरोक्त अनमोल विचार लिखा है. बहुत काम आता है मेरे .

 आज सोने से पहले सुनता हूँ ये...




मन के भावों को उड़ेल दूं इधर ...
कल की सुबह फिर एक नयी सुबह
सूरज भी उगेगा फिर से कल की सुबह
पक्षी भी चहकेंगे  फिर से कल की सुबह
मेरी आशा बल देगी कर्म का फिर से कल की सुबह
हम होंगे कामयाब फिर से कल की सुबह ....

एक और जद्दोजहद ....
मेमोरिअल डे का लॉन्ग सप्ताहांत आ रहा है. कही घर से बाहर तो निकलना है जरूर. देखना है कोई बढ़िया सा स्थल गर्मियों की शुरुआत का...कल की सुबह ये भी होगा एजेंडा में.
कही नहीं तो फिर डोर  काउंटी :)


सोते सोते
  •  अभी समाचार आ रहा है की नक्सलियों  ने पश्चिम  बंगाल और उड़ीसा में फिर कुछ कर दिया ...कल से अब तक मन का  द्वन्द समाप्त नहीं हुआ था और फिर से ...सरकार का ज्यादा सोना ठीक नहीं !!
  • भोपाल गैस त्रासदी के मुकदमे का फैसला होना है जून ७ को (शायद) .  अनगिनत साल ही कहूँगा ...न्याय में इतनी देर क्यों ?  क्या सच्चे दोषियों को सजा मिलेगी ?
  • अजलन साह हौकी प्रतियोगिता की जानकारी की जिज्ञासा है, ये जानकारी तो भवदीप भाई ही देंगे कल ....इसी आश में :) ..यार भवदीप बेनामी की जगह लोगिन करो या नाम डाल दो...बेनामी अजीब सा संबोधन लगता है.

अंतर्द्वंद - कुछ चीजें पसंद नहीं आ रहीं ?

अंतर्द्वंद
कुछ चीजें पसंद नहीं आ रहीं आजकल, या फिर मेरे  सोचने के मुताबिक नहीं हो रही हैं. 

नक्सली समस्या
नक्सल से निबटने के सरकार का तरीका समझ नहीं आ रहा. चिदंबरम एक जाने माने सुलझे हुए लीडर लगते हैं, पर क्यों फिर बार बार CRPF और आम आदमी नक्सल हिंसा की आग में बुरी तरह जल रहा है  ?

ब्लॉग्गिंग के गुट
वैसे ये स्वाभाविक प्रवृत्ति का नतीजा है,  जिनको आलस में कुछ लिखना नहीं या सोचना नहीं, वो इस तरह की मानसिक प्रवृत्ति की तरफ झुकते है.  और वैसे भी चाहे कोई ऑफिस हो या दल, देश हो या विदेश - भले और बुरे का साथ तो रहता ही है.  धुप के बिना छाँव का मजा ही क्या.
अनुराग शर्मा  जी का उल्लेख उल्लेख विशेष श्रेणी में इसलिए की वो  कुछ अलग और ज्ञानवर्धक लिख रहे हैं. 

राहुल गाँधी
राहुल का कभी मिलबैंड और कभी बिल गेट्स को अमेठी की सैर कराके गरीब लोंगों को सर्कस की भांति दिखाना अजीब लगता है. विकास पर ध्यान दें तो अपने आप लोग आयेंगे जैसे बंगलोरे और हैदराबाद जाते हैं.  भीख के लिए किसी अमीर को बुलाना कौन सा स्वाभिमान है . पहले भी राहुल के बारे में लिखा है,  नीचे लिखी दो लिंक देखी जा सकती है -

राहुल गाँधी का सर्कस
कलावती को भूले राहुल लाला

कोई दुश्मनी नहीं है इनसे पर जिस हिसाब से लिबर्टी इनको मिली है, उम्मीदें ज्यादा हैं और ये लीपापोती करते दिखते है.

मेरे ब्लॉग का Template
 ठीक नहीं लगता पर समय का अभाव या आलस...इनकी वजह से जस का तस पडा है.

यूरोप की अर्थव्यवस्था
अब ये तो हद ही हो गयी मेरे सोचने की. पर मेरे जैसे कई लोंगों का पोर्टफोलियो ख़राब कर रखा है मार्केट में इस संकट ने.


अंतर्द्वंद के क्षणों के कुछ भाव इधर बिखेर रहा हूँ ....
ज्वार भाटे आते रहते हैं मेरे तट पर
विचार उद्वेलित होते रहते है मेरे मन पर
लोग आते रहते है मेरे ब्लॉग पर
जैसे चिड़ियों की चहचहाहट हो खेत पर
रहंट की कलकल ध्वनि हो कुएं पर
घंठो की करतल हो जैसे बाग़ के मंदिर पर
भजनों की धुन जैसे माता के द्वार पर



सोमवार, 17 मई 2010

शिकागो की एक सैर मेरे साथ - एक दिन में ...

