हिंदी - हमारी मातृ-भाषा, हमारी पहचान

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए अपना योगदान दें ! ये हमारे अस्तित्व की प्रतीक और हमारी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है !

गुरुवार, 22 जनवरी 2009

मुंबई के कुछ ही शहीदों को सलाम क्यूं ??


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी



अगर कोई मेरी ये लेख पड़कर नाराज होता है तो मैं पहले से ही माफी माँग लेता हूँ , पर ये बात सच है की आप सबके दिमाग में भी यही सवाल बार बार आता होगा की क्यूं हर रोज केवल चुनिन्दा पुलिस वालो को ही बार बार शहीद बताया जा रहा है, सिर्फ़ इसलिए की वो उच्च पदों पर आसीन पदाधिकारी थे या फिर इसलिए की वो तथाकथिस शहरी वर्ग से आते थे, क्यों महानगरीय ठप्पे वाले लोग जैसे हेमंत जी, सालसकर जी को ही हम अशोक चक्र या वीरता चक्र देने की बात कर रहे है ? क्या वो पुलिस वाले जो तीसरे विस्वयुद्ध की बंदूको से लड़ रहे थे या फिर अपने डंडे से ही कुछ कमाल दिखा रहे थे, शहीदी का तमगा नही लगा सकते ? मेने आज तक किसी भी टीवी चैनल पर साधारण पुलिस वालो का नाम या लिस्ट नही देखी , मेने अपने ज्ञान के अनुसार वेब पर भी इधर उधर नजर दौडाई पर कही भी मुंबई के ३ अफसरों के अलावा किसी और का नाम नही दिखा, ये क्या मजाक है ? जैसे हेमंत करकरे जी, सालसकर जी और कामते जी ने बहादुरी या नेत्रत्व दिखाया वैसे ही अनेक और भी साधारण पुलिस वाले उस दिन अपना प्रयास करते हुए मारे गए होंगे, क्या कोई एक एसा आप लोगो मे से है जो उनके नाम जानता हो, किसी राजनीतिज्ञ ने या राहुल गाँधी जैसे तथाकथित महान लोगो ने उन बेनामो को याद किया ? क्या आपको नही लगता की सिर्फ चमत्कार को ही नमस्कार किया जा रहा है ? ऐसे अनेक सवालों ने मेरे को इतने दिनों से विचलित कर रखा है और मेने सोचा की चलो ब्लॉग के जरिये ही आप लोगो के साथ ये दुःख बाँट लूँ।

ये पुलिस वाले हमारे जैसे साधारण परिवारों से आते है और इसलिए ही शायद ऐसे असाधारण वक्तों में लोग उनका नाम भूल जाते है और ये भी नही सोचते की उनके परिवार पर जो किसी छोटे से शहर या गाँव में होगा और उसी पर निर्भर होगा , क्या बीत रही होगी । इन बड़े अधिकारियो के बेटे बेटी तो विदेश में पड़ते है, पर उन छोटे लोगो को जिनके बच्चे सरकारी स्कूल में ही जाने को बहुत कुछ समझते है. भारत में यही अन्तर एक गरीब और अमीर , एक छोटे और बड़े आदमी के बीच मेरे को पीड़ा देता है. जब तक ये अंतर ख़त्म नही होगा, क्या हम छोटे लेवल पर, जड़ो में उर्जा पैदा कर पायेंगे ? मेरा उत्तर है नही नही....नही और इन्ही हरकतों से हम ये भावना भी भर रहे है की इमानदारी , बहादुरी की तारीफ तभी है जब आप चमक रहे हो, बड़े हो, पदासीन हो या फिर राजनैतिक गलियारों में आपकी पहुँच हो, चाटुकारिता में आप माहिर हो. हम सबने केवल कुछ को महत्व देकर सबके बलिदान को यहाँ तक की इन तीनो बहादुरों के बलिदान को भी फीका कर दिया.


अगर किसी के पास अन्य शहीदों की सूची है तो कृपया मेरे को ईमेल कर दें.
सादर धन्यवाद !!






5 टिप्‍पणियां:

Dr.Parveen Chopra ने कहा…

उस्ताद, आप की सभी बातों में दम है।

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

आपकी बात सही है बिल्कुल ..यही विचार इस कविता के माध्यम से मेरी कलम से लिखे गए थे .
http://ranjanabhatia.blogspot.com/2008/12/blog-post_16.html

बी एस पाबला ने कहा…

बात तो आपकी सही है।
चाहे उड़ीसा की झील में, नक्सलियों के हमले से, 30 से अधिक पुलिस जवान डूबे हों या छत्तीसगढ़ में अक्सर होने वाली शहादत, इन सबकी कोई चर्चा नहीं होती।

चर्चा होती है उनकी, जिन्हें कथित मीडिया अपनी टीआरपी के चक्कर में हंगामाखेज ऊँचाईयों तक ले जाता है।

… और ऐसा, हर क्षेत्र में किया जाता है।

डॉ .अनुराग ने कहा…

सच कहा आपने .आपकी बातो से सहमत हूँ...पर ये शायद समाज की पुरानी व्यवस्था या सोच है यहाँ जब कोई बड़ा आदमी नेक काम करता है तो उसका शोर सब जगह मचता है....

Suresh Chiplunkar ने कहा…

नहीं जी लेख पढ़कर नाराज होने वाली कोई बात ही नहीं है…, असली गलती तो टेबल पर बैठकर या सिर्फ़ महानगरों में रहकर राष्ट्रीय(?) पत्रकारिता करने वालों की है, इन्हीं लोगों को कश्मीर में शहीद होने वाले जवान भी नहीं दिखते और कभी-कभी पाकिस्तान से दोस्ती के दौरे पड़ते रहते हैं… ये चॉकलेटी पत्रकार TRP की महिमा के मारे हुए हैं, इनसे कोई उम्मीद करना बेकार ही है…