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सोमवार, 28 जनवरी 2008

jeevan---जीवन--

jeevan---जीवन--

रुके सन्घर्ष कभी ना, हो यही कहानी मेरे जीवन की
बहते जाऊं नदिया की तरह, यही अभिलाशा मेरे मन की
पर्वत की तरह हो द्रढ निश्चय, मिटा दे खाई कथनी करनी की
रुकूं ना में आगे बढना, देख पल भर के गम या खुसी
बढता ही जाऊं में हर पल, खोजता मन्जिल नयी नयी
जब तक ना छुयेगा पानी को, क्या तू तैरना सीखेगा
फिर कैसे केवल बातो से , जीवन की नाव चलायेगा
मुस्किल रोकेंगी सफर, मिलेंगे उपहारों के फूल
कदम राही के रुके नहीं, प्रक्रति की सीख यही मत भूल
बटोही सोने से पहले, सोच ले मन्जिल कितनी दूर
समय को खोने से पहले, याद रख नही आये ये लौट
रुके सन्घर्ष कभी ना ....-

राम कुमार त्यागी

1 टिप्पणी:

अनुनाद सिंह ने कहा…

राम त्यागी जी,

आपका हिन्दी ब्लागजगत में स्वागत है।

आपके लेखों काफी सूचनाप्रद और उपयोगी हैं। आशा करता हूँ कि आगे आप और अधिक लिखेंगे और ज्यादा से ज्यादा हिन्दी में लिखेंगे।