सागर किनारे दिल ये पुकारे , तू जो नहीं तो मेरा कोई नहीं है .....

ऐसा ही कुछ नजारा था जब शुक्रवार को हम शिकागो के मिशिगन झील किनारे नोर्थ एवेन्यू बीच पर थे. गये तो थे शिकागो की गलियों में घूमने और घूमते घूमते जा पहुंचे मिशिगन झील के किनारे पर.  नीला आसमान और दूर दूर तक फैला असीमित नीला जल श्रोत.  प्राकृतिक और ईश्वरीय कृति से अलौकिक क्या कुछ हो सकता है ?

विकिपीडिया के अनुसार -

"लेक मिशिगन अमरीका की सबसे बड़ी झीलों में से एक है। इसकी सीमाएँ अमरीका के चार प्रांतों इलिनाय, इंडियाना, विस्कांसिन एवं मिशिगन से लगती हैं। मिशिगन शब्द आरंभ में इसी झील के लिए किया जाता था जो ओजीबे भाषा का शब्द है जिसका मतलब होता है 'बहुत सारा पानी'। यह झील क्रोएशिया देश की भौगोलिक क्षेत्र से थोड़ा बड़ा है।"

शिकागो के और बाकी बीच के बारे में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.


शुरुआत सुबह ९ बजे घर से की,  हम शिकागो से लगभग ४० मील की दूरी पर रहते है और यहाँ से हम शिकागो या तो कार से सड़क के जरिये जा सकते है या फिर सबसे बढ़िया ट्रेन  के जरिये, सबसे बढ़िया इसलिए क्यूंकि फिर न तो पार्किंग का झंझट और न ही ट्राफिक जाम की चिंता.   अपने अपने धुप के चश्मे और हलकी से जाकेट पहनकर पहुँच गए हम परिवार सहित ट्रेन स्टेशन पर.  बच्चो को वैसे भी कार में बोरियत फील होती है और ट्रेन के नाम से दोनों ही बहुत उत्सुक थे.   ९ बजे के बाद की ट्रेन ली इसलिए एक्सप्रेस तो नहीं मिलेगी,  वरना हम ४० मिनट में ही शिकागो में होते,  अब हर स्टेशन पर रुकने वाली लोकल ट्रेन हमें वही दूरी लगभग १ घंटे और ३० मिनट में तय करा पायेगी. पर बच्चो को तो इससे और भी मजा आएगा, यही तो हमारा उद्देश्य है.

ये हमें यूनियन स्टेशन पर उतारेगी जो शहर का मुख्य स्टेशन है.  बहुत बड़ा स्टेशन है, नीचे का तल ट्रेन की पटरियों और platforms से पटा पड़ा है , उसके ऊपर फ़ूड कोर्ट बगैरा है, तीसरे माले पर निकलो तो आप शहर की सड़क पर होते है और आसपास कई  गगनचुम्बी इमारतें और शिकागो नदी के सुन्दर द्रश्य को देखते हो.  शिकागो नदी के पश्चिम में बना ये स्टेशन एडम्स और जैक्सन गलियों के बीच स्थित है. 


यही से कुछ कदमो की दूरी पर मशहूर गगनचुम्बी इमारत Sears Tower है.  अब इसका नाम Willis Tower हो गया है.  ये १४५१ फीट ऊँचा है और इसमें कुल १०८ माले है.  १९७३ में जब ये बना था, तब ये दुनिया की सबसे ऊँची ईमारत थी, ऐसा शायद १९९८ तक रहा. अभी इसका रैंक दुनिया में नंबर पांच है.

कुछ ही दूर पर तुलिप के कुछ फूल लगे देखे तो इनकी फोटो ले ली. बायीं तरफ के तो नदी पार करते ही एक बिल्डिंग के पास के है और दायीं तरफ वाले जॉन हनकौक इमारत के सामने बनी चर्च के पार्क से लिए है.

कुछ काम था शहर में Lasalle  स्ट्रीट पर, उसको निबटाकर पैदल पैदल शहर नापते नापते निकुंज को MacD की याद आई तो फिर वही ये फोटो ले ली, इसके पीछे हार्ड रॉक कैफे का फोटो नजर आ रहा है.   शहर के उत्तरी दिशा में स्थित ये Rock N Roll McDonald's  पूरी दुनिया भर में प्रसिद्ध है. इसमें एक म्युसियम भी है...  इसके बारे में और पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कर सकते है.

इसके बाद हमने Magnificent Mile एरिया के तरफ अपने कदम बढाये...यहपर जॉन हनकौक ईमारत है जो की एक और गगनचुम्बी इमारत है शिकागो की.
ये मिशिगन एवेन्यू का ही एक हिस्सा है और यहाँ पर आपको हर बड़े ब्रांड का शो रूम दिखेगा और हर वर्ल्ड का बेहतरीन होटल और रेस्तरां भी इधर मिलेगा, कुल मिलकर पैसे वालो और फिल्मी सितारों के शौपिंग की जगह.  बड़े लोग बड़ी बातें ....हम तो ठहरे छोटे से दर्शनार्थी ...
 
यहाँ आकर लगेगा की गाँव की गुमटी और चिकागो की इन दुकानों में कितना जमीन आसमान का अन्तर है और ये भी की अगर आदमी जो है उसमें खुश न रहे तो इच्छायें असीमित होती जाती है और फिर वो कभी खुश नहीं रह पाता. इस दुनिया में हर चीज से अच्छी चीज मौजूद है इसलिए सीमा तय करना जरूरी है.  इस जगह के बारे में और पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें .  
 
चलते चलते जॉन हनकौक ईमारत का भी एक फोटो ले लिया. इसमें ६० मंजिलें है और यहाँ से शिकागो का जो व्यू दिखता है वो किसी और बिल्डिंग से नहीं.  मिशिगन झील का नजारा यहाँ से देखते ही बनता है.  इसके पास ही वाटर टावर प्लेस नाम की जगह है.  इस जगह पर ज्यादातर हमें टूरिस्ट ही नजर आये.

सामने ही एक चर्च थी, जिसमें हम लोंगों ने कुछ चहलकदमी की, फोटो लिए.  ऊपर लगी एक तुलिप की फोटो भी यही से ली थी.  निकुंज स्कूल में देखते देखते यहाँ की कब्स टीम का प्रशंसक  हो गया है, उसी टीम  के कपडे पहन कर शिकागो जाने की जिद पाल रखी थी और ठंडी हवा होने के बाबजूद भी जक्केट और पैंट पहनने को तैयार नहीं, अन्यथा उसकी ड्रेस नहीं दिखेगी लोंगों को ....:)  साथ में एक फोटो ले वही बने Fountain  की जिसमें लोग सिक्के डालकर विश करते है.  आधुनिक होने से इश्वर का विश्वास कम नहीं हो जाता, और यही emotional  विश्वास कभी कभी हमें ऐसे ऐसे काम कराता है.  इसे क्या अंधविस्वास कहूं ?

घूमते  घूमते सवारी Lake  shore  drive पार करके बीच पर पहुंचे,  कई फोटो ली वहां पर. लोग बोलते है की अमेरिका में सार्वजानिक पानी की जगह लोगों को कुत्ते की भाँती पानी पीना पड़ता है, इसलिए एक फोटो इस नल की भी ले ली.


 
बहुत टाइम बिताया मिशिगन किनारे, बच्चो ने कपडे भी गीले किये और मस्ती भी पूरी की ...सारी थकान जैसे रफू चक्कर हो गयी हो.  एक अजब से ताजगी आ गयी थी. शहर पीछे था और सामने थी विशाल प्रकृति की संरचना.  मुझे पता नहीं शहर की भागमभाग और चमकदमक क्यों अच्छी नहीं लगती. जो भी हो यहाँ तो फिर से आते रहेंगे.  २ साल पहले अपने परेंट्स को लेकर इधर आया था. तब यहाँ एक बहुत बड़ा एयर शो था जो हर साल गर्मियों में आयोजित होता है.
 
सामने विशाल झील
पीछे है एक वृहत शहर
कितने  भिन्न हैं  दोनों किनारे 
एक मस्ती का आभास कराये तो दूजा दे मन का आनंद
आसमान से झील को मिलते देखा
जैसे  विचारो को गति पकड़ते देखा
रेत कितना आनंद देता
शीशा बन फिर दर्द भी देता
बच्चे सपनों के घरोंदे बनाते
आकृति मिटाते , बनाते, खिलखिलाते
गीले  होकर मन ही मन सयाते
हम भी एक दो छींटे सहलाते
और विचारों की सौंधी हवा में खो जाते
जैसे सुबह की ओंस की बूंदे मुंझे जगा रही हो
जैसे जन्नत या सपनों की मनोहारी तरंगे हो
गद्य और पद्य लिखते, मिटाते और सोचते
अपनी  प्राणप्रिये को गले लगाते
जिनको घर पर देख स्वभावबस गुसियाते
रेत की गर्मी और टहलते दौड़ते लोग
नावों पर सवार उन्मुक्त मस्त परवाने लोग
हर तरफ आनंद और अंतहीन मस्ती में डूबे लोग
तरो ताजा मेरे मन को करते मेरे मन के संतुष्ट भाव
 
जगह ही ऐसी है की बस लिखता ही जाऊं ! पर घर भी जाना है और निकुंज को मिल्लेनियम पार्क भी. तो विचारो को यही विराम देकर पैरो को फिर से शिकागो की स्ट्रीट्स पर चलायमान करते है.
 
बीच में शिकागो Tribune की ईमारत भी देखी, निकुंज को बताया की देखो इस बिल्डिंग में कही न कही किसी कोने में इधर उधर किसी न किसी देश का पत्थर मिलेगा , जेर्मनी,  फ्रांस सब जगह के पत्थर दिखे और सबसे ज्यादा खुसी हुई ताजमहल का सफेद पत्थर देखकर.   बहुत ही सुन्दर ईमारत है ये.  ऊपर विकिपीडिया की लिंक में और भी जाना जा सकता है इस इमारत के बारे में.  Chicago Tribune यहाँ का बहुत बड़ा न्यूज़ पेपर है और इसके पत्रकार हर जगह से , विभिन्न देशो की मशहूर जगहों से निशानी के रूप में पत्थर लाते और वही छोटे छोटे पत्थर हर जगह इस इमारत के निचले हिस्से में लगाए गए है.  इसके दूसरे किनारे पर शिकागो नदी है और बहुत ही फोटोजनिक जगह है ये, चारो तरफ सुन्दर ऊँची ऊँची इमारतें और बीच में से विशाल बहती हुई नदी.

खैर ये सब करते करते और चलते चलते फिर से भूख लगी तो इस बार चिपोतले को निशाना बनाया. बढ़िया सा मिर्ची वाला खाना खाया.  उसके बाद सामने ही मिचिगन स्ट्रीट और Lake  Shore  Drive  के बीच में स्थित विशाल पार्क मिल्लेनियम पार्क पहुंचे.  ये सन २००० में ही बना है और अब तो शिकागो का लैंडमार्क जगह है.  यहाँ क्लिक करके इसके बारे में और पड़ें और नीचे लगी फोटो को एन्जॉय करें.  समय की कमी की वजह से यही बंद करता हूँ.  बहुत ही अच्छी और प्रसिद्ध जगह है ये. यहाँ का ये बीन के आकर का शीशे नुमा आकृति बहुत ही आकर्षक है ....


रविवार, 16 मई 2010

निकुंज की पेंटिंग का प्रदर्शन Fine Art फेस्टिवल में

पिकासा में देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

बहुत व्यस्त सप्ताहांत रहा, शुक्रवार से लेकर अब तक कुछ न कुछ लगा ही रहा, शुक्रवार के बारे में बाद में बात करूँगा एक अलग ब्लॉग पोस्ट के जरिये, पहले  शनिवार की बात कर लूं,  क्यूंकि ये एक बहुत ही सुखद अनुभव था. 

हमें निकुंज की आर्ट टीचर के जरिये निमंत्रण मिला कि निकुंज की पेंटिंग का चयन जिले लेवल की एक आर्ट प्रदर्शनी में हो रहा है.  जैसा कि हर पालक को ऐसी न्यूज़ सुनकर गर्व और खुसी होगी, हम भी बहुत उत्सुक थे कि ऐसा क्या बनाया जो इस तरह के सम्मान मिला.  Metea Valley High School हमारे घर के पास में ही स्थित है जहाँ पर ये प्रदर्शनी रखी गयी थी. 

पहुंचकर पता लगा कि सुबह ९ बजे से लेकर ४ बजे तक कई संगीत के कार्यक्रम है.  इन सितारों को मैंने  वहां चमकते देखा,  सबने अपनी अपनी कला के माध्यम से कुछ न कुछ अद्वितीय रच रखा था.  कलाकृतियाँ बहुत कुछ बयाँ कर रही थी.  प्राथमिक शाळा के ये छात्र हर कोने में अपनी कला के जरिये अपनी उत्कृष्ट सोच का नजरिया पेश कर रहे थे.

निकुंज ने अपनी पेंटिंग में , एक L के आकर का चित्र बनाया हुआ था और उसमें L से शुरू होने वाली कई चीजें बना रखी थी. जैसे औरतें  (Ladies ), लालीपॉप, लोबस्टर , पुस्तकालय (Library ) इत्यादि.   चयन करने वाले ने अवश्य ही निकुंज कि सोच को ध्यान में रखकर उसकी पेंटिंग का चयन किया होगा.

साथ में ही संगीत का भी आयोजन था,  बहुत सारे बच्चे एक साथ कई तरह के संगीत वाध्ययंत्र अनुशाषित होकर बजा रहे थे.  सभी सफेद रंग कि कमीज और काले रंग का पतलून पहने हुए थे.  देखकर मेने निकुंज को समझाया कि देखो अनुशासन और क्रमबध्द्ता का जिंदगी में कितना महत्व होता है, ये न हों तो संगीत में वो जान ही नहीं रहेगी और न ही वो आनंद आएगा.

अमेरिका में (जहां तक मैंने देखा है अभी तक)  हर स्कूल में पुस्तकालय , खेल के मैदान,  और इसी तरह की अन्य  गतिविधियों को ध्यान में रखकर ही हर स्कूल का निर्माण किया जाता है, एक जिले के सारे स्कूल का नक्सा और बनावट एक जैसा मिलेगा और हर स्कूल के साथ एक मशहूर टीम, या फिर जानवर जैसे शेर,  घोडा या फिर चीते को स्कूल के नाम से जोड़ देते है, जिससे कि एक पहचान हो सके और हर छात्र अपने स्कूल को उस चिन्ह या शौर्य  से परिभाषित कर सके.

कुल मिलकर स्पोर्ट्स, आर्ट और पढाई पर बराबर का ध्यान देने की कोशिश कि जाती है, अभी तक तो निकुंज बस्ता में कुछ लेकर नहीं  जाता, उधर से प्रोजेक्ट बनाकर ही लाता है. अगर आप सजग है तो निश्चित ही ये मॉडल हर छात्र का विशिष्ट निखारने के लिए सर्वोपयुक्त है. 



मंगलवार, 11 मई 2010

एक दर्द भारत के पासपोर्ट रखने का ऐसा जो जाने कब जायेगा ...

नौकरी ऐसी है की प्रोजेक्ट के अनुसार कभी अंतर्राजीय तो कभी अंतर्राष्ट्रीय यात्रा करनी पड़ती है.  शिकागो से बोस्टन, न्यू योर्क या फिर ह्यूस्टन जाना पड़े तो कोई बात नहीं होती क्यूंकि किसी वीसा की जरूरत नहीं पड़ती.  पर किसी और देश को जाना पड़े तो बहुत पापड़ बेलने पड़ते है हम इंडियन पासपोर्ट धारको को.

हमारे अमेरिकेन भाई लोंगों के पास तो बस पासपोर्ट होना चाहिए और वो कहीं भी कभी भी उड़ने को तैयार.  पर ऐसा हम इंडियन पासपोर्ट वाले नहीं कर सकते. और ये दर्द समय समय पर सोचने पर मजबूर करता है कि क्यों नहीं सबके लिए एक जैसा क़ानून ?

अब में ऐसा अपने लन्दन, जर्मनी या फिर कनाडा में बैठे लोंगों को कैसे समझाऊं ? उनकी अपेक्षा है कि मैं १-२ दिन में फ्लाई करके प्रोजेक्ट ज्वाइन कर लूं.   बाकी लोग जो अमेरिकेन , कनाडा या फिर लन्दन के पासपोर्ट वाले है उनकी ही श्रेणी में शामिल करके अपेक्षा बढ़ जाती है.  पर ये नादान लोग इम्मिग्रेसन के बारे में कुछ नहीं जानते और फिर उनको सारी ABC पढ़ानी  पड़ती है.

वीजा का टाइम भी २ सप्ताह  से लेकर ६ सप्ताह का रहता है,  अब इतना इंतजार कौन करे ?  आजकल जब से चरम पंथ उत्कर्ष पर है,  वीजा लेना और भी मुश्किल हो गया है. 

इन सबके ऊपर से पेपर वर्क भी इतना कि सारा दिन लग जाए भरने में और उसके बाद अटोर्नी के सवाल पर सवाल.  जब तक वीजा ना आये तब तक आप इस चक्रव्यूह में घूमते ही रहो.  हर जगह के अलग टाइप के फोटो. हर जगह के वीजा के लिए पिछले वर्षो के सारे यात्रा का लेखा जोखा अलग से दो. सारे प्रमाण पत्रों की कॉपी कि जरूरत और तमाम प्रश्नों कि झड़ी.

जब अमेरिका से बाहर निकालो तो फिर वापस आते समय अमेरिका के वीजा का वैध स्टंप भी जरूरी है आपके पासपोर्ट पर अगर वो नहीं है तो एक और माथा पच्ची ...जीवन को बिना बात के बेतुके संघर्षो में ढालना पड़ता है.

बात हरे पत्ते के मोह तक होती तो कोई बात नहीं, पर वर्ल्ड ट्रेवल तो कही से भी करना पड़े , हम भारतीयों के लिए टेडी खीर ही है.  पश्चिम में रहने वाला कही भी आने और जाने के लिए आजाद और हम पर इतनी पाबंदियाँ ...कहाँ तक जायज है ये ?  कुछ तो पारदर्शिता और समानता आनी चाहिए इस भूमंडलीकरण के युग में ...

ये दर्द हर हिन्दुस्तानी या एशियन को है और कोई दवा मुझे आती नहीं दिखती !!

सोमवार, 10 मई 2010

जन्मदिन उनका ........

जन्मदिन था एक महत्वपूर्ण व्यक्ति का, एक स्वजन का और एक भाई का, परम मित्र का सच्चे साथी का.  में यहाँ हूँ दूर हजारो मील फिर भी संवेदना और भावना जोड़कर रखती है, पास पास रखती है.  अमेरिका टाइम में पीछे है तो हमने कल भाभी को फ़ोन घुमाया, पता चला भाईसाहब है ही नहीं इंडिया में, वो साउथ अफ्रिका के बिज़नस टूर पर है.  भाईसाहब से मेरा रिश्ता अटूट है, एक भाई से ज्यादा वो मेरे दोस्त और मेरे सब कुछ.  सामने डेस्क पर रखी हुई फोटो जो २००७ में पुणे में उनके घर जाते समय ली थी, बहुत मधुर स्मर्तियों को ताजा करा रही है.  कई फोटो है जो में निहारता हूँ और मुझे वो बित्ताये गए मस्त पलों में ले जाती हैं.

ये स्मर्तिया जाती है २२ साल पीछे और शायद उससे भी कही ज्यादा. मेरी बुआ के लडके जो उम्र में मेरी बराबर या थोरे बहुत बड़े ..पर मेरे घरवालो ने मुझे भाईसाहब बोलना क्या सिखाया, अब वो हर किसी के भाईसाहब है. हम सब प्यार से उनको इसी संबोधन से बुलाते है.

२२ साल पहले हम दोनों ने एक ही क्लास से पड़ना स्टार्ट किया और फिर ये सिलसिला दादागिरी और भाईगिरी का लगभग १४ साल तक चलता रहा.  क्लास ७ से लेकर मास्टर डिग्री लेने तक हम एक ही क्लास में रहे, एक ही साथ एक ही छत के नीचे और एक ही मैदान के ऊपर रहे.  ये साथ अविस्मरनीय था, अद्वितीय था. दिल्ली भी साथ साथ आये और फिर २००२ में मैं विदेश क्या निकला,  फिर बस यादें ही रही.  खैर पत्नी का आगमन और एक नए दुनिया की शुरुआत, बच्चे , नौकरी और तमाम उलझाने, ८ साल निकल गए.   अब तो ईमेल पर भी उतनी बातें नहीं होती.  पत्नी बच्चे और हम सभी भाईसाहब की बहुत इज्जत करते है.  और इस जन्मदिन पर उनको इश्वर से और खुशियाँ देने की कामना करते है.

वो भी अब दो बच्चो के पिता है, और पुणे में एक सॉफ्टवेर कंपनी में कार्यरत है.  बहुत ही प्यारे बच्चे है.  भाईसाहब का खाना अगर कोई खा ले तो बस उनका फेन ही बन जाए,  मस्त खाना बनाते है.  और उनके चुटकुले ...हस हस के लोट पोट कर देंगे.  बहुत ही सकारात्मक प्रवृत्ति के इंसान है और जो भी उनके सानिध्य में रहता है, बस समझ लो वो हँसता ही रहेगा, मुस्कराहट को दूर नहीं होने देते ...में बिलकुल दूसरी साइड हूँ. 

बच्चो के साथ भाईसाहब -

वो मेरी बुआ के लडके है,  २००६ में मेरी बुआ का स्वर्गवास भाई साहब के लिए और हम सब के लिए  दुखों का  तूफान सा लेकर आया, बुआ की असमय मौत ने उनको हिला सा दिया.  बुआ तो जैसे मेरे लिए सब कुछ लुटा देते को तैयार रहती थी,  एक माँ से भी ज्यादा प्यार दिया करती थी, जब भी में उनके पास जाता या वो हमारे घर आती.  बहुत ही निश्चल , निर्विकार और ममतामयी थी.  भाईसाहब जब १२-१३ साल के रहे होंगे, तब से ही हमारे घर रहे और हम उनके घर केवल गर्मियों की छुट्टियों में ही जाते थे.  अब तो जाने का मन ही नहीं करता जब से बुआ न रही. एकाकीपन सा फील होता है. 

दक्षिण अफ्रीका में भाईसाहब -


खेतिहर भाईसाहब -

हम लोगो को इनमें रब दिखता है
सादगी की ये मूरत है
लाजबाब इनके लतीफे है
हँसी का ये वायरस है
इनका स्वभाव देवता तुल्य है
ये हमारे परिवार के भाईसाहब है , नाम या रिश्ते से ही नही अपने कर्म से भी ये भाईसाहब है.
प्रेरणा के श्रोत और अपने आप में एक मिसाल है
ये अपने आप में एक इन्सान की परिभासा जैसे लगते है
सच में कहूं तो मेरे पास वो शब्द ही नही जो इन्हे परिभाषित सच्चे अर्थो में कर सकूं........
सच में भाईसाहब आप महान हो !
<ऑरकुट पर लिखा तेस्तिमोनिअल>

शनिवार, 8 मई 2010

एक अद्भुत संस्मरण जो चकित और पुल्लकित कर दे ...

कुछ दिन पहले की बात है,  एक हमारे परम मित्र की कंपनी में काफी बड़ी मात्रा में लोगों को नौकरी से निकाले  जाने का प्लान था.  हम लोग अक्सर इस बारे में बातें करते रहते थे और मैं अक्सर उनको पूछता रहता था कि भाई आपका क्या हुआ, कब फैसला हो रहा है.  वो पलट कर यही जाबाब दिया करते  कि फलाने तारीख में कुछ होने वाला है.  लगभग ८० प्रतिशत लोगो को निकाले जाने का प्लान था.  हालांकि दोस्त हमारा ठहरा तो काबिलियत पर कोई शक नहीं, पर जब इतने बड़े तरीके पर कंपनी में कांट छांट हो रही हो तो कुछ भी हो सकता है.

ऐसे ही एक दिन फ़ोन पर बात करते करते मैंने उनको बताया कि मेरे पास ऐसा कुछ संकेत या आधार है, जिससे मुझे पूरा भरोसा है कि आप अभी कंपनी से बाहर नहीं आ सकते.  उसने मेरी बात को मजाक में टाल दिया एक पल के लिए पर कुछ देर बाद मन में सुगबुगाहट हुई और कारण पूछने लगा, जैसा कि होता कि अगर कोई मन की बात कह दे तो भले ही झूटी हो पर कारण जानने का मन करने लगता है.  मैंने कहा कि जब मिलेंगे तब डिटेल में बताता हूँ.

बहुत पहले जब में स्कूल/कॉलेज में था तब की बात है, अकसर गलती से या जो कारण बताने वाला हूँ, उसकी वजह से में एक्साम के बाद टॉप १० (अतिशयोक्ति अलंकार (का प्रयोग नहीं है)) में तो आता ही था. होता ये था कि  कभी कभी पेपर के पूर्व रात्रि में मेरी हालत बहुत खराब हो जाती थी, उसका कारण था मेरा एक पैटर्न वाला सपना.  एक ही तरह का ये सपना बड़ा विचलित कर देता था.  होता ये था कि सपने में मैं अपना पेपर हल कर रहा हूँ और केवल कुछ ही प्रश्न हल कर पाता हूँ और बाकी कक्ष की पटियां गिनते गिनते टाइम ख़त्म, फिर क्या में सेन्स लेस पड़ा पडा पसीने और डर से बुरी तरह एक दम जाग पड़ता और फिर सेन्स में आकर सत्य का मीठा अनुभव करता कि अरे कुछ नहीं, ये तो सिर्फ एक बुरा सा सपना था.  और उस दिन का पेपर तो बस पूछो मत,  एक भी प्रश्न किया बिना नहीं रहेगा .  कभी कभी तो १०० % मार्क आ रहे होते और मास्टर साहब भी देख रहे होते रिजल्ट को.

 ...ऐसा नहीं कि पेपर सपने से अच्छा  गया , पढाई भी करते थे क्यूंकि पापा कि कड़ी मेहनत और उनके द्वारा बनाये गए आदर्श हमेशा सामने रहते थे.  पर लगता है कि पूरे दिन कि सोच को रात में दिमाग एक अलग ही दुनिया में खोकर पूरी तरह व्यक्त करके कुछ सन्देश देना चाहता था.   बाद में तो ऐसे सपनों की पुनरावृत्ति बहुत होने लगी और फिर सपने में भी मुझे फील होने लगता कि ये असल नहीं..सपने वाला पेपर है और इस तरह से उस सपने से डर और कंप कम हुआ और सुख कि अनुभूति ज्यादा.  

पर सपनों का ये एक जैसा क्रम ही क्यों ? क्या इसका कुछ वैज्ञानिक आधार है ?  मस्तिस्क का रात में सपनों के द्वारा अनूभूति कराने का ये बड़ा ही अद्भुत तरीका है.  कभी कभी लगता है की हर सपने में कुछ न कुछ सन्देश छुपा रहता है.  मुझे ध्यान है की इंडिया में पॉकेट बुक भी आती है जिसमें सपनों और उनके अर्थ के बारे में लिखा रहता है.  कुछ दिन पहले में एक लेख पढ़ रहा था, इधर अमेरिका के किसी विश्वविधालय में शोध किया गया था और उन लोगो ने इस बारे में काफी कुछ विस्तार से लिखा था.

मेने अपने दोस्त को बताया कि भाई आज रात में सपना आया था कि आप तो निश्चय ही बाहर आ रहे है, और वो भी मेरी पत्नी ये समाचार दे रही है , जिसको इस मामले में कुछ पता ही नहीं था.  सुबह उठा तो मेने निष्कर्ष निकाला कि मेरा दोस्त तो बच गया इस बार.  वैसे निकलने में भी फायदा था उसका; क्यूंकि कंपनी निकलते समय कुछ महीनो का वेतन अडवांस में देकर विदा करती है, पर ऐसी मार्केट में कौन फिर से जॉब देखे !  तो इस आधार पर हमने उनको बताया कि आप शायद सुरक्षित रहोगे चाहे कितना ही बड़ा ले ऑफ क्यों न हो.

और एक दिन वो तारीख भी आ गयी जब 8० प्रतिशत लोगो को बहार का राश्ता दिखाया गया क्यूंकि कंपनी का IT डिपार्टमेंट इंडिया से चलेगा और देश(इंडियन)  की एक  कम्पनी अपने लोगो से काम कराएगी और इस तरह इस कंपनी को काफी आर्थिक लाभ होगा. 

हम लोग संयोग से ट्रेन में उस दिन साथ ही चिकागो से घर आ रहे थे.   बहुत जानने वाले लोग बाहर कर दिए गए थे. सैकड़ो में सख्या थी तो कुछ हमारे जानने वाले तो होंगे ही.   ये दोस्त एक और अपने परम मित्र के साथ बैठे थे.  बात करते करते उन्होंने खुश खबरी सुनाई  और बोल पड़े के भाई तेरे सपने वाली बात तो सच हुई, क्यूंकि मेरा नाम तो पता नहीं किसी वजह से लिस्ट में आया ही नहीं और में बिलकुल सुरक्षित हूँ.  मुझे तो पूरा विश्वास था और इसलिए दोस्त की खुसखबरी के मारे और मेरे अनुभव को सच होते देख मैं अति उत्साह में अपनी ख़ुशी जाहिर करने लगा और साथ वाले दोस्त की जिज्ञासा को शांत करने के लिए उसको सब कुछ बताने लगा ....साथ वाला दोस्त हंसकर बोला कि यार बंद करो ये ...कुछ और ढंग की बात सुनाओ ...मेने अपने आप को कचोटा और नियंत्रित किया.  इतने में हमारा स्टेशन आ गया और सब अपने अपने घर के रास्ते हो लिए !

बहुत दिन बाद सपने की पुनरावृत्ति और सच होना बड़ा ही मजेदार और रोचक लगा और सोचा कि चलो ब्लॉग बंधू लोंगों के साथ भी बाँटते है.....

गुरुवार, 6 मई 2010

सोच गाँव की बनाए सयाना

एक ड्राफ्ट की हुई पोस्ट पता नहीं कब से रखी पड़ी थी (मार्च २००८) . सोच तो ठीक थी, चलो पुब्लिश कर देते है ...



कभी कभी में सोचता हूँ की क्यों हमारे पॉलिसी बनाने वालो को कुछ दिनों तक पहले किसी गांव में कुछ दिन बिताने चाहिए , जितना सीखने को विदेश से नही मिलेगा उतना भारत के गावों से। आजकल मंत्री लोग अपने सचिव इत्यादी के साथ विदेश दौरे पर जाते है ताकि वो अपने प्रदेश के लिए कुछ आधुनिक कर सकें , मेने कई देसों का भ्रमण किया है और मेने गांव में अपना बचपन , युवावस्था भी बिताई है, उस आधार में में कह सकता हूँ की ये सब नेता लोग विदेश से कुछ सीखकर आने का बहाना सिर्फ अपने मनोरंजन के लिए बनाते है। उनको अगर विकास करना है या कुछ सीखना है तो सच्चा ज्ञान उनको भारत के गावों में ही मिल सकता है में जब बचपन को याद करता हूँ तो कुछ स्म्रतियाँ ताजा हो जाती है, जैसे रात को थक हारकर सब लोग एक जगह बैठकर रामायण का पाठन करते थे, में भी उनमें से एक था और रामायण पाठन से बहुत कुछ सीखने को मिला, जैसे आप सारे भिन्नता भुलाकर रात को एक साथ जरूर बैठे एक बार, उस रामायण पड़ने के बहाने कुछ फुरसत के पल टीम मीटिंग के लिए निकाले जाते थे जिससे सब कुछ बातो पर परिचर्चा हो सके, साथ आने कल की योजना बनायी जा सके। उस रामायण पड़ने और साथ बैठने से सारे दिन की थकान यू ही चली जाती थी, और फिर आप एक दूसरे से सब कुछ बता भी रहे हो तो बहुत हद तक आप ताजा और सुकून महसूस करते हो सब एक साथ बैठते है तो सबके विचार भी ले लिए जाते है और संयुक्त रूप से निर्णय लेने में भी आसानी रहती  ये सब मेरे को बड़े से बड़े प्रोजेक्ट को सफल बनाने की प्रेरणा देते है दीपावली  पर रामलीला का आयोजन सारे धर्म के लोगो को एक मंच पर लाता था और जिनके अन्दर कला होती थी वह लोग सब का मनोरंजन करते थे बहुत ही सुहाने और संघर्ष के दिन थे पर उन दिनों ने जो परिपक्वता स्वभाव में दी  उसका जबाब नहीं.